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नतीजा यह कि कोई सुखी नहीं-हास्य व्यंग्य (natija yah ki koyee sukhi nahin-hasya vyanaya)


पश्चिमी वैज्ञानिकों ने एक शोध किया है जिसके अनुसार लोग अपने दुःख से कम दूसरे के सुख से अधिक तनाव ग्रस्त रहते हैं। 24 देशों के 19 हजार लोगों पर यह शोध किया गया है। इससे पता चलता है कि लोग अपने वेतन कम होने से नहीं बल्कि दूसरे की ज्यादा है इससे ज्यादा परेशान हैं। अब यह पता नहीं कि इसमें अपना देश शामिल है कि नहीं पर इतना संतोष है कि 23 दूसरे देश भी इसमें शामिल हैं जहां अपनी तरह के लोग रहते हैं। अगर अकेले अपने देश की बात होती तो कितना तनाव बढ़ता यह समझ ही सकते हैं।
आश्चर्य इस बात का है कि पश्चिमी विज्ञान तथा शिक्षा संस्थाओं को हर चीज के लिये अनुसंधान की आवश्यकता होती है। वह आज जिस विषय पर शोध कर अपना निष्कर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं उस पर हमारे देश की राय बहुत पुरानी है। यही कारण है कि हमारे देश के अध्यात्मिक महापुरुष हमेशा ही ईर्ष्या और द्वेष से दूर रहने की बात करते हैं-यह अलग बात है कि लोग सुनते खूब हैं पर उस पर अमल नहीं करते।
अपने यहां तो इस संबंध में अनेक कथायें हैं। एक भक्त की भक्ति पर सर्वशक्तिमान प्रसन्न हो गये और उससे वरदान मांगने को कहा। उसने कहा कि ‘भगवान मेरे पड़ौस में सभी बड़े लोग रहते हैं एक में ही तुच्छ आदमी यहां फंसा हूं। अतः ऐसा कुछ करिये कि मैं भी सभ्रांत वर्ग में आ जाऊं।’
सर्वशक्तिमान ने कहा‘तथास्तु! मगर पड़ौस की समस्या तो भाग्य से आई है उसे मैं बदल नहीं सकता। अलबत्ता तुम्हारा कल्याण करने का मेरा दायित्व है। इसलिये तुम्हारे पास ढेर सारा धन आयेगा। तुम जैसी चाहत करोगे वैसा होगा पर पड़ौसी के पास उससे दुगुना जायेगा। इसे मैं बदल नहीं सकता।’
सर्वशक्तिमान ने वरदान दिया और गायब हो गये।
उस भक्त ने कहा-‘मुझे अपनी पत्नी के लिये दो कंगन चाहिए।’
तत्कला कंगन वहां प्रकट हो गये, मगर पड़ौसन के घर चार गये।
भक्त ने कहा-‘मुझे एक कार चाहिये।
कार आ गयी वह वातनुकूलित पर पड़ौसी के पास दो पहुंच गयी।
भक्त अपनी उपलब्धि में यह भूल गया कि पड़ौसी उसकी तपस्या का बिना किसी मेहनत के दोगुना लाभ उठा रहा है।
इधर पत्नी कंगन लेकर पड़ौसन के पास पहुंची और इतराती हुई बोली-‘‘हमारे वो दो कंगन लाये हैं। साथ में एक जोरदार वातानुकूलित कार भी खरीदी है।’
पड़ौसन बोली-उंह! मेरे पति चार कंगन ले आये हैं और दो कार खरीदी हैं। हमारे से तो तुुम्हारी तुलना न कल थी और न आज है।’
भक्त की पत्नी तो जैसे जमीन पर आकर गिरी। घर आकर पति से लड़ते हुए बोली-‘चाहे कुछ भी हो जाये। हम फकीर हो जायें पर पड़ौसी अधिक अमीर नहीं बनना चाहिये।’
भक्त सहम गया उसने पहले तो अपने कंगन और कार गायबी की जिससे पड़ौसी को दुगुनी हानि हुई। अब उसने कहा कि-‘मेरी एक आंख फूट जाये, एक हाथ निकल जाये।’
पड़ौसी की दोनों आंखें चली गयी और हाथ भी। ऐसा प्राकृतिक संकट देखकर सर्वशक्तिमान प्रकट हुए और भक्त से बोल -‘यार, भ्रमित होकर तुम्हें वरदान दे गया था सो वापस ले रहा हूं। इस तरह की खुराफात करना हमारे धर्म के विरुद्ध है। ये ले अपनी एक आंख और एक हाथ ताकि पड़ौसी संकट से मुक्त हो जाये।’
भक्त को गुस्सा आया और वह बोला-‘यह क्या? आंख और हाथ मेरे हैं अगर में उनको त्याग रहा हूं तो उससे आपका क्या मतलब?’’
सर्वशक्तिमान बोले-‘यह महान त्याग है, पर मेरे पास दूसरा वरदान देने का अधिकार नहीं है क्योंकि घर से निकलते हुए पत्नी ने मुझे चेता दिया था कि अगर अब ऐसा हुआ तो घर में घुसने नहीं दूंगी।’
पुरानी कहानी है जिसे हास्य रूप में प्रस्तुत किया गया है। पश्चिम वैज्ञानिक अगर भारतीय अध्यात्म दर्शन तथा पंचतंत्र में से कहानियां उठाकर देखें तो उनको अनेक प्रकार के प्रयोग करने के लिये पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मगर उनसे क्या कहें देश के बुद्धिजीवियों के ही बुरे हाल हैं सभी विदेशियों के प्रशंसक हैं। अपने अध्यात्म ज्ञान में तो उनको पोंगापंथी दिखाई देती है। अब देखना इसी पश्चिमी निष्कर्ष पर बुद्धिजीवी समाज बहस करता दिखेगा। जहां तक हम जैसे आम लोगों का सवाल है ऐसे अनेक निष्कर्षों से अपने महापुरुषों की कृपा से पहले से ही अवगत है। यही कारण है कि दूसरे के सुख को देखकर मुंह फेर लेते हैं कि कहीं अपने दुःख न याद आने लगें। वह सुख उससे छोड़ दे इसकी तो कामना भी नहीं करते। इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि इससे केवल अपना खून जलता है। इस सच को भी जानते हैं कि भारत में गरीबी, बेकारी और भ्रष्टाचार चाहे कितना भी है पर लोग दुःखी इस बात से अधिक हैं कि उनके आसपास के लोग सुखी हैं। नतीजा यह है कि कोई सुखी नहीं है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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सर्वशक्तिमान और शैतान-हिन्दी हास्य व्यंग्य कथा


सर्वशक्तिमान को यह अहसास होने लगा था कि संसार में उनका नाम स्मरण कम होता जा रहा था। दरअसल अदृश्य सर्वशक्तिमान सारे संसार पर अनूभूति से ही नियंत्रण करते रहे थे और लोगों की आवाज तभी उन तक पहुंचती थी जब उनके हृदय से निकली हो। अपनी अनुभूति के परीक्षण के लिये उन्होंने वायु को बुलाया और उससे पूछा-’यह बताओ, मनुष्यों ने मेरे नाम का स्मरण करना क्या बंद कर दिया है या तुमने ही उनको मेरे पास तक लाने का काम छोड़ दिया है। क्योंकि मुझे लग रहा है कि मेरा नाम जपने वाले भक्त कम हो रहे हैं। उनके स्वरों की अनुभूति अब क्षीण होती जा रही है।
वायु ने कहा-‘मेरा काम अनवरत चल रहा है। बाकी क्या मामला है यह आप जाने।’
सर्वशक्तिमान ने सूर्य को बुलाया। उसका भी यही जवाब है। उसके बाद सर्वशक्तिमान ने प्रथ्वी, चंद्रमा, जलदेवता और आकाश को बुलाया। सभी ने यही जवाब दिया। अब तो सर्वशक्तिमान हैरान रह गये। तभी अपनी अनूभूति की शक्ति से उनको लगा कि कोई एक आत्मा उनके पास बैठकर ऊंघ रहा है-उसके ऊंघने से तरीके से पता लगा कि वह अभी अभी मनुष्य देह त्याग कर आया है। उन्हें हैरानी हुई तब वह नाराज होकर उससे बोले-‘अरे, तूने कौनसा ऐसा योग कर लिया है कि मेरे दरबार तक पहुंच गया है। जहां तक मेरी अनुभूतियों की जानकारी है वहां ऐसा कोई मनुष्य हजारों साल से नहीं हुआ जिसने कोई योग वगैरह किया हो और मेरे तक इस तरह चला आये।
उस ऊंघते हुए आत्मा ने कहा-‘मुझे मालुम नहीं है कि यहां तक कैसे आया? वैसे भी आप तक आना ही कौन चाहता है। मैं भी माया के चक्कर में था पर वह भाग्य में आपने नहीं लिखी थी-ऐसा मुझे उस शैतान ने बताया जिसने अपनी मजदूरी का दाम बढ़ाने की बात पर ठेकेदार से झगड़ा करवा कर मुझे मरवा डाला। वही यहां तक छोड़ गया है।’
अपने प्रतिद्वंद्वी का नाम सुनकर परमात्मा चकित रह गये। फिर गुस्सा होकर बोले-‘निकल यहां से! शैतान की इतनी हिम्मत कि अब मुझ तक लोगों को पहुंचाने लगा है। वह भी ऐसे आदमी को जिसने मेरा नाम कभी लिया नहीं।’
उस आत्मा ने कहा-लिया था न! मरते समय लिया था दरअसल मुंह से निकल गया था। यह उस शैतान की कारिस्तानी या मेरा दुर्भाग्य कह सकते हैं। शैतान ने मुझे पकड़ा और बताया सर्वशक्तिमान कहना है कि जो मेरा नाम आखिर में लेता है वह मुझे प्राप्त होता है। चल तुझे वहां छोड़ आता हूं। कहने लगा कि स्वर्ग है यहां पर! मुझे तो कुछ भी नज़र नहीं आ रहा। न यहां टीवी है और न ही फ्रिज है और न ही यहां कोई कार वगैरह चलती दिख रही है। सबसे बड़ी बात यह कि वह शैतान कितना सुंदर था और एक आप हो कि दिख ही नहीं रहे।’
शैतान होने के सुंदर होने की बात सुनकर सर्वशक्तिमान के कान फड़कने लगे वह बुदबुदाये-‘यह शैतान सुंदर कब से हो गया।’
उन्होंने तत्काल अपना चमत्कारी चश्मा पहना जिससे उनको अपनी पूर्ण देह प्राप्त हुई। वह आत्मा खुश हो गया और बोला-‘अरे, आओ शैतान महाराज! यह कहां नरक में छोड़ गये।’
सर्वशक्तिमान नाराज होकर बोले-‘कमबख्त! मैं तुझे शैतान नज़र आ रहा हूं। वह तो काला कलूटा है। मैं तो स्वयं सर्वशक्तिमान हूं।’
वह आत्मा बोला-‘क्या बात करते हो? अभी अभी तो मुझे वहां से ले आये।’
सर्वशक्तिमान के समझ में आ गया। उन्होंने आत्मा को वहां से धक्का दिया तो वह आत्माबोला-‘आप ऐसा क्यों कर रहे हो।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘तूने धरती से विदा होते समय मेरा नाम लिया तो यहां आ गया और अब शैतान का नाम लिया तो वहीं जा।’
वह आत्मा खुश होकर वहां से जमीन पर चला आया। इधर सर्वशक्तिमान ने हुंकार भरी और शैतान को ललकारा। वह भी प्रकट हो गया और बोला-‘क्या बात है? मैं नीचे बिजी था और तुमने मुझे यहां बुला लिया।’
उसका नया स्वरूप देखकर सर्वशक्तिमान चकित रहे गये और उससे बोले-कमबख्त! तेरी इतनी हिम्मत तू मेरा रूप धारण कर घूम रहा है।’
शैतान हंसा और बोला-हमेशा ही बिना भौतिक रूप के यहां वहां पड़े रहते हो। न तो सुगंध ग्रहण करते हो न किसी चीज का स्पर्श करते हो। न सुनते हो न कुछ कहते हो। केवल अनुभूतियों के सहारे कब तक मुझसे लड़ोगे। अरे, मुझे यह रूप धारण किये सदियां बीत गयी। तुम्हें होश अब आ रहा है। एक आत्मा पहुंचाया था उसे भी यहां से निकाल दिया।’
सर्वशक्मिान ने कहा-‘पर यह तुमने मेरे रूप को धारण कैसे और क्यों किया? मैंने तुम्हें कभी इतना सक्षम नहीं बनाया।’
शैतान ने कहा-‘क्यों अक्ल तो है न मेरे पास! तुम्हारे ज्ञान को मैंने ग्रहण कर लिया जिसमें तुमने बताया कि जिसका नाम लोगे वैसे ही हो जाओगे। मैं तुम्हारा नाम लेता रहा। उसका मतलब तुम्हारी भक्ति करना नहीं बल्कि तुम्हारे जैसा रूप प्राप्त करना था। सो मिल गया। तुम तो यही पड़े रहते हो और तुम्हारी पत्थर की मूर्तियां और पूजागृह नीचे बहुत खड़े हैं। सभी में मेरा प्रवेश होता है। दूसरा यह कि मैं क्रिकेट, फिल्म तथा तुम्हारे सत्संगों में सुंदर रूप लेकर उपस्थित रहता हूं। अपना रूप बदला है नीयत नहीं। लोग मेरा चेहरा देखकर इतना अभिभूत होते है कि मुझे ही सर्वशक्तिमान मान बैठते हैं। मेरे अनेक सुंदर चेहरों की तो फोटो भी बन जाती है। फिर तुम जानते हो कि माया नाम की सुंदरी जिसे तुमने कभी स्वीकार नहीं किया मेरी सेवा में रहती है। तुम्हें यह सुनकर दुःख तो होगा कि काम मैं करवाता हूं बदनामी में नाम तुम्हारा ही जुड़ता है। जो लोग तुम्हें नहीं मानते वह तो नाम भी नहीं लेते पर जो लेते हैं वह भी यही कहते हैं कि ‘देखो, सर्वशक्तिमान के नाम पर क्या क्या पाप हो रहा है।’
शैतान बोलता गया और सर्वशक्तिमान चुप रहे। आखिर शैतान बोला’-‘सुन लिया सच! अब में जाऊं। मेरे भक्त इंतजार कर रहे होंगे।’
सर्वशक्तिमान ने हैरानी से पूछा-‘तुम्हारे भक्त भी हैं संसार में!
शैतान सीना फुला कर बोला-‘न! सब तुम्हारे हैं! मैं तो उन्हें दिखता हूं और तुम्हारे नाम से वह मुझे पूजते हैं। तो मेरे ही भक्त हुए न!’
शैतान चला गया और सर्वशक्तिमान ने अपना चमत्कारी चश्मा उतार दिया।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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