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भ्रष्टाचार यानि काम का शिष्टाचार-हास्य कविताएँ (bhrashtachar yani kaam ka shishtachar-hasya kavitaen)


भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन
देश में चल रहा है,
फिर भी यहाँ हर कोई
अपनों को छल रहा है।
नारों और वादों पर चलने का आदी है समाज
आकाश में देखता है फरिश्ते,
ज़मीन पर भुला रहा है रिश्ते,
खड़ा है वही चौराहे पर
रखकर अपनी दौलत अंधेरी तिजोरी में
हाथ में उसके
ईमानदारी का दीपक जल रहा है।
————
एक ईमानदार ने बेईमान से कहा
“तुम थकते नहीं हो
करते हों हमेशा भ्रष्टाचार,
सारे देश में शोर मचा है
पर तुम्हें खौफ नहीं है
जारी है तुम्हारा काला व्यापार।’
बेईमान ने कहा
“तुम समझते नहीं हों
इसलिए अपने घर में ही जमते नहीं हों,
अगर ऊपरी कमाए न करें तो
कहीं के न रह जाएँ,
बाहर लोग मक्कार समझें
घर में नकारा कहलाएं,
आज हर जगह वही आदमी ऊंचाई पर है
जिसकी तिजोरी भरी है,
करे जो चोरी और सीना जोरी
उसकी कही बात ही खरी है,
तुम तो ठस ठहरे
बस इतना समझो कि
यहाँ पर सब चलता है यार,
चाहे जितना चले आंदोलन
नहीं बदलेगा
हमारे काम का शिष्टाचार ।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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