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भगवान श्रीराम और कृष्ण ने जन्म से नहीं कर्म से भगवत्स्वरूप प्राप्त किया-हिन्दी लेख (bhagwan shir ram and shri krishna-hindi article)


अगर रावण ने भगवान राम की भार्या श्रीसीता का अपहरण न किया होता तो क्या दोनों के बीच युद्ध होता? कुछ लोग इस बात की ना हामी भरें पर जिन्होंने बाल्मीकि रामायण को पढ़ा है वह इस बात को मानते हैं कि राम रावण का युद्ध तो उसी दिन तय हो गया था जब ऋषि विश्वमित्र की यज्ञ की रक्षा के लिये भगवान श्री राम ने मारीचि और सुबाहु से युद्ध किया। सुबाहु इसमें मारा गया और मारीचि तीर खाकर उड़ता हुआ दूर जाकर गिरा था और बाद के मृग का वेश बनाकर उसने रावण की सीता हरण प्रसंग में सहायता की थी।
भारतीय दर्शन के पात्रों पर लिखने वाले एक उपन्यासकार कैकयी को चतुर राजनेता और भद्र महिला बताया है। शायद यह बात सच भी हो क्योंकि मारीचि और सुबाहु से युद्ध के बाद शायद कैकयी ने यह अनुभव किया था कि अब रावण कभी भी अयोध्या पर हमला कर सकता है। दूसरा रावण उस समय एक आतंक था और कैकयी ने अनुभव किया श्रीराम ही उसका वध करें इसलिये उसे उनको बनवास भेजने की योजना बनाई। ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि मंथरा की मति देवताओं ने ही भ्रमित करवाई थी क्योंकि श्रीराम उस समय के महान धनुर्धर थे और रावण को ही मार सकते थे। ऐसे में श्रीराम का वहां रहना ठीक नहीं है यह सोचकर ही कैकयी ने उनको बनवाय दिया-ऐसा उपन्यासकार का मानना है। दूसरा यह भी कि रावण के हमले से अयोध्या की रक्षा करने के प्रयास में पराक्रमी श्री राम का कौशल प्रभावित हो सकता यह संभावना भी थी। फिर जब उनके हाथ से रावण का वध संभव है कि तो क्यों न उनको वही भेज दिया जाये। संभवत कैकयी को यह अनुमान नहीं रहा होगा कि श्रीसीता का वह अपहरण करेगा मगर उस समय की राजनीिितक हालत ऐसे थे कि रणनीतिकार रावण के पतन के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। वैसे भी रावण ने श्रीराम को अपने यहां लाकर उनको मारने की योजना के तहत ही सीता जी का अपहरण किया था।
वन प्रवास के दौरान जब श्रीराम अगस्त्य ऋषि के यहां गये तो वहां इं्रद पहले से ही विराजमान थे और उनको आता देखकर तुरंत चले गयंे। दरअसल वह राम रावण के संभावित युद्ध के बारे में बातीचत करने आये थे। ऋषि अगस्तय ने वहां श्रीराम को अलौकिक हथियार दिये जो बाद में रावण के युद्ध के समय काम आये। कहा जाता है कि वानरों की उत्पति भी भगवान श्री राम की सहायतार्थ देवताओं की कृपा से हुई थी। इस तरह राम के विवाह से लेकर रावण वध तक अदृश्य राजनीतिक श्ािक्तयां भगवान श्रीराम का संचालन करती रहीं। वह सब जानते थे पर अपना धर्म समझकर आगे बढ़ते रहे।
आज जब हम देश के राजनीतिक स्थिति को देखते हैं तो केवल दृश्यव्य चरित्रों को देखते हैं और अदृश्यव्य ताकतों पर नज़र नहीं जाती। ऐसे में हमारे आराध्य भगवान श्री राम और श्रीकृष्ण के जीवन को व्यापक ढंग से देखने वाले इस बात को समझ पाते हैं कि किस तरह रामायण और श्रीगीता के अध्यात्म पक्ष को अनदेखा किया जाता है जो कि हमारे धर्म का सबसे मज़बूत पक्ष है।
हम थोड़ा श्रीकृष्ण जी के चरित्र का भी अवलोकन करें। मथुरा के कारावास में जन्म और वृंदावन में पलने वाले श्रीकृष्ण जी के जीवन का सवौच्च आकर्षक रूप महाभारत में दिखाई देता है जहां उन्होंने कुशल सारथी की तरह अपने मित्र अर्जुन के साथ ही उनके रथ का भी संचालन किया। भगवान श्रीराम की तरह स्वयं उन्होंने युद्ध नहीं किया बल्कि सारथि बनकर पूरे युद्ध को निर्णायक स्थिति में फंसाया। हम महाभारत का अध्ययन करें तो इस बात का पता लगता है कि अनेक तत्कालीन बुद्धिमान लोगों को यह लगने लगा था कि अंततः कौरवों तथा पांडवों में कभी न कभी युद्ध जरूर होगा। भगवान श्रीकृष्ण इस बात को जानते थे इसलिये कभी दोनों के बीच वैमनस्य कम करने का प्रयास न कर पांडवों की सहायता की । दरअसल कुछ लोग मानते हैं कि महाभारत युद्ध की की नींव कौरवों और पांडवों में जन्म के कारण पड़ी है पर यह सच नहीं है। महाभारत की नींव तो द्रोपदी के विवाह के समय ही पड़ गयी थी जब अपने स्वयंवर में द्रोपदी ने सूतपुत्र कर्ण का वरण करने से इंकार किया था फिर विवाह बाद कुंती के वचन की खातिर उसे पांच भाईयों की पत्नी बनना पड़ा। द्रोपदी श्रीकृष्ण की भक्त थी और वे शायद इसे कभी स्वीकार नहीं कर पाये कि एक क्षत्राणी मां है तो उसका वचन धर्म की प्रतीक बन गया और दूसरी पत्नी है तो उसे वस्तु मानकर उस पर वह वचन धर्म की तरह थोपा गया। मां के रूप में कुंती पूज्यनीय है तो क्या द्रोपदी पत्नी के रूप में तिरस्काणीय है? जब भगवान श्रीकृष्ण युद्ध से पहले बातचीत करने दुर्योधन के महल में जा रहे थे तब द्रोपदी ने उनसे यही आग्रह किया कि किसी भी तरह यह युद्ध होना चाहिए।
श्रीकृष्ण उस समय मुस्कराये थे। अधर्म और धर्म के बीच की लकीर का वह अंतर जानते थे और वह धर्म की स्थापना के लिये अवतरित हुए थे। उनके लिये पांडवों और कौरव दोनों ही निर्मित मात्र थे जिनके बीच यह युद्ध अनिवार्य था। वह न कौरवों के शत्रु थे न पांडवों के मित्र! वह केवल धर्म के मित्र थे और भक्तों के आश्रय दाता थे। अपनी भक्त द्रोपदी के अपमान का बदला लेने में उनके धर्म स्थापना का मूल छिपा हुआ था। जिसे उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता का संदेश स्थापित कर प्राप्त किया।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण जी का चरित्र जनमानस में हमेशा ही प्रभावी रहा है शायद इसी कारण ही संवेदनाओं के आधार पर काम करने वाले उनके नाम की आड़ अवश्य लेते हैं। ऐसा करते हुए वह केवल आस्था की बातें करते हैं पर ज्ञान पक्ष को भुला देते है-सच तो यह है कि ऐसा वह जानबुझकर करते हैं क्योंकि ज्ञानी आदमी को बहलाया नहीं जा सकता। उसके ज्ञान चक्षु हमेशा खुले रहते हैं और वह सभी में परमात्मा का स्वरूप देखता है पर संवदेनशीलता का दोहन करने वाले सीमित जगहों पर आस्था का स्वरूप स्थापित करते हैं। पहले तो पेशेवर संतों की बात करें जो भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की बाललीलाओं के आसपास ही अपनी बात रखते हें। इससे महिलाओं का कोमल मन बहुत प्रसन्न हो जाता है और वह अपने बाल बच्चों में भी ऐसे ही स्वरूप की कामना करती हैं तो पुरुष भी तन्मय हो जाते हैं। धनुर्धर । श्री राम और सारथी श्रीकृष्ण के जन्म तथा बाललीलाओं में तल्लीन रहने वालों को उनके संघर्ष तथा उपलब्धियों में रुचि अधिक नहीं दिखती।
अब तो भक्तों का ध्यान लीलाओं से अधिक जन्म स्थानों पर केंद्रित किया जा रहा है। अयोध्या में भगवान राम की जन्मभूमि और मथुरा में श्रीकृष्ण का जन्मस्थान विवादों के घेरे में है। बरसों तक नहीं सुना था पर अब बरसों से सुन भी रहे हैं। सच क्या है पता नहीं? कभी कभी तो लगता है देश की धार्मिक आस्थाओं के दोहन के लिये यह सब हो रहा है तो कभी लगता है कि वाकई कोई बात होगी। ऐसे में हम जैसे आम भक्त और लेखक अपनी कोई भूमिका नहीं देख पाते खासतौर से जब जब श्रीमद्भागवत गीता की तरफ ध्यान जाता है। श्रीगीता में जन्म से अधिक निष्काम कर्म को मान्यता दी गयी है। भगवान श्रीराम ने रावण के युद्ध के समय केवल उसे मारने का ही लक्ष्य किया था तब वह इतना एकाग्र थे कि वहां पर अपने प्रिय भ्राता भरत को भी मदद के लिये याद नहीं किया। लक्ष्मण ने भी अपनी तरह आक्रामक रहने वाले शत्रुध्न को को एक आवाज तक नहीं दीं। इससे भी यह लगता है कि दोनों भाई यह समझ गये थे कि अयोध्या पर संकट न आये इसलिये ही रावण वध के प्रसंग में उनको लिप्त होना ही है। उसी तरह भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता संदेश मेें अपने श्रीमुख से किसी का नाम तक नहीं लिया। उस श्री राधा का भी नहीं जिसके साथ उनका नाम प्रेम प्रतीक में रूप में लिया जाता है। उस सुदामा का भी स्मरण नहीं किया जिनके साथ उनकी मित्रता सर्वोपरि मानी जाती है। पिता वासुदेव और देवकी के लिये भी एक शब्द नहीं कहा। स्पष्टतः वह इस संसार के रहस्य को उद्घाटित करते रहे जो बनता बिगड़ता रहता है और जहां जन्म स्थान तथा दैहिक संबंध परिवर्तित होते रहते हैं। अपने जन्मस्थानों या शहर से भी कोई सद्भाव भी दोनों ने नहीं दिखाया। सच तो यह है कि भगवान श्रीराम के लिये पूरा संसार ही अयोध्या तो श्रीकृष्ण के लिये यह द्वारका रहा। इस चर्चा को मतलब किसी विवाद पर निष्कर्ष देना नहीं है बल्कि यह एक सत्संग चर्चा है। लोग विवादों को उठायें उनको कोई रोक नहीं सकता। वह लोग अज्ञानी हैं या आस्था से उनका कोई लेना देना नहीं है यह कहना भी अहंकार की श्रेणी में आता है। अलबत्ता एक अध्यात्मिक लेखक के रूप में अपने जैसे लोगों के लिये कुछ लिखने का मन हुआ तो लिख दिया। आखिर यह कैसे संभव है कि जब सारे देश में चर्चा चल रही है उस पर लिखा न जाये। एक बात याद रखने वाली है कि भगवान श्रीराम और कृष्ण अपने जन्म की वजह से नहीं कर्म की वज़ह से भगवत्स्वरूप प्राप्त कर सके यह नहीं भूलना चाहिए।
जय श्रीराम जय श्रीकृष्ण

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मनु स्मृति दर्शन-संगीत का आनंद लेकर सोयें (manu smriti-sangeet ka anand)


आजकल रेडियो या टेप में संगीत सुनने की बजाय टीवी और वीडियो पर उसका आनंद उठाने का प्रयास किया जा रहा है। सच तो यह है कि टीवी में हम आंख तथा कान दोनों को सक्रिय रखते हैं इसलिये मजा उठाने से अधिक कष्ट मिलता है। संगीत सुनने का आनंद तो केवल कानों से ही है। वैसे शायद यही वजह है कि टीवी पर हर शो में फिल्मी गानों को पृष्ठभूमि में जोड़कर दृश्य को जानदार बनाने का प्रयास किया जा रहा है। किसी धारावाहिक में अगर पात्र गुस्से में बोल रहा है तो भयानक संगीत का शोर जोड़कर उसे दमदार बनाने का प्रयास शायद इसलिये ही किया जाता है कि आजकल का अभिनय करने वाले पात्रों को न तो कला से मतलब है न उनमें योग्यता है। बहरहाल संगीत मानव मन की कमजोरी है और जहां तक मनोरंजन मिले वहां तक सुनना चाहिये। अति तो सभी जगह वर्जित है।
तत्र भुक्तपर पुनः किंचित्तूर्यघोषैः प्रहर्षितः।
संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्च गतक्लमः।
हिन्दी में भावार्थ-
भोजन करने के बाद गीत संगीत का आनंद उठाना चाहिये। उसके बाद ही शयन के लिये प्रस्थान करना उचित है।
एतद् विधानमातिष्ठेदरोगः पृथिवीपतिः।
अस्वस्थः सर्वमेत्त्ु भृत्येषु विनियोजयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
स्वस्थ होने पर अपने सारे काम स्वयं ही करना चाहिये। अगर शरीर में व्याधि हो तो फिर अपना काम विश्वस्त सेवकों को सौंपकर विश्राम भी किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक तरफ मनुस्मृति में प्रमाद से बचने का सुझाव आता है तो दूसरी जगह भोजन के बाद गीत संगीत सुनने की राय मिलती है। इसमें कहीं विरोधाभास नहीं समझा जा सकता। दरअसल मनुष्य की दिनचर्या को चार भागों में बांटा गया है। प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सायं काम या मनोरंजन तथा रात्रि मोक्ष या निद्रा के लिये। जिस तरह आजकल चारों पहर मनोरंजन की प्रवृत्ति का निर्माण हो गया है उसे देखते हुए मनृस्मृति के संदेशों का महत्व अब समझ में आने लगा है।
आजकल रेडियो, टीवी तथा अन्य मनोंरजन के साधनों पर चौबीस घंटे का सुख उपलब्ध है। लोग पूरा दिन मनोरंजन करते हैं पर फिर भी मन नहीं भरता। इसका कारण यह है कि मनोंरजन से मन को लाभ मिले कैसे जब उसे कोई विश्राम ही नहीं मिलता। जब कोई मनुष्य प्रातः धर्म का निर्वहन तथा दोपहर अर्थ का अर्जन ( यहां आशय अपने रोजगार से संबंधित कार्य संपन्न करने से हैं) करता है वही सायं भोजन और मनोरंजन का पूर्ण लाभ उठा पाता है। उसे ही रात्रि को नींद अच्छी आती है और वह मोक्ष प्राप्त करता है।
शाम को भोजन करने के बाद गीत संगीत सुनना चाहिये। अलबत्ता टीवी देखने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि उसमें आंखें ही थकती हैं और दिमाग को कोई राहत नहीं मिलती। इसलिये टेप रिकार्ड या रेडियो पर गाने सुनने का अलग मजा है। वैसे भी देखा जाये तो आजकल अधिकर टीवी चैनल फिल्मों पर गीत संगीत बजाकर ही गाने प्रस्तुत किये जाते हैं-चाहे उनके हास्य शो हों या कथित वास्तविक संगीत प्रतियोगितायें फिल्मी धुनों से सराबोर होती हैं। देश के व्यवसायिक मनोरंजनक प्रबंधक जानते हैं कि गीत संगीत मनुष्य के लिये मनोरंजन का एक बहुत बड़ा स्त्रोत हैं इसलिये वह उसकी आड़ में अपने पंसदीदा व्यक्तित्वों को थोपते हैं। प्रसंगवश अभी क्रिकेट में भी चौका या छक्का लगने पर नृत्यांगना के नृत्य संगीत के साथ प्रस्तुत किये जाते हैं। स्पष्टतः यह मानव मन की कमजोरी का लाभ उठाने का प्रयास है।
टीवी पर इस तरह के कार्यक्रम देखने से अच्छा है सीधे ही गाने सुने जायें। अलबत्ता यह भोजन करने के बाद कुछ देर तक ठीक रहता है। अर्थशास्त्र के उपयोगिता के नियम के अनुसार हर वस्तु की प्रथम इकाई से जो लाभ होता है वह दूसरी से नहीं होता। एक समय ऐसा आता है कि लाभ की मात्रा शून्य हो जाती है। अतः जबरदस्ती बहुत समय तक मनोरंजन करने का कोई लाभ नहीं है। सीमित मात्रा में गीत संगीत सुनना कोई बुरी बात नहीं है-मनोरंजन को विलासिता न बनने दें।
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हिन्दू धर्म संदेश-पैसा कमाने से कभी फुर्सत नहीं मिल सकती


किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला।
या तु वेश्येव सा मान्या पथिकैरपि भुज्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
उस संपत्ति से क्या लाभ जो केवल घर की अपने ही उपयोग में आती हो। जिसका पथिक तथा अन्य लोग उपयोग करें वही संपत्ति श्रेष्ठ है।
धनेषु जीवतिव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मसु।
अतृप्तः प्राणिनः सर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च।।
हिन्दी में भावार्थ-
धन और भोजन के सेवन तथा स्त्री के विषयों में लिप्त रहकर भी अनेक मनुष्य अतृप्त रह गए, रह जाते हैं और रह जायेंगे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के लोभ की सीमा अनंत है। वह जितना ही धन संपदा के पीछे जाता है उतना ही वह एक तरह से दूर हो जाती हैं। किसी को सौ रुपया मिला तो वह हजार चाहता है, हजार मिला तो लाख चाहता है और लाख मिलने पर करोड़ की कामना करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दौलत की यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होती। आदमी का मन मरते दम तक अतृप्त रहता है। जितनी ही वह संपत्ति प्राप्त करता है उससे ज्यादा पाने की भावना उसके मन में जाग्रत होने लगती है।
आखिर अधिकतर लोग संपत्ति का कितना उपयोग कर पाते हैं। सच तो यह है कि अनेक लोग जीवन में जितना कमाते हैं उतना उपभोग नहीं कर पाते। उनके बाद उसका उपयोग उनके परिजन करते हैं। बहुत कम लोग हैं जो सार्वजनिक हित के लिये दान आदि कर समाज हित का काम करते हैं। ऐसे ही लोग सम्मान पाते हैं। जिन लोगों की अकूल संपत्ति केवल अपने उपयोग के लिये है तो उसका महत्व ही क्या है? संपत्ति तो वह अच्छी है जिसे समाज के अन्य लोग भी उपयोग कर सके। जब समाज किसी की संपत्ति का उपयोग करता है तो उसको याद भी करता है।  इसके बावजूद इंसान संचय करने में लगा रहता है और भक्ति तथा ज्ञान से परे हो जाता है।

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विदुर दर्शन-प्रजा को आजीविका न देने वाला राष्ट नष्ट हो जाता है (kingdom and public-hindu dharma sandesh)


आजीव्यः सर्वभूतानां राजा पज्र्जन्यवद्भुवि।
निराजीव्यं त्यजन्त्येनं शुष्कवृक्षभिवाउढजाः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा मेघों के समान सब प्राणियों को आजीविका देता है। जो राजा प्रजा को आजीविका नहीं दे पाता उसका साथ सभी छोड़ जाते हैं, जिस प्रकार पेड़ को पक्षी छोड़ जाते हैं।
उत्थिता एवं पूज्यन्ते जनाः काय्र्यर्थिभिर्नरःै।
शत्रुवत् पतितं कोऽनुवन्दते मनावं पुनः।।
हिंदी में भावार्थ-
जो व्यक्ति कार्य सिद्धि की अभिलाषा रखते हैं वह उत्थान की तरफ बढ़ रहे पुरुष का सम्मान करते हैं और जो पतन की तरफ जाता दिखता है उसे त्याग देते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन में अपनी भौतिक उपलब्धियों को लेकर कोई भ्रम नहीं रखना चाहिये। यदि आप धनी है पर समाज के किसी काम के नहीं है तो कोई आपका हृदय से सम्मान नहीं करता। जिस तरह जो राजा अपनी प्रजा को रोजगार नहीं उपलब्ध कराता उसे प्रजा त्याग देती है वैसे ही अगर धनी मनुष्य समाज के हित पर धन व्यय नहीं करता तो उसे कोई सम्मान नहीं देता। तात्पर्य यह है कि अगर आप समाज के शिखर पुरुष हैं तो जितना हो सके अपने आसपास और अपने पर आश्रित निर्धनों, श्रमिकों और बेबसों पर रहम करिये तभी तो आपका प्रभाव समाज पर रह सकता है वरना आपके विरुद्ध बढ़ता विद्रोह आपका समग्र भौतिक सम्राज्य भी नष्ट कर सकता है।
हमारे प्राचीन महापुरुष अनेक प्रकार की कथा कहानियों में समाज में समरसता के नियम बना गये हैं। उनका आशय यही है कि समाज में सभी व्यक्ति आत्मनियंत्रित हों। जिसे आज समाजवाद कहा जाता है वह एक नारा भर है और उसे ऊपर से नीचे की तरफ नारे की तरह धकेला जाता है जबकि हमारे प्राचीन संदेश मनुष्य को पहले ही चेता चुके हैं कि राजा, धनी और प्रभावी मनुष्य को अपने अंतर्गत आने वाले सभी लोगों को प्रसन्न रखने का जिम्मा लेना चाहिए। उनका आशय यह है कि समाजवाद लोगों में स्वस्फूर्त होना चाहिये जबकि आजकल इसे नारे की तरह केवल राज्य पर आश्रित बना दिया गया है। इस सामाजिक समरसता के प्रयास की शुरुआत भले ही राज्य से हो पर समाज में आर्थिक, सामाजिक, और प्रतिष्ठत पदों पर विराजमान लोगों को स्वयं ही यह काम करना चाहिये। इसके लिये हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों से जीवन के नियम सीखें न कि पश्चिम या पूर्व से आयातित नारे गाते हुए भ्रम में रहना चाहिए। केवल नारे लगाने से गरीब या कमजोर का उद्धार नहीं होता बल्कि इसके लिये सतत प्रयत्नशील रहना चाहिये। जो राज्य अपने गरीब, असहाय तथा तकलीफ पड़े आदमी या समूह की सहायता नहीं करता वह जल्दी नष्ट हो जाता है।
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आज हनुमान जयंती-सेवा भाव से भी श्रेष्ठता प्राप्त होती है (today hanuman jayanti-vishesh hindi lekh)


आज पूरे भारत में हिन्दुओं के प्रिय इष्ट श्री हनुमान जी की जयंती मनाई जा रही है। महर्षि बाल्मीकि जी द्वारा लिखा ‘रामायण’ हो या श्री तुलसीदास जी द्वारा लिखी गयी ‘रामचरित मानस’, किसी भी रामकथा में श्री हनुमान जी को भगवान श्रीराम के तुल्य ही नायक की तरह मान्यता प्राप्त है। भगवान श्रीराम के चरित्र की व्याख्या करने वाले ग्रंथ उनके नाम पर होने के बावजूद उनको अपने समय के एकल नायक के रूप में स्थापित नहीं करते क्योंकि उनकी सेवा का व्रत लेने वाले हनुमान जी अपने स्वामी के समकक्ष ही खड़े दिखते हैं।
बुद्धि और शक्ति के समन्वय का प्रतीक श्रीहनुमान जी मर्यादा के विषय में भी अपने स्वामी भगवान श्रीराम के समान थे। लंका दहन के बाद उन्होंने जब श्रीसीता जी को पुनः दर्शन किये तो उनसे अपनी पीठ पर चढ़कर श्रीराम के यहां चलने का आग्रह किया। देवी सीता ने अस्वीकार कर दिया। श्रीहनुमान जी जानते थे कि वह एक प्रतिव्रता स्त्री हैं और उनके आग्रह को स्वीकार नहंी करेंगी। दरअसल वह भी श्रीसीता जी की तरह यही चाहते थे कि भगवान श्रीराम अपने पराक्रम से रावण को परास्त कर श्रीराम को साथ ले जावें। उन्होंने यह आग्रह औपचारिकता वश कर अपनी मर्यादा का ही परिचय दिया था। हालांकि वह मन ही मन चाहते थे कि श्रीसीता उनका यह आग्रह अस्वीकार कर दें।
भगवान श्रीराम से मैत्री कर अपने ही भाई का वध कर राज्य प्राप्त करने वाले श्रीमान् सुग्रीव जब अपने सुख सुविधाओं के भोग में इतने भूल गये कि उन्हें भगवान श्रीराम के कर्तव्य का स्मरण ही नहीं रहा, तब श्रीहनुमान अनेक बार उनको संकेतों में अपनी बात कहते रहे। इसके बावजूद भी उन्होंने सेवक होने की मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। उनका ही यह प्रभाव था कि लक्ष्मण के श्रीराम के आदेश पर कुपित होने पर किष्किंधा आने से पहले ही श्रीसुग्रीव ने अपनी सेना को एकत्रित होने का आदेश दे दिया था। जब श्रीलक्ष्मण किष्किंधा पहुंचे तब श्रीहनुमान जी ने सुग्रीव की सफाई देते हुए उनको यही तर्क देकर शांत किया था। इससे पता लगता है कि श्रीहनुमान जी न केवल दूरदृष्टा थे बल्कि राजनीतिक विशारद भी थे।
भारतीय जनमानस में उनको नायकत्व की छबि प्राप्त होने का एक दूसरा कारण भी है कि उसमें वर्णित अधिकतर पात्र राजशाही पृष्ठभूमि के हैं पर श्रीहनुमान आम परिवार के थे। बाकी सभी लोगों ने कहीं न कहीं राजशाही का उपयेाग किया पर श्रीहनुमान जी सदैव सेवक बनकर डटे रहे। उनकी सेवा की इतनी बड़ी शक्ति थी कि उनके स्वामी पहले सुग्रीव और बाद में भगवान श्रीराम उनको समकक्ष दर्जा देते थे। भगवान हनुमान की यह सेवा कोई व्यक्तिपूजा का प्रतीक नहीं थी क्योंकि वह धर्म स्थापना के लिये तत्पर अपने स्वामियों की सहायता कर रहे थे। उनकी यह सेवा निष्काम थी क्योंकि उन्होंने कभी इसका लाभ उठाने का प्रयास नहीं किया। जब सुग्रीव को बालि ने घर से निकाला तब श्रीहनुमान जी भी उनके साथ हो लिये। दरअसल वह सुग्रीव का नहीं बल्कि न्याय का पक्ष ले रहे थे। उसी तरह भगवान श्रीराम के लिये उन्होंने रावण सेना का संहार कर रावण द्वारा श्रीसीता के हरण का बदला ले रहे थे। उनका यह श्रम नारी अनाचार के प्रतिकार के रूप में किया गया था। कहने का अभिप्राय यह है कि श्रीहनुमान ‘सत्य, न्याय और चरित्र’ की स्थापना के लिये अवतरित हुए। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि उन्होंने धर्म स्थापना के लिये अपना पूरा जीवन लगा दिया। यही कारण है कि उनको राम कथा में लक्ष्मण से भी अधिक सम्मानीय माना गया। श्रीलक्ष्मण तो भाई होने के कारण श्रीराम के साथ थे पर हनुमान जी तो कोई पारिवारिक संबंध न होते हुए भी इस धरती पर धर्म स्थापना के लिये उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे। धर्म स्थापना के लिये सामुदायिक अभियान आवश्यक हैं यही उनके चरित्र से संदेश मिलता है।
हनुमान जयंती पर उनका स्मरण करते हुए यह चर्चा करना अच्छा लगता है। खासतौर से जब शारीरिक श्रम की महत्ता कम होती जा रही है और सेवा भाव को निम्न कोटि का माना जाने लगा है तब लोगों को यह बताना आवश्यक है कि इस संसार का संचालन उपभोग प्रवृत्ति के लोगोें की वजह से नहीं बल्कि निष्काम भाव से परिश्रम और सेवा करने वालों के कारण ही सहजता से हो रहा है। इस अवसर पर श्रीहनुमान को नमन करते हुए अपने ब्लाग लेखक मित्रों, पाठकों तथा देशवासियों को बधाई।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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‘सहज योग’ से दूर भागता है आधुनिक बाजार-हिन्दी लेख (modern bazar and sahajyog-hindi satire)


उन वरिष्ठ ब्लोगर महोदय ने अपनी टिप्पणी में उस ब्लाग का लिंक रखकर अपने सतर्क निगाहों का परिचय देकर अच्छा किया पर यह लेखक उस पाठ को पहले ही पढ़ चुका था और फिर आगे दो बार यह देखने के लिये भी जाना ही था कि उस पर टिप्पणियां कैसी हैं? हां, यहां अंतर्जाल पर कई बार पाठों पर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां भी पढ़ने को मिल जाती हैं जिनका आगे उस विषय पर मार्गदर्शन प्राप्त होता है। वैसे यह पाठ लेखक नहीं पढ़ता तो भी यह सब लिखने वाला था जो लिख रहा है। वह यह कि आधुनिक बाजार मनुष्य में असहजता का भाव पैदा अधिक से अधिक कमाना चाहता है और उसके लिये उसने बकायदा ऐसा प्रचारतंत्र बना रखा है जो चिल्ला चिल्लाकर उसे वस्तुऐं खरीदने के लिये प्रेरित करता है, फिल्म देखने के लिये घर से निकालता है और क्रिकेट मैच में अपने महानायको के प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिये दौड़ लगवाता है। इस बाजार का असली शत्रु है भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का वह ‘सहज योग’ का भाव-चारों वेदों के सारतत्व के साथ इसका श्रीमद्भागवत में बहुत सरलता से उल्लेख किया गया है-यह बात समझने की है और उसके लिये हर इंसान को अपने विवेक का उपयोग करना पड़ता है। केवल बुद्धि से काम नहंी चल पाता जो केवल शब्दों के अर्थ तक ही सीमित रहती है-उसका भाव समझने के लिये मनुष्य को अपने अंदर संकल्प और धैर्य धारण करना पड़ता है तभी उसके विवेक चक्षु खुलते हैं।
दरअसल भारतीय योग और अध्यात्म पर अनुकूल और प्रतिकूल लिखने वाले बहुत हैं पर उसे पढ़ता कौन कितना है यह समझ में नहीं आता। समर्थकों ने भी कुछ अच्छे विचार दिमाग में रख लिये हैं और वही उसे नारे बनाकर प्रस्तुत करते हैं। आलोचकों की स्थिति तो बदतर और दयनीय है जिनके पास पूरे भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से दो तीन श्लोक या दोहे हैं-जिनको समाज अब स्वयं ही अप्रसांगिक मानता है-जिनको नारे की तरह रटकर सुनाते हैं। समर्थक तो फिर भी प्रशंसा के पात्र हैं कि वह पढ़ते तो रहते हैं पर आलोचक पढ़ी पढ़ाई बातों की विवेचनाओं को ही अपना आधार बनाकर चलते हैं। जिन किताबों की चर्चा करते हैं उनको पढ़ना तो दूर वह देखना तक पसंद नहीं करते, पर विचार व्यक्त करने में नहीं चूकते।
उन वरिष्ठ ब्लोगर महोदय द्वारा सुझाये गये ब्लाग का पाठ यकीनन एक विद्वान द्वारा ही लिखा गया था। उनका अपना दृष्टिकोण हो सकता है मगर उसमें असहमति की भारी गुंजायश छोड़ी गयी। योग को रोग बताते हुए लिखे गये उस पाठ में महर्षि विवेकानंद पर भी प्रतिकूल लिखा गया। उस पाठ में योग के बारे में लिखी गयी बातों ने इस बात के लिये बाध्य किया कि पतंजलि येाग दर्शन की किताबों को पलट कर देखा जाये। कहीं भी रसायनों के मिश्रण से औषधि बनाने की बात सामने नहीं आयी। कैवल्यपाद-4 में एक श्लोक मिला
जन्मोषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः।।9।।
इसका हिन्दी में भावार्थ है कि ‘जन्म, ओषधि मंत्र, तप, और समाधि, इस तरह पांच तरह की सिद्धियां होती हैं।
जब पतंजलि साहित्य खोलें तो कुछ न कुछ ऐसा मिल ही जाता है जो दिलचस्प होता ही है। दरअसल हमने आज एक पाठ अन्य भी पढ़ा था जिसमें कथित वैलंटाईन ऋषि और हमारे महर्षि मनु के बीच तुलनात्मक अध्ययन भारतीय जाति व्यवस्था पर आक्षेप किये गये। तय बात है कि मनु को जन्म पर आधारित व्यवस्था का निर्माता माना जाता है पर पतंजलि योग दर्शन में यह दिलचस्प श्लोक मिला जो कि इस बात का प्रमाण है कि हमारी जाति व्यवस्था का आधार कर्म और व्यवहार रहा है।
जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्।
इसका हिन्दी भावार्थ यह है कि ‘एक जाति से दूसरी जाति में जाने का रूप प्रकृति पूर्ण होने से होता है। महर्षि विश्वामित्र ने तप से ही ब्रह्म्णत्व प्राप्त किया था। दरअसल ब्राह्म्णत्व का अर्थ है समाज का आपने ज्ञान से श्रेष्ठता प्रमाणित कर समाज मार्ग दर्शन करना और यह कार्य तो कोई भी कर सकता है।
इसका आशय यह है कि अगर कोई मनुष्य योग साधना, मंत्र और तप से चाहे तो अपनी प्रकृतियां पूर्ण कर उच्च और प्रतिष्ठित पद पर स्थापित हो सकता है और जन्म के आधार पर ही सभी कुछ होना जरूरी नहीं है। यह अलग बात है कि लोग जन्म और ओषधियों के सहारे भी श्रेष्ठता हासिल कुछ लोग प्राप्त कर लेते हैं। जन्म का सभी जानते है पर ओषधियों की बात आयी तो आपने देखा होगा कि अनेक खेल प्रतियोगिताओं में उनके सेवन से अनेक लोग स्वर्ण पदक प्राप्त करते हैं-यह अलग बात है कि इनमें कुछ प्रतिबंधित होती हैं कुछ नहीं।
याद रखिये हमारे देश में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनका जन्म कथित उच्च जातियों में नहंी हुआ पर अपने कर्म के आधार पर उन्होंने ऐसी प्रतिष्ठा प्राप्त की पूरा समाज आज उनको याद करता है। असली बात यह है कि योग साधना एक प्राकृतिक क्रिया है। योगासनों की तुलना सुबह सैर करने या जिम जाने से करना अपने अज्ञान का प्रमाण है। जहां तक लाभ होने वाली बात है तो इस लेखक के इस पाठ का हर शब्द उसी योगसाधना के शिखर से प्रवाहित है। अगर इनका प्रभाव कम है तो उसके पीछे इस लेखक के संकल्प की कमी हो सकती है पर अगर वह अधिक प्रभावी है तो उसका पूरा श्रेय योगसाधना को जाना चाहिये। यह अलग बात है कि अगर आर्थिक रूप से ही लाभ को तोला जाना है तो यकीनन उसके लिये इस लेखक का अकुशल प्रबंधन जिम्मेदार है जो ब्लाग लिखने से एक पैसा नहीं मिलता पर जिस तरह भारतीय अध्यात्म का संदेश फैल रहा है वह योग साधना का ही परिणाम है। यह पाठ आत्म प्रचार के लिये नहीं लिखा बल्कि यह बताने के लिये लिखा है कि जब सात वर्ष पूर्व इस लेखक ने योग साधना प्रारंभ की थी तब उसके जीवन का यह दूसरा दौर था यानि कम से इस लेखक को तो योग साधना का लाभ मिला है-किसी को नहीं मिला इस बात का तो खंडन हो ही गया।
अब करें बाजार और उसके प्रचारतंत्र की बात! यह वही बात है कि अगर वरिष्ठ ब्लोगर महोदय ने वह लिंक नहीं देते तो भी यह लिखा ही जाना था। विदेशियों को क्या देश के ही बड़े बड़े धनाढ्यों को यह नहीं सुहाता।
पहले यह लेखक भी संगठित प्रचार माध्यमों और अंतर्जाल लेखकों के प्रभाव में आकर बाबाओं की अर्जित संपत्तियों पर अपनी नाखुशी लिखता था पर अब जैसे जैसे नवधनाढ्य लोगों की पोल सामने आ रही है-इसका श्रेय भी आधुनिक प्रचारतंत्र को ही है जो बाजार का रक्षक है पर समय पास करने के लिये उसे ऐसी पोल लानी पड़ती है-वैसे लगता है कि बाबा भला क्या बुरा कर रहे हैं? उनका कमाया पैसा रहता तो समाज के बीच में ही है। वह कोई ठगी या भ्रष्टाचार तो नहीं करते! युवक युवतियों को आधुनिकता के नाम अनैतिक संबंधों के लिये प्रेरित तो नहीं करते। केवल शादी के नाम पर अंतर्जातीय विवाहों पर खुश होने वाले विद्वान इस बात पर चिंतन नहीं करते कि उसके बाद घर भी चलाना पड़ता है जिसकी समझ युवक युवतियों को होना चाहिये। साथ ही यह भी परिवार चलाने के लिये समाज की जरूरत होती है इसे भुलाना सच्चाई से मुंह फेरना है। भारतीय संत इस बात को समझते हैं इसलिये ही निरंतर आध्यात्मिक ज्योति जगाते रहते हैं।
पिछले अनेक अवसरों पर आसाराम बापू, बाबा रामदेव तथा सुधांशु महाराज पर अनेक आक्षेप किये जाते रहे। यह लेखक इन तीनों में किसी का शिष्य नहीं है पर उसे हैरानी हुई जब आसाराम बापू पर तो तंत्र मंत्र का आरोप लगा दिया-इतनी समझ उन लोगों में नहीं है कि आसाराम बापू उस समाज में पैदा हुए जो अध्यात्म के प्रति समर्पित है पर तंत्रमंत्र की बात से कोसों दूर रहता है। यह सही है कि अनेक लोग धर्म के नाम पर ढोंग कर रहे हैं पर इतनी ऊंचाई बिना तप, अध्ययन और ज्ञान के नहीं मिलती।
योग साधना का अभ्यास जितना करेंगे उतनी ही सिद्धियां आयेंगी और उससे आप स्वयं क्या आपके आसपास के लोगों पर भी उसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा-मुख्य बात यह है कि आपकी नीयत कैसी है, यह आपको देखना होगा।
दरअसल बाजार और उसका प्रचारतंत्र परेशान है। वह वैलेंटाईन को बेचना चाहता है क्योंकि नवाधनाढ्यों के पास नयी चीजें खरीदने का शौक उसी से ही बढ़ता है और आधुनिक बाजार उसका निर्माता है। महाशिवरात्रि पर कोई ऐसी चीज नहीं बिकती जिसका विज्ञापन मिलता हो। यही हालत क्रिसमस और नववर्ष पर भी होती है क्योंकि गुड़ी पड़वा और मकर सक्रांति तो परंपरागत बाजार का व्यापार है जिसे विज्ञापन करने की आवश्यकता नहीं होती।
दरअसल बाबा रामदेव, आसाराम बापू या सुधांशु महाराज के कार्यक्रमों में एक बहुत बड़ा जनसमुदाय होता है और आधुनिक बाजार के स्वामी और प्रचार प्रबंधक यह देखकर परेशान हो जाते हैं कि उनके बिना यह सब कैसे हो रहा है? दूसरा वहां से अपने लिये ग्राहक ढूंढना चाहते हैं। उनका गुस्सा तब अधिक बढ़ जाता है जब वहां युवक युवतियों का भी समूह देखते हैं क्योंकि उनको लगता है कि यह तो उनको दोहन स्त्रोत हैं, भला वहां क्यों जा रहे हैं।
अनेक संकीर्ण मानसिकता के बुद्धिजीवी उनके प्रवचन कार्यक्रमों में दलित, पिछडे, और अगड़े का भेदभाव छोड़कर जाते हुए लोगों को सहन नहीं कर पाते। उनको लगता है कि इससे तो उनका प्रभाव खत्म हो रहा है। उससे ज्यादा गुस्सा उनको तब आता है जब गैर हिन्दू भी उनसे जुड़ते हैं। उनकी चिंतायें स्वाभाविक हैं और उनको रोकने का हमारा लक्ष्य भी नहीं है। ऋषि प्रसाद, अखंड ज्योति और कल्याण पत्रिकाओं को बिकना अगर बंद हो जाये तो हिन्दी का आधुनिक प्रकाशन अधिक अमीर हो जायेगा। जब देश की हालतें देखते हैं तो अन्य बुद्धिजीवियों की तरह हम भी चिंतित होते हैं पर जब इन संतों और उनके भक्तों की उपस्थिति देखते हैं तो दिल को संतोष भी होता है पर दूसरे असंतुष्ट होकर उनको भी निशाना बनाते हैं। शेष फिर कभी।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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