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भृतहरि: रोजीरोटी कि खोज में जीवन व्यर्थ हो जाता है


हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमश्यनं धात्रा मरुत्कल्पितं
व्यालानां पशवस्तृणांकुरभुजस्तुष्टाः स्थलीशायिनः
संसारार्णवलंधनक्षमध्यिां वृत्तिः कृता सां नृणां
तामन्वेषयतां प्रर्याति सततं सर्व समाप्ति गुणाः

हिंदी में भावार्थ- परमात्मा ने सांपों के भोजन के रूप में हवा को बनाया जिसे प्राप्त करने में उनकेा बगैर हिंसा और विशेष प्रयास किए बिना प्राप्त हो जाती है। पशु के भोजन के लिए घास का सृजन किया और सोने के लिए धरती को बिस्तर बना दिया परंतु जो मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक से मोक्ष प्राप्त कर सकता है उसकी रोजीरोटी ऐसी बनायी जिसकी खोज में उसके सारे गुण व्यर्थ चले जाते हैं।
पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्मं निगूहति गुणान्प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः

हिन्दी में भावार्थ- अपने मित्र को अधर्म और पाप से बचाना, उसके हित में संलग्न रहते हुए उसके गुप्त रहस्य किसी अन्य व्यक्ति के सामने प्रकट न करना, विपत्ति काल में भी उसके साथ रहना और आवश्यकता पड़े तो उसकी तन, मन और धन से सहायता करना यही मित्रता का लक्षण है।

संक्षिप्त व्याख्या-अक्सर हम लोग कहते है कि अमुक हमारा मित्र है और यह दावा करते हैं कि समय आने पर वह हमारे काम आयेगा। आजकल यह दावा करना मिथ्या है। देखा जाये तो लोग अपने मित्रों पर इसी विश्वास के कारण संकट में आते हैं। सभी परिचित लोगों को मित्र मानने की प्रवृत्ति संकट का कारण बनती है। कई बार हम लोग अपने गुप्त रहस्य किसी को बिना जांचे-परखे मित्र मानकर बता देते हैं बाद में पता लगता है कि उसका वह रहस्य हजम नहीं हुए और सभी को बताता फिर रहा है। वर्तमान में युवा वर्ग को अपने मित्र ही अधिक भ्रम और अपराध के रास्ते पर ले जाते हैं।

आजकल सच्चे और खरे मित्र मिलना कठिन है इसलिये सोच समझकर ही लोगों को अपना मित्र मानना चाहिए। वैसे कहना तो पड़ता ही है कि‘अमुक हमारा मित्र है’ पर वह उस मित्रता की कसौटी पर वह खरा उतरता है कि नहीं यह भी देख लेना चाहिए। भले जुबान से कहते रहे पर अपने मन में किसी को मित्र मान लेने की बात बिना परखे नहीं धारण करना चाहिए।
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लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

भृतहरि शतकःआजीविका कमाते हुए मनुष्य की जिंदगी चली जाती है



हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमश्यनं धात्रा मरुत्कल्पितं
व्यालानां पशवस्तृणांकुरभुजस्तुष्टाः स्थलीशायिनः
संसारार्णवलंधनक्षमध्यिां वृत्तिः कृता सां नृणां
तामन्वेषयतां प्रर्याति सततं सर्व समाप्ति गुणाः

हिंदी में भावार्थ-परमात्मा ने सांपों के भोजन के रूप में हवा को बनाया जिसे प्राप्त करने में उनको बगैर हिंसा और विशेष प्रयास किए बिना प्राप्त हो जाती है। पशु के भोजन के लिए घास का सृजन किया और सोने के लिए धरती को बिस्तर बना दिया परंतु जो मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक से मोक्ष प्राप्त कर सकता है उसकी रोजीरोटी ऐसी बनायी जिसकी खोज में उसके सारे गुण व्यर्थ चले जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हर मनुष्य को अपने जीविकोपार्जन के लिये कार्य करना पड़ता है पर वह केवल इससे संतुष्ट नहीं होता। उसने अनेक तरह के सामाजिक व्यवहारों की परंपरा बना ली है जिसके निर्वहन के लिये अधिक धन की आवश्यकता होती है। मनुष्य समुदाय ने कथित संस्कारों के नाम पर एक दूसरे मुफ्त में भोजन कराने के लिये ऐसे रीति रिवाजों की स्थापाना की है जिनको हरेक के लिये करना अनिवार्य हो गया है और जो नहीं करता उसका उपहास उड़ाया जाता है। अपने परिवार के भरण-पोषण करने के अलावा पूरे कथित समाज में सम्मान की चिंता करता हुआ आदमी पूरी जिंदगी केवल इसी में ही बिता देता है और कभी उसके पास भजन के लिये समय नहीं रह पाता। वह न तो अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर पाता है और न इस प्रकृति के विभिन्न रूपों को देख सकता है। बस अपना जीवन ढोता रहता है। अपने अंदर बौद्धिक गुणों का वह कभी उपयोग नहीं कर पाता।

भृतहरि शतक:स्त्री को अबला मानने वाले कवि विपरीत बुद्धि के



नूनं हि ते कविवरा विपरीत वाचो
ये नित्यमाहुरबला इति कामिनीनाम् ।
याभिर्विलालतर तारकदृष्टिपातैः
शक्रायिऽपि विजितास्त्वबलाः कथं ताः

इस श्लोक का आशय यह है कि जो कवि सुंदर स्त्री को अबला मानते हैं उनको तो विपरीत बुद्धि का माना जाना चाहिए। जिन स्त्रियों ने अपने तीक्ष्ण दृष्टि से देवताओं तक को परास्त कर दिया उनको अबला कैसे माना जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अधिकतर कवि और रचयिता स्त्री को अबला मानते हैं पर भर्तुहरि महाराज ने उसके विपरीत उन्हें सबला माना है। सुंदर स्त्री से आशय समूची स्त्री जाति से ही माना जाना चाहिए, क्योंकि स्त्री का सौंदर्य उसके हृदय में स्थित लज्जा और ममता भाव में है जो कमोवेश हर स्त्री में होती है। माता चाहे किसी भी रंग या नस्ल की हो बच्चे पर अपनी ममता लुटा देती है। बच्चा भी अपनी मां को बड़े प्रेम से निहारता है। पूरे विश्व मेंे अनेक कवि और लेखक नारी को अबला मानकर उस पर अपनी विषय सामग्री प्रस्तुत करते हैं। वास्तव में बहुत अज्ञानी होते हैं। उन्हें अपनी रचना के समय यह आभास नहीं होता कि हर स्त्री का किसी न किसी पुरुष-जिसमें पिता, भाई, पति और रिश्ते-से संबंध होता है। वह सबके साथ निभाते हुए उनसे संरक्षण पाती है। जो लोग स्त्री को अबला मानकर अपनी रचना लिखते हैं वह वास्तव में अपने आसपास स्थित नारियों से अपने संबंधों पर दृष्टिपात किये बिना ही केवल नाम पाने के लिये लिखते हैं और इसी कारण आजकल पूरे विश्व में नारी को लेकर असत्य साहित्य की भरमार है। अनेक कहानियां और कवितायें नारियों को अबला और शोषित मानकर कर लिखीं जातीं हैं और उनमें सच कम कल्पना अधिक होती है। ऐसे लोग विपरीत बुद्धि के महत्वांकाक्षी लेखक लोगों की बुद्धि तरस योग्य है।

भृतहरि शतकःकामदेव का शिकार हुए बिना युवावस्था निकल जाये तो धन्य समझें



श्रृङगारद्रुमनीरदे प्रचुरतः क्रीडारसस्त्रोतसि
प्रद्युम्नप्रियन्धवे चतुरवाङ्मुक्ताफलोदन्वति।
तन्वीनेत्रयचकोरवनविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ
धन्यः कोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे यौवने

हिंदी में भावार्थ’- जैसे श्रृंगार रस के पौधे को मेघ सींचकर उसको वृक्ष का रूप प्रदान करते हैं वैसे ही युवावस्था में अपने कदम रख रहे युवकों के हृदय में कामदेव उत्तेजना और काम भावना उत्पन्न करते हैं। उनका इष्ट तो कामदेव ही होता हे। वह अपनी वाणी से ऐसी भाषा का उपयोग करते हैं जिससे कि नवयुवतियां का हृदय जीतकर उसमें अपना स्थान बनायें। नवयुवतियां भी पूनम के चंद्रमा की तरह दृष्टिगोचर होती हैं और वह उन युवकों को एकटक देखकर आनंद विभोर होती हैं। इस युवावस्था में जो नहीं बहके उस तो धन्य ही समझना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-प्राचीन काल में जब समाज इतना खुला नहीं था तब संभवतः भृतहरि के इस श्लोक को इतना महत्व नहीं मिला होगा जितना अब खुलेपन की राह पर चलते हुए समाज को देखते हुए लग रहा है। भारत के उष्ण जलवायु के चलते वैसे भी लोगों में काम भावना अधिक होती है। हम लोग अक्सर ऐसे समाचार सुंनते हैं जिसमें अनैतिक अथवा विवाहेत्तर संबंधों का दुष्परिणाम सामने आता है। कहा जाता है कि बुराई का अंत भी बुरा ही होता है। कामदेव के क्षणिक प्रभाव में आकर कई लोग अनेक गल्तियां कर जाते हैं और फिर उसका दुष्परिणाम उनको जीवन भर भोगना पड़ता है। आजकल जिनके पास पैसा, पद और प्रतिष्ठा है वह अनैतिक या विवाहेत्तर संबंध बनाने में कोई संकोच नहीं करते। एक नहीं ऐसे हजारांे उदाहरण है जब ऐसे गलत संबंधों के कारण लोग अपराध में लिप्त हो जाते हैं। जो युवक-युवतियां अपने परिवार से मिली छूट का लाभ उठाकर खुलेपन से यौन संबंध तो बना लेते हैं पर बाद में जब जीवन संजीदगी से गुजारने का विचार आता है तो स्वयं को उसके लिये तैयार नहीं कर पाते। कहीं युवतियां तो कहीं युवक इस कामदेव के शिकार होकर अपनी देहलीला तक समाप्त कर लेते हैं। कुछ युवतियां को युवकों की हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है। हालांकि आजकल प्रचार माध्यमों में इसे कथित रूप से प्यार कहा जाता है पर यह एक भ्रम है। आजकल के नवयुवक नवयुवतियों को आकर्षित करने के लिए उनको शायरी और गीत सुनाने प्रभावित करने का प्रयास करते हैं जो उन्होंने कहीं से उठा ली होती हैं। वह इस तरह का प्रयास करते हैं कि उनको एक कवि या शायर समझकर नवयुवतियां प्रभावित हो जायें।

यह तो कामदेव की माया है। हमारे देश में प्यार या प्रेम के अर्थ बहुत व्यापक होते हैं पर पश्चिम की संस्कृति को अपनाने के कारण यह केवल युवक-युवतियों के संबंधों तक ही सीमित रह गया हैं। ऐसे में जो नवयुवक और नवयुवतियां इस अवस्था से सुरक्षित निकल जाते हैं वह स्वयं अपने को धन्य ही समझें कि उन्होंने कोई ऐसी गलती नहीं की जिससे उनको जीवन भर पछताना पड़े।

भृतहरि शतक:आजीविका की खोज में आदमी के गुण व्यर्थ हो जाते हैं



हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमश्यनं धात्रा मरुत्कल्पितं
व्यालानां पशवस्तृणांकुरभुजस्तुष्टाः स्थलीशायिनः
संसारार्णवलंधनक्षमध्यिां वृत्तिः कृता सां नृणां
तामन्वेषयतां प्रर्याति सततं सर्व समाप्ति गुणाः

हिंदी में भावार्थ परमात्मा ने सांपों के भोजन के रूप में हवा को बनाया जिसे प्राप्त करने में उनको बगैर हिंसा और विशेष प्रयास किए बिना प्राप्त हो जाती है। पशु के भोजन के लिए घास का सृजन किया और सोने के लिए धरती को बिस्तर बना दिया परंतु जो मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक से मोक्ष प्राप्त कर सकता है उसकी रोजीरोटी ऐसी बनायी जिसकी खोज में उसके सारे गुण व्यर्थ चले जाते हैं।