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रहीम के दोहे: जागते हुए सोये उसे क्या शिक्षा देना


जानि अनीती जे करैं, जागत ही रह सोई।
ताहि सिखाई जगाईबो, उचित न होई ॥
अर्थ-समझ-बूझकर भी जो व्यक्ति अन्याय करता है वह तो जागते हुए भी सोता है, ऐसे व्यक्ति को जाग्रत रहने के शिक्षा देना भी उचित नहीं है।
कविवर रहीम का आशय यह कई जो लोग ऐसा करते हैं उनके मन में दुर्भावना होती है और वह अपने आपको सबसे श्रेष्ठ समझते हैं अत: उन्हें समझना कठिन है और उन्हें सुधारने का प्रयास करना भी व्यर्थ है।

फड़कते और गर्मागर्म हैडिंग लगाया करो


पहला ब्लोगर फ़िर उस दूसरे ब्लोग से मिलने निकला क्योंकि उसने उसके कहने से दो रिपोर्ट लिखी थी पर उसने कमेंट नहीं दी। इस बार उसकी गांव जाने वाली सड़क बरसात के पानी में बह गयी होगी इसका उसे अनुमान नही था। वह जैसे तैसे उसके घर के पास पहुचा तो उसने साइकिल बैठे ही उसे बाहर खडे हुए देख लिया। चूंकि नजर उसकी तरफ़ थी इसलिये उसे अपने सामने आया गड्ढा नहीं दिखाई दिया और उसका दिमागी संतुलन गड्बडा गया और वह साइकिल समेट उसमें गिर गया। गड्ढे में पानी भरा हुआ था और उसमें उसके कपडे भी खराब हो गये। दूसरा ब्लोगर उसके पास आया और उठाने की बजाये हंसने लगा। पहला ब्लोगर ने अपने को संभाला और उठते हुए बोला-“यार तुम्हें शर्म नहीं आती मुझे उठाने की बजाय हंसते हो।”

दूसरा ब्लोगर-पागल हुए हो, भला कोई गिरे हुए ब्लोगर को दूसरा ब्लोगर उठाता है, उल्टे जमे हुए को गिराता है। कम से कम मैने तुम्हें गिराया नही इसके लिये शुक्रिया अदा करना चाहिये। हाँ तुम कहों तो इस साइकिल को उठाने में मदद कर सकता हूँ’

पहला ब्लोगर-” कोई जरूरत नहीं खुद ही उठा जायेगी।तुम्हारे इधर आने वाले सडक कहां गुम हो गयी।”

दूसरा बोला-‘जिस दिन तुमने सडक पर हास्य कविता लिखी थी उसी दिन बह गयी। अब तुम यह मत पूछ्ना कि कैसे बह गयी? तुम्हारी कविता में सब लिखा हुआ है।’
पहला ब्लोगर-ठीक है, अब अंदर तो ले चलो कम से कम हाथ्-मूंह तो धो लूं।’

दूसरा ब्लोगर्-‘कोई जरूरत नहीं, घर में मेहमान आए हुए हैं, और वह भी ससुराल वाले। वैसे ही मेरी पत्नी और बच्चों ने इमेज वहां खराब कर रखी है और तुम कहीं अंदर गये तो बवाल भी मच सकता है। अभी वह समय नहीं आया कि कोई ब्लोगरों की इज्जत करे। यहीं इसी पत्थर पर बैठ्कर बातचीत करते हैं, और वह भी केवल पांच मिनट क्योंकि मैं अंदर सिगरेट लाने के बहाने बाहर आया हूं।

पहला ब्लोगर-‘तुमने वह रिपोर्ट देखी थी?’

दूसरा-‘नहीं। वही मैं तुमसे पूछ्ने वाला था। एक तो मैने अपने घर में इज्जत से बैठाकर चाय पिलाई, तुम्हारी पहचान छिपाई और फ़िर भी तुमने रिपोर्ट नहीं लिखी। अगर रिपोर्ट नहीं लिख सको तो मेरा समय खराब करने के लिये नहीं आया करो।

पहला-यार, मैने लिखी थी, तुमने क्यों नहीं देखी थी, थोडा ध्यान से देखा करो।’

दूसरा-“मैं इतने दिनों से देख रहा हूं तुमने कोई रिपोर्ट नही लिखी। हां मैने एक जोरदार रिपोर्ट देखी थी, क्या उसमें शानदार…………………..मेरा मतलब तुम्हारी भाषा में कहूं तो अभद्र शब्द थे।”

पहला-” उसके पास मेरी पोस्ट भी थी।”

दूसरा-‘तभी मैं कहूं कि मेरी नज़र में क्यों नहीं आयी। मेरा सारा ध्यान उस पर था। मैने वह रिपोर्ट दस बार पढी। तुम भी अपनी पोस्ट में फ़डकते हुई गर्मागर्म हैडिंग लगाया करो, तब तो मेरी नजर जायेगी और मैं कमेंट दूंगा।’

पहला-‘हैडिंग को फ़डकता हुआ कैसे बनाऊं, और गर्मागर्म किसमें करू? भगौने में या कढाई में।”

दूसरा ब्लोगर उठ कर खडा हो गया और बोला-‘अरे यार, तुम नहीं समझ सकते। तुम जाओ यहां से। मैं तो जा रहा हूं बीडी का बंडल लेने।”

पहला ब्लोगर-‘पर तुम तो यह कह कर आये हो कि सिगरेट खरीदने जा रहा हूं।’

दूसरा-‘अपनी ससुराल वालों के सामने क्या अपनी भद्द पिटवाता। वहां से बीडी पीकर आऊंगा और कहूंगा कि सिगरेट पीकर आया हूं। अब तुम जाओ………….जय ब्लोगिंग की……….”

पहला ब्लोगर ने गड्ढे से अपनी साइकिल उठायी और उसकी सीट को अपने रुमाल से साफ़ करने लगा, दूसरा ब्लोगर जाते-जाते बोला-‘और हां, इस बार अच्छी रिपोर्ट लिखना। वैसे नहीं भी लिखो तो फ़र्क क्या पडेगा। अब तो तुम यहां आओगे नहीं। इस तरह गिरने के बाद तो बिलकुल नहीं।”

पहला ब्लोगर-‘आना तो पडेगा न! तुम इस बार भी कमेंट नही लगाओगे तो पूछने और लगायी तो शुक्रिया अदा करने।”

दूसरा ब्लोगर अपना सिर पीट्ता हुआ चला गया, और पहला ब्लोगर भी साइकिल पर बैठकर वापस चला तब उसे ध्यान आया कि उसने यह तो पूछ ही नहीं कि इस बार हास्य कविता लिखे या नही।

वह उसे आवाज देना चाहता था पर उसमें खतरा यह था कि दूसरा ब्लोगर बहुत दूर चुका था और वह न भी सुनता पर उसके घर के अंदर आवाज जरूर जाती और वहां से किसी के बाहर आने का खतरा था। अपनी बुरी हालत देखकर पहले ब्लोगर ने सोचा अगली बार पूछ लूंगा।”

नॉट-यह हास्य व्यंग्य रचना है और इसका किसी व्यक्ति या घटना से कोई संबंध नहीं है, अगर किसी कई खुराफात से मेल खा जाये तो वही उसके लिए जिम्मेदार होगा।

व्यर्थ बोलने से मौन बेहतर


वह चीखते-चिल्लाते हैं

मैं मौन हो जाता हूँ

वह सवाल करते हैं कि

बोलने के लिए मैं अपना मुहँ खोलूं

पर मौन में जितनी शक्ति है व्यर्थ

बोलने में नहीं पाता हूँ

जब वह बोलते हैं

तब मैं सोचता हूँ
शब्द और व्याकरण के

अपने भण्डार पर

दृष्टिपात करता हूँ

मैं जानता हूँ कि जब में बोलूँगा

तब वह मौन हो जायेंगे

पर मेरे से जीत जायेंगे

यह सोच फिर मौन हो जाता हू
मैं अपने शब्द व्यर्थ में नहीं

नष्ट करता

जानता हूँ लोग केवल अपनी
कहने के लिए ही अड़े है

किसी की समझने और सुनने की

क्रिया से सब परे हैं

ऐसे में मेरा मौन ही

मेरा साथी बनता है

मेरे से बहुत कुछ कहता और सुनता है

मेरी कविताओं को

वही सजाता है

हास्य और श्रृंगार के अलंकरणों से

वही मेरी अभिव्यक्ति है

यह देखकर मौन हो जाता हूँ

प्रात:काल का आनंद


प्रात: मैं अपनी छत पर योग साधना करने के लिए अपने सामान के साथ पक्षियों के लिए दाना भी ला जाता हूँ। मुंडेर पर उन दानों को बिखेरने और पानी भर कर रखने के बाद अपनी योग साधना में तल्लीन हो जाता हूँ। उस समय अँधेरा होता है और जैसे ही थोडी रोशनी होनी शुरू होती हैं सबसे पहले गिलहरी का आगमन होता है। मेरे पास से निकलती गिलहरी दाने की तरफ जाती है तो मेरी तरफ देखती जाती है, पता नहीं क्या सोचती है और जैसे-जैसे मेरी तल्लीनता बढती है वैसे वैसे ही चिड़ियाओं के झुंड की आवाजें मेरे कानों में गूंजती है।

वह मुंडेर मेरे से दस फूट की दूरी पर है और वैसे कहते है कि योग साधना में कहीं ध्यान भटकना नहीं चाहिए पर मेरा मानना है कि इन पक्षियों का मेरे सामाजिक जीवन से कोई सरोकार नही है और उनकी तरफ ध्यान लगाना लगभग वैसा ही है जैसे दुनियादारी से ध्यान हटाना। कई बार तो मैं वहाँ पांच-छः प्रकार के पक्षी देखता हूँ, जिसमें तोता और कबूतर भी शामिल हैं। उनको देखकर जो मुझे अनुभूति होती है उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है। अगर मैं यह कहूं कि मेरा वह हर दिन का सर्वश्रेष्ठ समय होता है तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिऐ।

पता नहीं उनके मन में भी कुछ चलता है। जब मैं सर्वांगासन के लिए टांगें ऊपर किये होता हूँ तब चिड़ियायेँ बिल्कुल मेरी टांगों की पास से निकल जातीं हैं। उस समय मैं आंखें बंद किये होता हूँ तो डर जाता हूँ। मजे की बात यह है इतने सारे आसनों के बीच नही निकलतीं। उसके तत्काल बाद मैं शवासन करता हूँ , और उस समय भी वह ऐसा ही करतीं है । शवासन के समय कभी कभी गिलहरी भी छूकर भाग जाती है। मुझे उस समय हंसी आती है क्योंकि उनका इस तरह खेलना अच्छा लगता है। वैसे कई वर्ष से ऐसा हो रहा है पर मैं ध्यान नहीं देता था पर पांच-छः महिने पहले ऐक चिड़िया सर्वांगासन के समय मेरी टांग से टकराकर मेरे मुहँ पर गिरी और फिर भाग गयी। उसके बाद से मैंने उनकी गतिविधियों पर ध्यान देना शुरू किया। पहले तो दाना डालकर अपनी आँखें बंद कर योग साधना किया करता था। इन पक्षियों की चहचहाने की आवाज में जो माधुर्य है वह किसी संगीत में नहीं मिलता। और यह ऐक एसी फिल्म है जो कभी भी पुरानी होती नजर नहीं आती। ऐक एसा आनंद आता है जो अवर्णनीय है। शेष फिर कभी

क्रिकेट में कमा कौन नहीं रहा है?


भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्द के भूतपूर्व अध्यक्ष श्री आई. एस. बिंद्रा ने कपिल देव पर आई. सी. एल. को पैसे के उद्देश्य से बनाने का आरोप लगाया। आजकल ऐक बात मजेदार बात यह है कि जिसे देखो वही पैसे कमाने में लगा हुआ है, पर बात नैतिकता की बात करता है। शायद यह हमारी मानसिकता है कि हम त्याग को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं पर चाह्ते हैं कि दूसरे ऐसा करे ताकि हम उसकी पूजा करें-ताकि हम स्वयं माया ऐकत्रित करते रहें और समाज में अपना लौकिक सम्मान बनाये रखें। मैं तो यह जानना चाहता हूं कि पैसे कौन नहीं चाह्ता है, यहां त्यागी कौन है।

अगर कपिल देव ने अपनी संस्था पैसे कमाने के लिये बनाई है तो उसमें बुराई क्या है? और क्या कपिल देव ही केवल पैसा कमाएंगे? उनके साथ क्या जो लोग होंगे वह पैसे नहीं कमाएंगे? शायद बिंद्रा साह्ब को पता नहीं कि कई प्रतिभाशाली क्रिकेट खिलाडी धनाभाव के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। वह कह रहे हैं कि कपिल देव देश में क्रिकेट के विकास का बहाना कर रहे हैं। वैसे देखा जाये तो देश में क्रिकेट ने जो ऊंचाई प्राप्त की है उसका पूरा श्रेय कपिल देव को ही जाता है। अगर १९८३ में अगर वह विश्व कप जीतने में अपना योगदान नहीं देते तो शायद इस देश में यह खेल लोकप्रिय भी नहीं होता। उसके बाद ही भारत में ऐकदिवसीय लोकप्रिय हुआ और उससे साथ ही जो खिलाडी उसमे ज्यादा सफ़ल बने उनहें हीरो का दर्जा मिला और साथ में मिले ढेर सारे विज्ञापन और पैसा और समाज में फ़िल्मी हीरो जैसा सम्मान। यही कारण है कि उसके बाद जो भी नवयुवक इस खेल की तरफ़ आकर्षित हुए वह इसलिये कि उनहें इसमें अपना चमकदार भविष्य दिखा। ऐक मजेदार बात यह है कि क्रिकेट का आकर्षण जैसे ही बढता गया वैसे ही फ़िल्मों में काम करने के लिये घर से भागने वाले लोगों की संख्या कम होती गयी क्योंकि क्रिकेट में भी उतना गलैमर आ गया जितना फ़िल्मों में था।

ऐसा केवल इसमें खिलाडियों को मिलने वाले पैसे के कारण हुआ। अब यह पूरी तरह ऐक व्यवसाय बन चुका है। अगर कोई कहता है कि हम क्रिकेट के साथ नियमित रूप से सत्संग के कारण ही जुडे हैं तो सरासर झूठ बोल रहा है-चाहे वह खिलाडी हो या किसी संस्था का पदाधिकारी। फ़र्क केवल इतना होता है कि कुछ लोग अपने कमाने के साथ इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि दूसरे को भी कमाने का अवसर दिया जाये और अपने व्यवसाय में नैतिक सिद्धांतों का भी पालन किया जाये और कुछ लोग ऐसे होते हैं कि उनका उद्देश्य केवल अपने लिये माया जुटाना होता है और किसी नैतिक नियम को मानने की बात तो वह सोचते भी नहीं। समाज में ऐसे ही लोगों के संख्या ज्यादा है।

जिस तरह पिछ्ले कई वर्षौं से भारतीय क्रिकेट टीम का चयन हुआ है उससे नवयुवक खिलाडियों में यह बात घर कर गयी है कि उसमें उनको आसानी से जगह नहीं मिल सकती। इंग्लैंड गयी टीम का खेल देखकर तो यह साफ़ लगता है कि कई खिलाडी उसमें अपनी जगह व्यवसायिक कारणौं से बनाये हुये है। मैं हमेशा कहता हूं कि अगर किसी क्रिकेट खिलाडी कि फ़िटनेस देखनी है तो उससे क्षेत्ररक्षण और विकेटों के बीच दौड में देखना चाहिये। जहां तक बोलिंग और बैटिंग का सवाल है तो आपने देखा होगा कि कई जगह बडी उमर के लोग भी शौक और दिखावे के लिये मैचों का आयोजन करते हैं और उसमें बोलिंग और बैटिंग आसानी से कर लेते हैं पर फ़ील्डिंग और रन लेते समय उनकी दौड पर लोग हंसते है। आप मेरी इस बात पर हंसेंगे पर मेरा कहना यह है कि हमारे इस विशाल देश में लाखों युवक क्रिकेट खेल रहे हैं और रणजी ट्राफ़ी तथा अन्य राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेल रहे हैं ऐसा संभव नहीं है कि उनमें कोई प्रतिभा नहीं है पर उनको मौका नहीं दिया जा रहा है। इंग्लैंड गयी टीम क्षेत्ररक्षण और रन लेने में बहुत कमजोर सबित हुई है जो कि विश्व कप में भारत की जीत के सबसे मजबूत पक्ष थे। देश में युवा बल्लेबाज और गेंदबाजों की कमी नहीं है और क्षेत्ररक्षण और रन लेने की शक्ति और हौंसला युवा खिलाडियों में ही संभव है। अगर साफ़ कहूं तो अच्छी गेंदबाजी और बल्लेबाजी तो कोयी भी युवा क्रिकेट खिलाडी कर लेगा पर तेजी से रन लेना और दूसरे के शाट मारने पर उस गेंद के पीछे दौडना हर किसी के बूते का नहीं है।

भारत में प्रतिभाशाली खिलाडियों की कमी नही है पर क्रिकेट के व्यवसाय से जुडे लोग केवल यही चाह्ते हैं कि वह सब उनके घर आकर प्रतिभा दिखायें तभी उन पर कृपा दृष्टि दिखायें।
कपिल देव कमायेंगे इसमें कोयी शक नही है पर मेरी जो इच्छा है कि वह देश के युवाओं में ही नये हीरो ढूंढें। शायद वह यही करने वाले भी हैं। अगर वह इन्हीं पुराने खिलाडियों में अपने लिये नयी टीम का सपना देख रहे हैं तो शायद उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी-क्योंकि अत: यह क्रिकेट ऐक शो बिजिनेस बन चुका है उसमें अब नए चेहरे ही लोगों में अपनी छबि बना सकते हैं।। मेरा तो सीधा कहना है कि कपिल देव न केवल खुद कमायें बल्कि छोटे शहरों और आर्थिक दृष्टि से गरीब परिवारों के प्रतिभाशाली युवा खिलाडियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चमका दें तो वह स्वयं भी सुपर हीरो कहलायेंगे-हीरो तो वह अब भी हैं क्योंकि १९८३ के बाद से भारत ने क्रिकेट में कोई विश्व कप नही जीता है। मैं कोई कपिल देव से कोई धर्मादा खाता खोलने की अपेक्षा नहीं कर रहा हूं क्योंकि क्रिकेट कोई दान पर चलने वाला खेल अब रहा भी नहीं है। विशेष रूप से कंपनियों के विज्ञापनों से होने वाले आय पर चलने वाले खेल में कम से कम इतनी व्यवसायिक भावना तो दिखानी चाहिये के खेलो, जीतो और कमाओ, न कि क्योंकि कमा रहे हो इसलिये खेलते रहो, टीम में बने रहो। यह ऐक गैर व्यवसायिक रवैया है यही कारण है कि दुनियां की किसी भी टीम से ज्यादा कमाने खिलाडी मैदान में फ़िसड्डी साबित हो रहे हैं। दुनियां में किसी भी देश में कोई भी ऐसी टीम खिलाडी बता दीजिये जो ज्यादा कमाते हैं और हारते भी हैं। मतलब साफ है कि क्रिकेट में कहीं भी किसी ने धर्मादा खाता नहीं खोल रखा है और यह संभव भी नहीं है। अत: कपिल देव को ऐसे आरोपों की परवाह भी नहीं करना चाहिऐ।

गीत-संगीत और मोबाइल


मोबाइल का भला संगीत और गाने और बजाने से क्या संबंध हो सकता है? कभी यह प्रश्न हमने अपने आपसे ही नहीं पूछा तो किसी और से क्या पूछते? अपने आप में यह प्रश्न है भी बेतुका। पर जब बातें सामने ही बेतुकी आयेंगी तो ऐसे प्रश्न भी आएंगे।
हुआ यूँ कि उस दिन हम अपने एक मित्र के साथ एक होटल में चाय पीने के लिए गये, वहाँ पर कई लोग अपने मोबाइल फोन हाथ में पकड़े और कान में इयरफोन डालकर समाधिस्थ अवस्था में बैठे और खडे थे। हमने चाय वाले को चाय लाने का आदेश दिया तो वह बोला-” महाराज, आप लोग भी अपने साथ मोबाइल लाए हो कि नहीं?’
हमने चौंककर पूछा कि-”तुम क्या आज से केवल मोबाइल वालों को ही चाय देने का निर्णय किये बैठे हो। अगर ऐसा है तो हम चले जाते हैं हालांकि हम दोनों की जेब में मोबाइल है पर तुम्हारे यहाँ चाय नहीं पियेंगे। आत्म सम्मान भी कोई चीज होती है।”
वह बोला-”नहीं महाराज! आज से शहर में एफ.ऍम.बेंड रेडिओ शुरू हो गया है न! उसे सब लोग मोबाइल पर सुन रहे हैं। अब तो ख़ूब मिलेगा गाना-बजाना सुनने को। आप देखो सब लोग वही सुन रहे हैं। आप ठहरे हमारे रोज के ग्राहक और गानों के शौक़ीन तो सोचा बता दें कि शहर में भी ऍफ़।एम्.बेंड ” चैनल शुरू हो गये हैं।”
” अरे वाह!”हमने खुश होकर कहा-” मजा आ गया!”
“क्या ख़ाक मजा आ गया?” हमारे मित्र ने हमारी तरफ देखकर कहा और फिर उससे बोले-”गाने बजाने का मोबाइल से क्या संबंध है? वह तो हम दोनों बरसों से सुन रहे हैं । यह तो अब इन नन्हें-मुन्नों के लिए ठीक है यह बताने के लिए कि गाना दिखता ही नहीं बल्कि बजता भी है। इन लोगों नी टीवी पर गानों को देखा है सुना कहॉ है, अब सुनेंगे तो समझ पायेंगे कि गीत-संगीत सुनने के लिए होते हैं न कि देखने के लिए। “
हमारे मित्र ने ऐसा कहते हुए अपने पास खडे जान-पहचाने के ऐक लड़के की तरफ इशारा किया था। उसकी बात सुनाकर वह लड़का तो मुस्करा दिया पर वहां कुछ ऐसे लोगों को यह बात नागवार गुजरी जो उन मोबाइल वालों के साथ खडे कौतुक भाव से देख और सुन रहे थे। उनमें एक सज्जन जिनके कुछ बाल सफ़ेद और कुछ काले थे और उनके केवल एक ही कान में इयरफोन लगा था उन्होने अपने दूसरे कान से भी इयर फोन खींच लिया और बोले -”ऐसा नहीं है गाने को कहीं भी और कभी भी कान में सुनने का अलग ही मजा है। आप शायद नहीं जानते।”
हमारे मित्र इस प्रतिक्रिया के लिए तैयार नहीं था पर फिर थोडा आक्रामक होकर बोला-” महाशय! यह आपका विचार है, हमारे लिए तो गीत-संगीत कान में सुनने के लिए नहीं बल्कि कान से सुनने के लिए है। हम तो सुबह शाम रेडियों पर गाने सुनने वाले लोग हैं। अगर अब ही सुनना होगा तो छोटा ट्रांजिस्टर लेकर जेब में रख लेंगे। ऎसी बेवकूफी नहीं करेंगे कि जिससे बात करनी है उस मोबाइल को हाथ में पकड़कर उसका इयरफोन कान में डाले बैठे रहें । हम तो गाना सुनते हुए तो अपना काम भी बहुत अच्छी तरह कर लेते हैं।”
वह सज्जन भी कम नहीं थे और बोले-”रेडियो और ट्रांजिस्टर का जमाना गया और अब तो मोबाइल का जमाना है। आदमी को जमाने के साथ ही चलना चाहिए।”
हमारा मित्र भी कम नहीं था और कंधे उचकाता हुआ बोला-”हमारे घर में तो अभी भी रेडियो और ट्रांजिस्टर दोनों का ज़माना बना हुआ है।अभी तो हम उसके साथ ही चलेंगे।
बात बढ न जाये इसलिये उसे हमने होटल के अन्दर खींचते हुए कहा-”ठीक है! अब बहुत हो गया। चल अन्दर और अपनी चाय पीते हैं।”
हमने अन्दर भी बाहर जैसा ही दृश्य देखा और मेरा मित्र अब और कोई बात इस विषय पर न करे विषय बदलकर हमने बातचीत शुरू कर दीं। मेरा मित्र इस बात को समझ गया और इस विषय पर उसने वहाँ कोई बात भी नहीं की । बाद में बाहर निकला कर बोला-” एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि यह लोग गीत-संगीत के शौक़ीन है या मोबाइल से सुनने के। देखना यह कुछ दिनों का हे शौक़ है फिर कोई नहीं सुनेगा हम जैसे शौकीनों के अलावा।”
हमने कहा-” यह न तो गीत-संगीत के शौक़ीन है और न ही मोबाइल के! यह तो दिखावे के लिए ही सब कर रहे हैं। देख-सुन समझ सब रहे हैं पर आनंद कितना ले रहे हैं यह पता नहीं।”
हमारे शहर में एक या दो नहीं बल्कि चार एफ।ऍम.बेंड रेडियो शुरू हो रहे है और इस समय उनका ट्रायल चल रहा है। जिसे देखो इसी विषय पर ही बात कर रहा है। मैं खुद बचपन से गाने सुनने का आदी हूँ और दूरदर्शन और अन्य टीवी चैनलों के दौर में भी मेरे पास एक नहीं बल्कि तीन रेडियो-ट्रांजिस्टर चलती-फिरती हालत में है और शायद हम जैसे ही लोग उनका सही आनद ले पायेंगे और अन्य लोग बहुत जल्दी इससे बोर हो जायेंगे। हम और मित्र इस बात पर सहमत थे कि संगीत का आनंद केवल सुनकर एकाग्रता के साथ ही लिया जा सकता है और सामने अगर दृश्य हौं तो आप अपना दिमाग वहां भी लगाएंगे और पूरा लुत्फ़ नहीं उठा पायेंगे।
गीत-संगीत के बारे में तो मेरा मानना है कि जो लोग इससे नहीं सुनते या सुनकर उससे सुख की अनुभूति नहीं करते वह अपने जीवन में कभी सुख की अनुभूति ही नहीं कर सकते। गीतों को लेकर में कभी फूहड़ता और शालीनता के चक्कर में भी नही पड़ता बस वह श्रवण योग्य और हृदयंगम होना चाहिए। गीत-संगीत से आदमी की कार्यक्षमता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार अधिक टीवी देखने के बुरे प्रभाव होते हैं जबकि रेडियो से ऐसा नहीं होता। मैं और मेरा मित्र समय मिलने पर रेडियो से गाने जरूर सुनते है इसलिये हमें तो इस खबर से ही ख़ुशी हुई । जहाँ तक कानों में इयर फोन लगाकर सुनने का प्रश्न है तो मेरे मित्र ने मजाक में कहा था पर मैंने उसे गंभीरता से लिया था कि ‘ गीत-संगीत कानों में नहीं बल्कि कानों से सुना जाता है।’
बहरहाल जिन लोगों के पास मोबाइल है उनका नया-नया संगीत प्रेम मेरे लिए कौतुक का विषय था। घर पहुंचते ही हमने भी अपने ट्रांजिस्टर को खोला और देखा तो चारों चैनल सुनाई दे रहे थे। गाने सुनते हुए हम भी सोच रहे थे-’गीत संगीत का मोबाइल से क्या संबंध ?

क्या प्रेम और युद्ध में सब जायज है


प्रेम और युद्ध में सब जायज है। क्या इस तर्क को सही मान लिया जाये? पूरी तरह यथार्थ मीवन जीने वाले लोग इसे अपना आदर्श वाक्य मानते हैं। याद रखने लायक बात यह है कि यह सिद्धांत पश्चिमी अवधारणा आधारित है, और हमारी भारतीय और हिंदू मान्यताओं के ठीक विपरीत है। हमारे यहाँ प्रेम्में संयम और युद्ध में भी नियम माना जता है। प्रेम के बारे में कहा जाता है वह निस्वार्थ होना चाहिए और युद्ध में पीठ दिखा रहे शत्रु और शरण में आये शत्रु देश के नागरिक पर भी कभी प्रहार नहीं करना चाहिऐ। जिस शत्रु ने हथियार डाल दिए हौं और जिसने आधीनता स्वीकार कर ली हो उसके प्रति मैत्री का भाव रखना चाहिऐ। पश्चिम की विचारधारा किसी नियम को नहीं मानती।

प्रेम में सिर्फ लाभ और लोभ का भाव है। स्त्री से प्रेम है तो केवल उसके शारीरिक सौन्दर्य के आकर्षण के कारण और पुरुष है तो उसके धन के कारण है-यही कहती है पश्चिम की धारणा। पर हमारा दर्शन कहता है कि इस जीवन में भौतिक आकर्षण क्षणिक है और उसे मानसिक संतोष नहीं प्राप्त होता अत: निस्वार्थ प्रेम करना चाहिऐ जिससे मन में विकार का भाव न आहे और जिससे हम प्रेम करें उससे सात्विक रुप से देखें उसमे गुण देखे दोष नहीं, उसके प्रेम से हमारे मन को संतोष होना चाहिऐ न कि लोभ और लालच की भावना उत्पन्न हो जो अंतत: हमारे मन में विकार उत्पन्न करती है।

दूसरे के दिल और घरों में फ़रिश्ते क्यों ढूंढते हो


हृदय में सूनापन लिए
बाहर तुम चकाचौंध में
प्यार क्यों ढूंढते हो
अपने मन की आँखों को बंद कर
इस भीड़ में कहाँ तुम
सुकून ढूंढते हो

अपनी जुबान से कहे लफ़्ज़ों का
मतलब तुम खुद नहीं जानते
दूसरे के कहे पर अपने दिल की
तसल्ली क्यों ढूंढते हो

हर पल पकाते हो मन में
तुम ख्याली पुलाव
दिल में सपने देखते हुए
उनमें करते हो
अपने बहलाने के लिए
चलते-फिरते खिलौने का चुनाव
कभी खिलौने में इन्सान तो
कभी इन्सान में खिलौना ढूंढते हो

अपने दिल और दिमाग
कर लिए हैं खुदगर्जी के
तंग कमरे में बन्द
अपने मतलब को पूरा करने के
हो गये हो पाबन्द
दूसरे के दिल और घरों में
फ़रिश्ते तुम क्यों ढूंढते हो

जिन्दगी एक अबूझ पहेली है
जो अपने लिए जीते हैं
उन्हें करती है मायूस
जो दूसरे के दिल का करें ख़्याल
अपने हाथों की मेहनत से
परायों को भी कर दें निहाल
उनकी यह सहेली है
तुम अपने ही हाल में
जिन्दगी की इस पहेली
का राज क्यों ढूंढते हो
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माया के खेल तो बनते-बिगड़ते हैं


गरीब का जीना क्या मरना क्या
अमीर का जीतना क्या हारना क्या
इस जीवन को सहज भाव से वही
बिता पाते हैं
जो इन प्रश्नों से दूर
रह जाते हैं

जिन्दगी एक खेल की तरह है
इसे खिलाड़ी की तरह जियो
दूसरे की रोशनी उधार लेकर
अपने घर के अँधेरे दूर करने की
कोशिश मत करना
अपना कुँआ खुद खोदकर पानी पियो
भौतिक साधनों के अभाव पर
अपने अन्दर इतनी पीडा मत पालो कि
हर पल तुम्हारा ख़ून जलता रहे
ऐसे लोग हंसी के पात्र बन जाते हैं

देखो इस धरती और आकाश की ओर
तुम्हारी साँसों के लिए बहती हवा
बादलों से गिरता पानी
सूर्य बिखेरता अपने ऊर्जा
और अन्न प्रदान करती यह धरती
क्या यह दौलत कम है
जिन्दा रहने के लिए
माया के खेल तो
बनते है बिगड़ते हैं
उसमें हार-जीत पर क्या रोना
दृष्टा बनकर इस ज्ञान और सत्य के
साथ जीते हैं जो लोग
वही मरने से पहले
हमेशा जिन्दा रह पाते हैं
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विचित्र है राम की माया


भाई हो भरत जैसा
आज भी यही कहा जाता है
क्योंकि फिर कोई भाई
इस धरती पर पैदा ही नहीं हुआ
जिसने बडे भाई की चरण पादुकाएं
उठाकर सिर-माथे लगाई हो
या जिसने डूबती नैया पार लगाई हो
अब तो भाई ही भाई की पीठ में
छुरा घोंपते नजर आता है

मित्र मिले सुग्रीव जैसा
यही सबके दिल में
ख़्याल आता है
क्योंकि फिर कोई मित्र
यहाँ बना ही नहीं
जिसने आफत में
मित्र को उबारा हो
जिसे अपना मित्र
प्राण से भी प्यारा हो
अब तो मित्र ही मित्र की
पीठ में छुरा घोंपता
नजर आता है
राम जैसा पुत्र हर नारी चाहे
पर दशरथ जैसा पिता
किसी को नहीं भाता है

विचित्र है राम की माया
सब जगह गूंजे जयघोष के शब्द
कई जगह होता है उनके नाम
पर भंडारा
सब पुकारें नाम बारंबार
पर अपने हृदय में
देखने की कोशिश
करता हुआ कोई
नजर नहीं आता है
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यह एक यक्ष प्रश्न


एक अमीर के पुत्र विवाह
समारोह में खङा होकर
देख रहा हूँ धन कुबेरों
उच्च पदासीन और
मशहूर लोगों का जश्न
जाम से जाम टकराते
अपनी अमीरी और
संपन्नता पर बतियाते
सब हैं अपनी बात कहने में मग्न

कुछ होश में हैं कुछ बेहोश
कुछ लोग अपनी रईसी पर
इतराते हैं
कुछ अपनी बीमारी पर बतियाते हैं
बहुत जल्दी उकता जाता हूँ
सोचता हूँ बाहर के लोगों को
क्यों यहां स्वर्ग का अहसास होता है
मुझे तो लगता है कि
यहां नरक हैं
ऐसे इंसानों का जमघट है
जिनके बुद्धि और मन हैं भग्न

वर्षा के दिनों में
एक तंग बस्ती से निकलता हूँ
जहां सडक है कि नाला
पता ही नहीं चलता
बच्चे वहां पाने से खेल रहे हैं
मायें हैं अपनी बातचीत में मग्न

मुझे वहाँ भी नरक लगता है
पर जीते हैं गरीब और मजदूर
उसे स्वर्ग की तरह
हर मौक़े पर
बडे जोश से मनाते हैं जश्न

कहाँ स्वर्ग है
और कहाँ नरक
खङा है मेरे सामने
यह एक यक्ष प्रश्न
मैं ढूँढने की कोशिश करता हूँ
चलते-चलते उस बस्ती को
पार कर जाता हूँ
और हो जाता हूँ कहीं और मग्न

अपनी नीयत पर डटे रहना


रिश्तों को नाम देना
लगता है आसान
तब निभाने का
नहीं होता अनुमान
जब दौर आता है
मुसीबत का
अपने ग़ैर हो जाते हैं
ग़ैर फेर लेते हैं मुहँ
रिश्ता कामयाब नहीं कर पाता
अपनी वफ़ा का इम्तहान

कहना कितना आसान लगता है
कि तुम दोस्त ऐसे
मेरे भाई जैसे
तुम सखी ऎसी
बिल्कुल बहिन जैसी
जब आती है घडी निभाने की
तब न भाई का पता
न भाई जैसे दोस्त का पता
न बहिन का पता
न बहिन जैसी का पता
गलत निकलते हैं
अपनेपन के अनुमान

जरा सी बात पर
रिश्ते तैयार हो जाते हैं
होने को बदनाम
फिर भी अपनों से दूर
तुम मत होना
बेवफाई का बदला
तुम वफ़ा से ही देना
दुसरे करते हैं
विश्वास से खिलवाड़
तुम मत करना
कोई कितना भी
रिश्ते को बदनाम करे
तुम निभाते रहना
अपनी नीयत पर डटे रहना
चाहे धरती डोले
या गिरने वाला हो आसमान
————–

लेखक को अपने रचनाकर्म से ही प्रतिबद्ध होना चाहिऐ


एक लेखक को अपनी रचनाओं के साथ अपनी भावनाओं को जोड़कर आगे बढ़ना चाहिऐ पर तब का जब तक वह उस पूरा न कर ले- उसके पश्चात उसे वहां से त जाना चाहिए और उसके मूल्याकन का दायित्व पाठकों पर छोड़ देना चाहिए। एक पाठक को भी कभी लेखक से यह सवाल नहीं करना चाहिए कि क्या वह जजबात अभी भी उसके अन्दर हैं जो रचना के समय थे।

मैं जब कोई रचना लिखता हूँ तो पूरी तरह उसमें डूबने का प्रयास ही नहीं करता क्योंकि मुझे लिखना है यह भाव इस कद्र मेरे अन्दर आ जाता है कि मुझे इसके लिए कोई अधिक विचार नहीं करना पड़ता। अपने विचारों के क्रम को बग़ैर देखे आगे जाने देता हूँ जहाँ मैं उसे जुड़ने का प्रयास करता हूँ रचना गड़बड़ा जाती है। लिखने के लिए ही प्रतिबद्धता के चलते ही मुझे कभी कोई ठिकाना नहीं मिला, क्योंकि जब एक लेखक के रुप में अपने लिए कोई समूह या वर्ग ढूँढेंगे तो वह आप पर अपने हिसाब से अपनी शर्तों पर लिखने के लिए दबाव डालेगा- और तब अपना मौलिक चिन्तन और मनन खो बैठेंगे। आधुनिक हिंदी साहित्य में प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी’निराला’, जय शंकर प्रसाद और रामधारी सिंह दिनकर के बात यदि कोई लब्ध प्रतिष्ठत लेखक नहीं हुआ तो उसका कारण यही है कि बाद के काल में लेखक की लेखन से कम उससे होने वाली उपलब्धि पर ज्यादा दृष्टि अधिक रही है। श्रीलाल शुक्ल, हरिशंकर परसाईं, और शरद जोशी जैसे चन्द लेखक ही हैं जो बाद के काल में अपनी छबि बना सके।

लेखक का काम है लिखना! अपनी रचना को साहित्यक ढंग से पाठको के समक्ष प्रस्तुत करना न कि एक समाचार के रुप में प्रस्तुत करना। गरीब की वेदना, अमीर का तनाव और मध्य वर्ग के भावनात्मक संघर्ष पर उसका दृष्टिकोण एक समान रहना चाहिऐ, उसे इस बात से कोई मतलब नहीं रखना चाहिए कि उसके लिखने की किस पर क्या प्रतिक्रिया होगी। उसे केवल इस बात पर ध्यान देना चाहिऐ कि उसका पाठक कोई भी हो सकता है और किसी भी वर्ग का। महिला भी हो सकते है और पुरुष भी , बच्चा भी हो सकता है और बूढा भी , अधिक शिक्षित भी हो सकता है और कब भी। पिछले कई सालों में प्रतिबद्ध लेखन के वजह से लेखकों के कई वर्ग बने जिसने सुरुचिपूर्ण और सार्थक लेखन के प्रवाह को अवरुद्ध किया और पाठक अच्छी रचनाओं को तरस गये और इसी कारण लोग आज भी अच्छी रचनाओं को ढूँढ रहे हैं। प्रतिबद्ध लेखन से कभी भी अच्छी रचनाओं की उम्मीद नहीं की जाना चाहिए। कुछ लोग केवल गरीबी के बारे में लिखकर अपनी छबि चमकते रहे तो कुछ लोग अमीरों के छत्रछाया में विकास के बारे में लिखकर पाने लिए सुविधाये जुटाते रहे, अपनी रचनाओं में जज्बातों को भरने में उनकी नाकामी ने पाठकों को अच्छी रचनाओं से महरूम कर दिया।

प्रसिद्ध लेखक तो बहुत हैं पर उनकी रचनाएँ कितनी प्रसिद्ध हैं यह सभी जानते हैं। लिखा बहुत जा रहा है पर पढने लायक कितना है और कितना सामयिक है और कितना है और कितना दीर्घ प्रभावी यह हम सभी जानते हैं। पत्रकार और लेखक में अन्तर ही नहीं समझते। पत्रकार अपने समाचारों में जबरन जज्बात भरने का प्रयास करते हैं तो लेखक अपनी रचनाओं को समाचार के रुप में प्रस्तुत करते हैं । सभी लोग कहते हैं कि हिंदी में अच्छे लेखकों की कमी है पर यह कोई नहीं कहता कि वास्तव में लेखकों को संरक्षण देने वालों की कमी है। जिनमे उन्हें संरक्षण देने की क्षमता है वह उनका उपयोग एक मुनीम की रुप में करना चाहते हैं। समाचारपत्र-पत्रिकाएँ आजकल पुराने रचनाकारों को छापकर वाह -वाही लूट रहे क्योंकि उन्हें कुछ रकम देना नहीं पड़ती। केवल यही बात नहीं है बल्कि वह यह भी नहीं चाहते कि कोई नया लेखक उनके वजह से प्रतिष्ठित हो जाये, इसीलिये प्रतिष्ठित लोगों को ही लेखक पेश कर रहे हैं। मैं स्वयं अच्छी रचनाओं के लिए तरसता हूँ क्योंकि अगर आप अच्छा लिखना चाहते हैं तो अच्छा पढ़ें भी-ऎसी मेरी मान्यता है । जब मुझे अच्छा पढने को नहीं मिलता तो मैं अपनी ही धर्म ग्रंथों को पढना शुरू कर देता हूँ तो मुझे लगता है कि उनकी विषय सामग्री आज भी सामयिक है। उनमें मुझे एक बात साफ लगती है कि उनके रचनाकार केवल अपनी रचनाओं के लिए ही प्रतिबद्ध थे। (क्रमश:)

रंग बदलता सौन्दर्य-कविता


प्रात: काले नाग की तरह
धरती पर फैली सडक
उसके दोनों और खडे
हरे-भरे फलदार वृक्ष
और रंगबिरंगी इमारतें
देखने योग्य सौन्दर्य

आंखों से देखकर
चाहत होती है कि
समेट कर रख लें
अपने हृदय पटल पर
पर यह मुमकिन न्हीएँ होता
हर पल आसमान में
अपनी गति से चलता सूर्य
उगने से डूबने तक की प्रक्रिया में
कुछ भी स्थिर नहीं रहने देता
न दृश्य, न दर्शक और
न वह सौन्दर्य

प्रात: जो दृश्यव्य लगता है
भरी दोपहर में वीभत्स हो जाता है
सायंकाल में शांत
और रात्रि में खो जाता है
अकेला रह जाता है सौन्दर्य

समय और काल से
रंग बदलता रहता है सौन्दर्य
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सास-बहु का झगडा, पडोसियों के मत्थे पडा


उनके दोनो बेटे-बहु प्रतिवर्ष की भांति भी इस वर्ष अपने माता-पिता के पास रहने के लिए आये। अब पति-पत्नी अकेले ही रहते थे। पति अब रिटायर हो गये थे, और दोनों ही सुबह, दोपहर और शाम एक मंदिर में जाते थे। उनके दोनों लड़के पढने के बाद शहर से बाहर नौकरी कर रहे थे और उनकी अच्छी आय थी। अपने माता-पिता से मिलने वह साल में पांच-छ: बार जरूर आते थे पर विवाह के बाद पिछले तीन वर्षों में यह आगमन केवल एक वर्ष तक रह गया था। इधर उनके पिताजी भी रिटायर हो गये थे। रिटायर होने से पूर्व भी पति महोदय दिन में दो बार अपनी पत्नी को सुबह-शाम जरूर मंदिर गाडी पर बैठा कर जरूर ले जाते थे, अब वह क्रम तीन बार हो गया था। उनकी पत्नी अपने मंदिर जाने का प्रदर्शन पडोस में जरूर करतीं और बार-बार अपने धर्मभीरू होने की चर्चा अवश्य करती थी। और कभी-कभी बिना किसी आग्रह के ज्ञान भी देतीं देती थी। उनका मंदिर घर से दो किलोमीटर दूर था और किसी दिन गाडी खराब हो या पति महोदय का स्वास्थ्य ठीक न हो तो उन्हें अनेक ताने सुनने को मिलते। वह कभी घर से मंदिर तक पैदल नहीं गयीं।

उस दिन वह अपनी बहुओं पर अपना ज्ञान बघार रहीं थीं-“अपने शरीर को चलाते रहना चाहिए, वरना लाचार हो जाता है अब देखो तुम्हारे ससुर कभी नाराज होकर मंदिर नहीं ले जाते तो मैं पैदल ही चली जाती हूँ कभी भी झगडा नहीं करती- अपने पति से कभी भी झगडा नहीं करना चाहिए। बिचारे पुरुष तो जीवन भर कमाने में ही समय गंवाते हैं।” वगैरह……..वगैरह।

इधर वह अपने पति के साथ मंदिर गयी और उधर उनकी बहुओं ने पडोसियों से बातचीत शुरू की और फिर उसने सासके दावे की इस तरह सत्यता का पता लगाने का प्रयास किया कि वह बिचारे समझ नहीं पाए ।

एक पडोसन बोली -“हमने तो कभी भी तुम्हारी सास को पैदल जाते हुए नहीं देखा, अगर गाडी खराब हो या उनका मन न हो या उनके कोई रिश्तेदार आ गये हौं तो मंदिर न ले जाने के लिए उनको हजार ताने देतीं हैं। तुम्हारे ससुर तो सीधे हैं सब सह जाते हैं।”

बहुओं की ऑंखें खुल गयीं, उन्हें अपनी सास पर वैसे भी यकीन नहीं था- और अब तो पडोसियों से भी पुष्टि करा ली थी। उन्होने अपने-अपने पतियों को उनकी माँ की पोल बतायी-हालांकि पडोसन ने आग्रह किया था कि वह ऐसा न करे क्योंकि उनके जाने के बाद उनकी सास उनसे लडेगी।

इधर उनके बहु-बेटे अपने घरों को रवाना हुए और उधर वह अपने पडोसियों पर पिल पडी-“तुम लोगों से किसी का सुख देखा नहीं जाता। मेरी बहुओं को भड़काती हो। अब देखना जब तुम्हारे घर में बहुएँ आयेंगी तो मैं भी यही करूंगी।”

एक पडोसन बोली-“हमें क्या पता था कि तुम्हारी बहुएँ चालाकी करेंगी। पता नहीं तुमसे क्या बात नमक मिर्च लगाकर कह गयीं हैं।” मगर वह नहीं रुकीं और बोलतीं गयी-“तुम लोगों का क्या मतलब? मैं अपनी बहुओं से कुछ भी कहूं। तुन कौन होती हो बीच में दखल देने वाली …..”

उन्होने और भी बहुत कुछ कहा और इस तरह सास-बहु का झगडा पडोसियों के मत्थे आ चूका था।
नोट-यह कहानी काल्पनिक है