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हिन्दी दिवस सप्ताह और पखवाड़ा-हिन्दी चिंत्तन लेख


            14 सितम्बर हिन्दी दिवस के बाद सरकारी विभागों में हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी सप्ताह प्रारंभ हो जाता है।  यह अलग बात है उस दौरान औपचारिक कार्यक्रम समाचारों में हिन्दी दिवस की अपेक्षा अधिक स्थान नहीं पाते। इस दौरान वाद विवाद प्रतियोगिताओं, सम्मेलनों और सम्मान कार्यक्रमों में वही पुरानी बात दोहराई जाती हैं।  अगर हम हिन्दी के व्यवसायिक बाज़ार को देखें तो उसके पास एक बहुत विशाल जनसमूह है।  वह अपने लिये कमाई के लिये हर क्षेत्र में अपने हिसाब से भाषाई विकास के लिये रणनीति बना सकता है पर उसमें आत्मविश्वास की कमी है।  टीवी चैनल के समाचार, धारावाहिक, फिल्म की पटकथायें और समाचार पत्र पत्रिकाओं की विषय सामग्री में प्रबंधकों की भाषा के प्रति कुंठा ही नहीं वरन् उससे जड़ आमजन समूह के प्रति भारी अविश्वास दिखाई देता है।  यह अविश्वास और विचार हीनता आमजन समूह की मूढ़ता की वजह से नहीं वरन् प्रबंधकों और कार्यकर्ताओं में अपने ही उनके अंदर अपने कर्म से प्रतिबद्धता के अभाव  से ही उपजी होती है।

            हिन्दी पर वही पेशेवर विद्वान इन बहसों में भाग लेने आते हैं जिन्होंने हिंग्लििश या हिंग्रेजी के सहारे प्रतिष्ठा के आकाश को छुआ होता है और उनकी रचनायें मनोंरजन या कथित रूप से सामाजिक चेतना के विषय से जुड़ी होती है। प्रगतिशील, जनवादी तथा अन्य विचाराधाराओं के विद्वानों ने प्रचार जगत तथा उसके संगठनों पर अधिकार कर रखा है इसलिये मौलिक, स्वतंत्र तथा जातीय, धार्मिक, राजनीतिक तथा कला के समूहें से पृथक लेखकों के लिये कहीं कोई स्थान नहीं है।  अब अंतर्जाल ने यह सुविधा दी है तो उसे सामाजिक माध्यम कहकर सीमित किया जा रहा है।  पूंजी, प्रतिष्ठा और प्रचार के शिखर संगठनों के महापुरुष निरंतर यह संदेश देते हैं कि यह सामाजिक प्रचार माध्यम भी उनकी कृपा से ही चल रहा है।  प्रचार माध्यम शिखर पुरुषों के ब्लॉग, ट्विटर और फेसबुक की चर्चा कर आमजन को यह संदेश तो देते हैं कि वह सामाजिक माध्यम को महत्व प्रदान कर रहे हैं पर साथ ही यह भी बता देते हैं कि हर विचारक की औकात उसकी भौतिक शक्ति के अनुसार ही आंकी जायेगी।

            हम जैसे सात वर्ष से अंतर्जाल पर सक्रिय हिन्दी लेखक अगर स्वांत सुखाय न हों तो लिखना ही बंद कर दें। हमारा स्तर अभी तक एक अंतर्जाल प्रयोक्ता से आगे नहीं बढ़ पाया।  दो तीन वर्ष तक हमें निराशा लगी पर जब हमने अध्ययन किया तो पता लगा कि भाषा, जाति, धर्म, अर्थ और समाज सेवा में कामनाओं के साथ राजसी प्रवृत्ति के पुरुषों से अपेक्षा करना व्यर्थ है क्योंकि उनके लक्ष्य कभी पूरे नहीं होते इसलिये हमें प्रतिष्ठित करने का समय उन्हें मिल ही नहीं सकता।  हमने हिन्दी भाषा में अंग्रेजी शब्दों के मिश्रण के प्रतिकूल एक लेख यहां लिखा था।  उस पर ढेर सारी प्रतिक्रिंयायें आयीं। उनमें विरोध तथा समर्थन दोनों ही शामिल था।  इस तरह के मिश्रण के अभियान प्रारंभ होने की जानकारी हमें अंतर्जाल पर ही मिली थी तब ऐसा लगा कि शायद यह एक भ्रम हो पर जल्द ही वह सच सामने आने लगा।  भाषाई रणनीतिकार हिन्दी को रोजगारोन्मुख बनाने के लिये उस राह पर चल पड़े थे जिसकी कल्पना करना हमारे लिये कठिन था।  कहने को यह भाषा के साथ उनकी प्रतिबद्धता थी पर सच उनकी अपनी रचनाओं के सहारे प्रतिष्ठा बनाये रखने के विश्वास का अभाव का प्रमाण था।

            विचारधाराओं से जुड़े ऐसे आकाशीय विद्वान अपनी बात जनमानस में कहने के लिये उतावले रहते हैं। उन्हें अपनी रचना पर तत्काल प्रतिक्रिया चाहिये क्योंकि उससे ही उनकी भौतिक उपलब्धि होती है।  समाज के पढ़े लिखे तबके से ही उनके सरोकार रह गये हैं। उन्हें अल्पशिक्षित, मनोरंजन प्रिय तथा  अध्यात्मिक वृत्ति के लोगों पर प्रभाव डालने का प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह उनके प्रतिबद्ध पाठकों से ही संदेश ग्रहण करता है। इसलिये उन्होंने अपने इसी संदेशवाहक तबको संबोधित करते रहने के लिये शब्द योजना बनाई।        हमारे यहां विचाराधाराओं से जुड़े अधिकतर लोग अध्यात्म विषय पर लिखना बेगार मानते हैं क्योंकि यह काम तो उन्होंने पेशेवर धार्मिक विद्वानों की सौंप दिया है।  यही कारण है कि आधुनिक हिन्दी लेखक भारतीय जनमानस की अध्यात्मिक सोच से परे होकर अपनी रचना करते हैं। भारतीय जनमानस में अध्यात्मिक दर्शन कूट कूट कर भरा है इसलिये वह इन लेखकों की रचनाओं को एक सीमा तक ही स्वीकार करता है।  अगर वह मनोरंजक हुई्रं तो लोकप्रियता पाती हैं पर लेखक की छवि कभी अध्यात्मिक नहीं बनती। यही कारण है कि अनेक हिन्दी भाषी लेखक प्रचार के शिखर पर दिखते हैं पर भारतीय जनमानस में उनके लिये वैसा स्थान नहीं है जैसा कि पुराने कवियों और लेखकों का रहा है।

            ऐसे ही लेखक अपनी श्रेष्ठता अपनी भौतिक उपलब्धियों के आधार पर प्रमाणित करने हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह या हिन्दी पखवाड़ा केे मंचों का उपयोग करने को लालायित रहते हैं।  यह बुरा नहीं है पर हिन्दी भाषा पर नियंत्रण करने का भाव उनकी आत्ममुग्धता को ही दर्शाती है। जहां तक भाषा का प्रश्न है वह समाज की विचार धारा तय करती है। हमारी मान्यता है कि शुद्ध हिन्दी का उपयोग ही हमारी रचनाओं की शक्ति है। व्यवसायिक क्षेत्र कभी हिन्दी का मार्ग तय नहीं कर सकता। जो लोग यह सोच रहे हैं कि वह हिन्दी के भाग्यविधाता हैं उन्हें यह भ्रम नहीं रखना चाहिये कि समाज उनकी हिन्दी को मान रहा है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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हिंदी भाषा का महत्व पूछने की नहीं वरन देखने की जरूरत-हिंदी दिवस पर विशेष लेख


                        हिन्दी दिवस 14 नवंबर 2013 को है पर इस लेखक के बीस ब्लॉग इस विषय पर लिखे गये पाठों पर जमकर पढ़े जा रहे हैं।  पता नहीं कब हमने एक लेख लिख डाला था, जिसका शीर्षक था हिन्दी भाषा का का महत्व समाज कब समझेगा? उस समय इस इतने पाठक नहीं मिले थे जितने अब मिलने लगे हैं। इससे एक बात तो जाहिर होती है कि इंटरनेट पर लोगों का हिन्दी मे रुझान बढ़ गया है, दूसरी यह भी कि हिन्दी दिवस के मनाये जाने का महत्व कम नहीं हुआ है।  एक तीसरी बात भी सामने आने लगी है कि लोग हिन्दी विषय पर लिखने या बोलने के लिये किताबों से अधिक इंटरनेट पर सामग्री ढूंढने में अधिक सुविधाजनक स्थिति अनुभव करने लगे हैं।  मूलतः पहले विद्वान तथा युवा वर्ग किसी विषय पर बोूलने या लिखने के लिये किताब ढूंढते थे। इसके लिये लाइब्रेरी या फिर किसी किताब की दुकान पर जाने के अलावा उनके पास अन्य कोई चारा नहीं था।  इंटरनेट के आने के बाद बहुत समय तक लोगों का  हिन्दी के विषय को लेकर यह भ्रम था कि यहां हिन्दी पर लिखा हुआ मिल ही नहीं सकता।  अब जब लोगों को हिन्दी विषय पर लिखा सहजता से मिलने लगा है तो वह किताबों से अधिक यहां अपने विषय से संबंधित सामग्री ढूंढने  लगे हैं।  ऐसे में किसी खास पर्व या अवसर पर संबंधित विषयों पर लिखे गये पाठ जमकर पढ़े जाते हैं। कम से कम एक बात तय रही कि हिन्दी अब इंटरनेट पर अपने पांव फैलाने लगी है।

                        हिन्दी ब्लॉग पर पाठकों की भीड़ का मौसम 14 सितंबर हिन्दी दिवस के अवसर पर अधिक होता है।  ऐसे में पुराने लिखे गये पाठों को लोग पढ़ते हैं।  हमने हिन्दी दिवस बहुत पाठ लिखे हैं पर उस यह सभी उस दौर के हैं जब हमें लगता था कि यहंा पाठक अधिक नहीं है और जो सीमित पाठक हैं वह व्यंजना विधा में कही बात समझ लेते हैं।  उससे भी ज्यादा कम लिखी बात को भी अपनी विद्वता से अधिक समझ लेते हैं।  कहते हैं न कि समझदार को इशारा काफी है।  इनमें कई पाठ तो भारी तकलीफ से अंग्रेजी टाईप से यूनिकोड के माध्यम से  हिन्दी में लिखे गये।  अब तो हिन्दी टाईप के टूल हैं जिससे हमें लिखने में सुविधा होती है। लिखने के बाद संपादन करना भी मौज प्रदान करता है।

                        जिस दौर में अंग्रेजी टाईप करना होता था तब भी हमने बड़े लेख लिखे पर उस समय लिखने में विचारों का तारतम्य कहीं न कहंी टूटता था।  ऐसे में हिन्दी के महत्व पर लिखे गये लेख में हमने क्या लिखा यह अब हम भी नहंी याद कर पाते।  जो लिखा था उस पर टिप्पणियां यह  आती हैं कि आपने इसमें हिन्दी का महत्व तो लिखा ही नहीं।

                        यह टिप्पणी कई बार आयी पर हम आज तक यह नहीं समझ पाये कि हिन्दी का महत्व बताने की आवश्यकता क्या आ पड़ी है? क्या हम इस देश के नहीं है? क्या हमें पता नहीं देश में लोग किस तरह के हैं?

                        ऐसे में जब आप हिन्दी का महत्व बताने के लिये कह रहे हैं तो प्रश्न उठता है कि आपका मानस  अंतर्राष्ट्रीय स्तर की तरफ तो नहीं है।  आप यह जानना चाहते हैं कि हिन्दी में विशेषाधिकार होने पर आप विदेश में कैसे सम्माजनक स्थान मिल सकता है या नहीं? दूसरा यह भी हो सकता है कि आप देश के किसी बड़े शहर के रहने वाले हैं और आपको छोटे शहरों का ज्ञान नहीं है।  हिन्दी के महत्व को जानने की जरूरत उस व्यक्ति को कतई नहीं है जिसका वर्तमान तथा भावी सरोकार इस देश से रहने वाला है।  जिनकी आंखें यहां है पर दृष्टि अमेरिका की तरफ है, जिसका दिमाग यहां है पर सोचता कनाडा के बारे में है और जिसका दिल यहा है पर ं धड़कता इंग्लैंड के लिये है, उसे हिन्दी का महत्व जानने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस भाषा से उसे वहां कोई सम्मान या प्रेम नहीं मिलने वाला।  जिनकी आवश्यकतायें देशी हैं उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह जानते हैं कि इस देश में रहने के लिये हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान होना आवश्यक है।

                        पहले तो यह समझना जरूरी है कि इस देश में हिन्दी का प्रभाव ही रहना है।  भाषा का संबंध भूमि और भावना से होता है। भूमि और भावना का संबंध भूगोल से होता है। भाषाओं का निर्माण मनुष्य से नहीं वरन् भूमि और भावना से होता है। मनुष्य तो अपनी आवश्यकता के लिये भाषा का उपयोग करता है जिससे वह प्रचलन में बढ़ती है।  हम यह भी कहते हैं कि इंग्लैंड में कभी हिन्दी राज्य नहीं कर सकती क्योंकि वहां इसके लिये कोई भूगोल नहीं है।  जिन लोगों में मन में हिन्दी और इंग्लिश का संयुक्त मोह है वह हिंग्लििश का विस्तार करने के आधिकारिक प्रयासों में लगे हैं। इसमें दो प्रकार के लोग हैं। एक तो वह युवा वर्ग तथा उसके पालक जो चाहते हैं कि उनके बच्चे विदेश में जाकर रोजगार करें।  दूसरे वह लोग जिनके पास आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक शक्तियां हैं तथा वह इधर तथा उधर दोनों तरफ अपना वर्चस्व स्थापित करने की दृष्टि से भारत में स्थित  मानव श्रम का उपयोग अपने लिये करना चाहता है।  एक तीसरा वर्ग भी है जो किराये पर बौद्धिक चिंत्तन करता है और वह चाहता है कि भारत से कुछ मनुष्य विदेश जाते रहें ताकि देश का बोझ हल्का हो और उनके बौद्धिक कौशल का  विदेश में सम्मान हो।

                        हिन्दी रोजगार की भाषा नहीं बन पायी न बनेगी।  हिन्दी लेखकों को दोयम दर्जे का माना जाता है और इसमें कोई सुधार होना संभव भी नहंी लगता।  जिन्हें लिखना है वह स्वांत सुखाय लिखें। हम यहां पर लिखते हैं तो दरअसल क्रिकेट, टीवी धारावाहिकों तथा फिल्मों से मिलने वाले मनोरंजन का वैकल्पिक उपाय ढूंढना ही उद्देश्य होता है।  एक बेकार धारावाहिक या फिल्म देखने से अच्छा यह लगता है कि उतने समय कोई लेख लिखा जाये।  हिन्दी हमारे जैसे योग तथा ज्ञान साधकों के लिये अध्यात्म की भाषा है। हम यहां लिखने का पूरा आनंद लेते हैं। पाठक उसका कितना आनंद उठाते हैं यह उनकी समस्या है।  ऐसे  फोकटिया लेखक है जो अपना साढ़े सात सौ रुपया इंटरनेट पर केवल इसलिये खर्च करता है कि उसके पास मनोरंजन का का दूसरा साधन नहीं है। बाज़ार और प्रचार समूहों के लिये हम हिन्दी के कोई आदर्श लेखक नही है क्योंकि मुफ्त में लिखने वाले हैं।  यह हमारी निराशा नहीं बल्कि अनुभव से निकला निष्कर्ष है। सीधी बात कहें तो हिन्दी का रोजगार की दृष्टि से कोई महत्व नहीं है अलबत्ता अध्यात्मिक दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसी भाषा का ही महत्व रहने वाला है।

                        विश्व में भौतिकतवाद अपने चरम पर है। लोगों के पास धन, पद तथा प्रतिष्ठा का शिखर है पर फिर भी बेचैनी हैं। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का व्यापार करने वालों की बनकर आयी हैं।  विश्व के अनेक देशों में भारतीय या भारतीय मूल के लोगों ने विज्ञान, साहित्य, राजनीति, कला तथा व्यापार के क्षेत्र में भारी सफलता अर्जित की है और उनके नामों को लेकर हमारे प्रचार माध्यम उछलते भी है।ं पर सच यह है कि विदेशें में बसे प्रतिष्ठित भारती  हमारे देश की पहचान नहंी बन सके हैं।  प्रचार माध्यम तो उनके नामों उछालकर एक तरह से देश के युवाओं को यह संदेश देते हैं कि तुम्हारा यहां कोई भविष्य नहीं है बल्कि बाहर जाओ तभी कुछ होगा। लोगों को आत्मनिर्भर तथा स्वतंत्र जीवन जीने की बजाय उनको विदेशियों  चाकरी के लिये यहां उकसाया जाता है।  सबसे बड़ी बात यह कि आर्थिक उन्नति को ही जीवन का सवौच्च स्तर बताने वाले इन प्रचार माध्यमों से यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिये कि वह अध्यात्म के उच्च स्तर का पैमाना बता सकें।

                        यहीं से हिन्दी का मार्ग प्रारंभ होता है।  जिन युवाओं ने अंग्र्रेजी को अपने  भविष्य का माध्यम बनाया है उनके लिये अगर विदेश में जगह बनी तो ठीक, नहंी बनी तो क्या होगा? बन भी गयी तो क्या गारंटी है कि वह रोजगार पाकर भी खुश होगा।  अध्यात्म जिसे हम आत्मा कहते हैं वह मनुष्य से अलग नहीं है। जब वह पुकारता है तो आदमी बेचैन होने लगता है। आत्मा को मारकर जीने वाले भी बहुत है पर सभी ऐसा नहीं कर सकते।  सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो लोग अंग्रेजी के मुरीद हैं वह सोचते किस भाषा में है और बोलते किस भाषा में है यह बात समझ में नहीं आयी। हमने सुना है कि कुछ विद्यालय ऐसे हैं जहां अंग्रेजी में न बोंलने पर छात्रों को प्रताड़ित किया जाता है।  अंग्रेजी में बोलना और लिखना उन विद्यालयों का नियम है। हमें इस बात पर एतराज नहीं है पर प्रश्न यह है कि वह छात्रों के सोचने पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते। तय बात है कि छात्र पहले हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषा में सोचते और बाद में अंग्रेजी में बोलते होंगे।  जो छात्र अंग्रेंजी में ही सोचते हैं उन्हें हिन्दी भाषा को महत्व बताने की आवश्यकता ही नहीं है पर जो सोचते हैं उन्हें यह समझना होगा कि हिन्दी उनके अध्यात्म की भाषा है जिसके बिना उनका जीवन नारकीय होगा। अतः उन्हें हिन्दी के सत्साहित्य का अध्ययन करना चाहिये। मुंबईया फिल्मों या हिंग्लिश को प्रोत्साहित करने वाले पत्र पत्रिकायें उनकी अध्यात्मिक हिन्दी भाषा की संवाहक कतई नहीं है।  भौतिक विकास से सुख मिलने की एक सीमा है पर अध्यात्म के विकास बिना मनुष्य को अपने ही अंदर कभी कभी पशुओं की तरह लाचारी का अनुभव हो सकता है। अगर आत्मा को हमेशा सुप्तावस्था में रहने की कला आती हो तो फिर उन्हें ऐसी लाचारी अनुभव नहीं होगी। 

                        हिन्दी में टाईप आना हम जैसे लेखकों के लिये सौभाग्य की बात हो सकती है पर सभी के लिये यह संभव नहीं है कि वह इसे सीखें।  हम न केवल हिन्दी भाषा की शुद्धता की बात करते हैं वरन् हिन्दी टाईप आना भी महत्वपूर्ण मानते हैं।  यह जरूरी नही है कि हमारी बात कोई माने पर हम तो कहते ही रहेंगे।  हिन्दी भाषा जब अध्यात्म की भाषा होती है तब ऐसा आत्मविश्वास आ ही जाता है कि अपनी बात कहें पर कोई सुने या नहीं, हम लिखें कोई पढ़े या नहीं और हमारी सोच का कोई मखौल उड़ाया या प्रशंसा, इन पर सोचने से ही बेपरवाह हो जाते हैं। आखिरी बात यह कि हम हिन्दी के महत्व के रूप में क्या लिखें कि सभी संतुष्ट हों, यह अभी तक नहीं सोच पाये। इस हिन्दी दिवस के अवसर पर फिलहाल इतना ही।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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हिंदी दिवस पर इन्टरनेट पर पाठकों की आवक कम रही-विशेष सम्पादकीय लेख


                        इस बार हिन्दी दिवस पर हमारे बीस ब्लॉग पिछले वषों के मुकाबले  कम पाठक ही जुटा सके।  दरअसल हिन्दी ब्लॉग पर 14 सितम्बर पर हिन्दी दिवस से एक दिन पहले यानि 13 सितम्बर को सबसे अधिक  लोग संभवतः प्रकाशन, वाचन अथवा लेखन के लिये सामग्री ढूंढते नज़र आयें हैं। पहले लोग अपने विषय के लिये कहीं किताब की दुकान या लाइब्रेरी जाते थे पर अब इंटरनेट पर हिन्दी भाषा में पाठ उपलब्ध होने की सुविधा ने उनको घर से बाहर जाने की असुविधा से बचा लिया है।  इस बार हमें यह देखकर हैरानी हुई कि 13 सितम्बर को पिछले वर्ष की अपेक्षा आधे पाठक ही थे।  इसके कारणों का विश्लेषण करना आवश्यक था।  ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं थी।   इसके कुछ कारण हमारी समझ में आये।

                        1-इस बार 14 सितम्बर हिन्दी दिवस शनिवार को पड़ा था जिससे सरकारी कार्यालयों, बैंकों, विश्वविद्यालयों, विद्यालयों तथा कुछ निजी संस्थाओं में अवकाश था।  भले ही कुछ जगह कार्यक्रम हुए हों पर उनमें वह भागीदारी नहीं रही होगी।  इस कारण भाषण, वादविवाद प्रतियोगिता तथा लेखन प्रतियोगिताओं के साथ ही परिचर्चा के कार्यक्रम भी कम आयोजित हुए होंगे।  इस कारण बहुत कम लोगों ने इंटरनेट पर राष्ट्रभाषा पर सामग्री ढूंढने का प्रयास किया होगा। इंटरनेट तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं में लिखने वालों ने जरूर यहां दौरा किया होगा पर आम क्षेत्र से आगमन कम ही हुआ, ऐसा लगता है।

                         2-इस बार टीवी समाचार चैनलों पर कुछ इस तरह की खबरें थी जिससे आम लोगों का रुझान उधर ही रहा होगा।  यह देखा गया है कि जब टीवी पर कोई खास खबर होती है तो इंटरनेट पर सामग्री की खोज कम हो जाती है।  क्रिकेट की क्लब स्तरीय प्रतियोगिता, बिग बॉस तथा कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रम इंटरनेट पर सक्रिय लोगों को अपनी तरफ खींच लेते हैं। आईपीएल के दिनों में शाम को दिन से भी पाठक कम हो जाते हैं जबकि सामान्य दिनों में इसके विपरीत होता है।  एक तरह से इंटरनेट व्यवसायिक प्रचार समूहों का प्रति़द्वंद्वी है।  एक समय लोगों का टीवी चैनलों की तरफ रुझान कम हो गया था।  इंटरनेट पर सकियता इतनी हो गयी थी कि लगता था कि टीवी चैनलों का समय अब गया कि तब गया ।  अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आयाम ने इन व्यवसायिक चैनलों को नया सहारा दिया।  पूरा आंदोलन नाटकीय तौर से इन चैनलों के विज्ञापन प्रसारणों का सहारा बना।  उस समय अनेक ब्लॉग लेखकों ने इस आंदोलन के प्रायोजित होने की बात लिखी थी और हमने उनका समर्थन करते हुए यही कहा था कि कहीं न कहीं व्यवसायिक प्रचार समूह के स्वामी इसे प्रायोजित कर रहे हैं। हालांकि वास्तविकता यह है कि उद्योग, व्यापार और प्रचार समूहों के स्वामी  एक ही होते है-अर्थात उद्योग, व्यापार और प्रचार संगठनों के पर एक ही परिवार या समूह के लोग छाये हुए हैं- पर चूंकि हमें इस संबंध मे ज्यादा कुछ पता नही है इसलिये कह नहंी पाते।  इधर आंदोलन चलवा कर टीवी चैनलों को दर्शक दिलाओ उधर बहसें चलाकर उद्योग के उत्पादों का प्रचार कर उनका व्यापार बढ़ाओ।  यह नीति बुरी नहीं है पर इतना तय है कि देश में कोई बड़ा आंदोलन बिना धनपतियों के चल नही सकता। यही बात इस संभावना को जन्म भी देती है कि तीनों क्षेत्रों का स्वामित्व कुछ निश्चित लोगों के पास ही है। उनके दोनों हाथों में लड्डू थें। आम जनता में व्याप्त निराशा को आशा में बदला, उनका काम चलता रहा और दूसरे भी पलते रहे।  कहीं से कोई खतरा नही! नं जनता से न राजा से न दलालों से!

                        3-तीसरा कारण यह भी हो सकता है कि इंटरनेट पर अधिक सफलता न मिलते देख हम उदासीन हो गये हैं। इसलिये कम लिखते हैं और इस कारण हमारे ब्लॉग फ्लाप हो गये हों।  सर्च इंजिन उन्हें ऊपर नहीं ला पाते हों। 

                        हमने हिन्दी दिवस पर बहुत लेख तथा कवितायें लिख डाली। इस लेखक का उद्देश्य आत्मप्रदर्शन करना नहीं वरन् अनुंसंधान करना था।  कुछ पढ़ना था। ब्लॉग फ्लाप हो रहे थे पर वह मृतप्राय नहीं थे। वह कुछ इस लेखक को पढ़ा भी रहे थे।  वैसे एक संभावना हो सकती है।  जहां शनिवार को कार्यक्रम नहीं हुए वहां रविवार और सोमवार को हो सकते हैं।  ऐसे में पहले की अपेक्षा अधिक दिन तक हिन्दी दिवस का नशा रहेगा। इसलिये ब्लॉगों के पाठक पंद्रह और सोलह सितंबर को भी बढ़ सकते हैं जबकि पहले सितम्बर से उठकर 14 सितंबर की दोपहर के बाद पाठकों की संख्या थम जाती थी।  इतना जरूरी है कि जितना हमने इस बार हिन्दी दिवस पर जितने पाठ लिखे उतने कभी नहंी लिखे।

                        बहरहाल हिन्दी दिवस पर सभी ब्लॉग लेखकों और पाठकों को बधाई। इस आशा के साथ कि वह हिन्दी भाषा के साथ अपनी विकास यात्रा जारी रख सकें।

दीपक राज कुकरेजाभारतदीप

ग्वालियर,मध्यप्रदेश

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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