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सम्मान वापसी और रचनात्मकता का वैचारिक संघर्ष-हिन्दी लेख


          अब हम उन्हें दक्षिणपंथी कहें या राष्ट्रवादी  जो अब पुराने सम्मानीय लेखकों के सामान वापसी प्रकरण से उत्तेजित हैं और तय नहीं कर पा रहे कि उनके प्रचार का प्रतिरोध कैसे करें?  इस लेखक को जनवादी और प्रगतिशील लेखक मित्र दक्षिणपंथी श्रेणी में रखते हैं। मूलत हम स्वयं  को भारतीय अध्यात्मिकवादी मानते हैं शायद यही कारण है कि दक्षिणपंथी या राष्ट्रवादी लेखकों से स्वभाविक करीबी दिखती है-यह अलग बात है कि थोड़ा आगे बढ़े तो उनसे भी मतभिन्नता दिखाई देगी।  एक बात तय रही कि दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी अंतर्जालीय लेखकों से हमारी करीबी दिखेगी क्योंकि जिसे वह हिन्दू धर्म कहते हैं हम उसे भारतीय अध्यात्मिक समूह कहते हैं।  दक्षिणपंथी  या राष्ट्रवादी वैचारिक युद्ध में जनवादियों और प्रगतिशीलों जैसी रचना शैली रखना चाहते हैं जो कि पश्चिम तकनीकी पर आधारित है जो कि कारगर नहीं हो पाती।

                                   पहले तो दक्षिणपंथी  या राष्ट्रवादी लेखकों को अपने हृदय से यह कुंठा निकाल देना चाहिये कि वह जनवादी और प्रगतिशील लेखकों की तरह रचना नहीं लिख सकते। हम सीधी बात कहें नयी रचनायें होनी चहिये पर यह हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान नारे वालों के लिये बाध्यता नहीं है।  रामायण, महाभारत, भागवत, श्रीमद्भागवत गीता के साथ ही वेद और उपनिषद जैसी पावन रचनायें पहले से ही अपना वजूद कायम किये हैं। संस्कृत साहित्य इस तरह अनुवादित हो गया है कि वह हिन्दी की मौलिक संपदा लगता है।  उसके बाद हिन्दी का मध्य काल जिसे स्वर्ण काल की रचनायें तो इतनी जोरदार हैं कि प्रगतिशील और जनवादी अपनी नयी रचनाओं के लिये पाठक एक अभियान की तरह इसलिये जुटाते हैं क्योंकि हमारा पूरा समाज अपनी प्राचीन रचनाओं से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है और सहजता से उसे नहीं भूलता।  इतनी ही नहीं आज का पाठक भी तुलसी, रहीम, कबीर, मीरा, सूर तथा अन्य महाकवियों की रचनाओं से इतना मंत्रमुग्ध है कि वह नयी रचना उनके समकक्ष देखना चाहता है।  प्रगतिशील और जनवादियोें को अपनी रचना जनमानस में लाने के लिये पहलीे पाठकों की स्मरण शक्ति ध्वस्त करना होती है इसलिये वह अनेक तरह के स्वांग रचते हैं जबकि दक्षिणपंथी  या राष्ट्रवादी लेखकों को इसकी अपनी प्राचीन बौद्धिक संपदा के होते इसकी आवश्कता नहीं होती।  आपने देखा होगा कि कहीं अगर श्री मद्भागवत कथा होती है तो वह लोग उसके श्रवण के लिये स्वयं पहुंच जाते हैं पर कहीं कवि सम्मेलन हो तो उसका विज्ञापन करना पड़ता है। हमारी प्राचीन साहित्य संपदा इतनी व्यापक है कि वह पूरे जीवन पढ़ते और सुनते रहो वह खत्म नहीं होती सांसों की संख्या कम पड़ जाती है।  प्रगतिशील और जनवादी ऐसे मजबूत बौद्धिक समाज में सेंध लगाने के लिये संघर्ष करते हुए सम्मान, पुरस्कार, और कवि सम्मेलनों का खेल दिखाते हैं। उनकी सक्रियता उन्हें प्रचार भी दिलाती रही है। इतने संघर्ष के बावजूद यह लेखक पुराने बौद्धिक किले में सेंध नहीं लगा सके यह निराशा तो उनके मन में ही थी इस पर अब उन्हें प्रचार माध्यमोें से मिलने वाला समर्थन भी बदले हुए समय में कम होता जा रहा है। प्रचार माध्यम आजकल दक्षिणपंथी  या राष्ट्रवादी विद्वानों के कथित विवादास्पद बयानों पर बहसे अधिक करने लगे हैं और प्रगतिशीलों और जनवादियों को लगता है कि यही पांच साल चला तो उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा।  मनुस्मृति के एक श्लोक और रामचरित मानस के एक दोहे का हिन्दी में अर्थ से अनर्थ कर इन लोगों ने समूची प्राचीन रचनाओं को ही भ्रष्ट प्रचारित कर पिछले साठ वर्षों से अपना पाठक समाज जुटाया जो अब इनसे दूर होने लगा है।

                                   प्रगतिशील और जनवादियों की रचनायें समाज को टुकड़ों में बांटकर देखती हैं।  पुरुष महिला, युवा बूढ़ा, गरीब अमीर, अगड़ा पिछड़ा और सवर्ण, मजदूर मालिक और बेबस और शक्तिशाली के बीच संघर्ष तथा समस्या  के बीच यह लोग पुल की तरह अपनी जगह बनाते हैं।  जनवादी रचनायें समाज में मानवीय स्वभाववश चल रहे संघर्षों में कमजोर पक्ष को राज्य या जनसंगठन के आधार पर विजयी दिखाती हैं तो प्रगतिशील  रचनायें संघर्ष तथा समस्या को कागज पर लाकर समाज या राज्य को सोचने के लिये सौंपती भर हैं। विजय या निराकारण कोई उपाय वहीं नहीं बतातीं।  भारतीय अध्यात्मिकवादी इन संघर्षों और समस्याओें को सतह पर लाते हैं पर वह समाज में चेतना लाकर उसे स्वयं ही जूझने के लिये प्रेरित करते हैं। एक अध्यात्मिकवादी लेखन के अभ्यासी के नाते हमें यह लगने लगा है कि अपने प्राचीन ज्ञान से परे रहने के कारण ही हमारे राष्ट्र में संस्कारों, संस्कृति आज सामाजिक संकट पैदा हुआ है।  अभी एक फिल्म आयी थी ओ माई गॉड। उसकी कहानी को हम अध्यात्मिकवादी रचना मान सकते हैं क्योंकि वह चेतना लाने की प्रेरणा देती है न कि समस्या को अधूरा छोड़ती है।

                                   प्रगतिशील और जनवादी सुकरात, शेक्सपियर और जार्ज बर्नाड शॉ जैसे पश्चिमी रचनाओं को समाज में लाये। उनका लक्ष्य तुलसी, कबीर, रहीम, मीरा, सूर की स्मृतियां विलोपित करना था। ऐसा नहीं कर पाये। ऐसा नहीं है कि पश्चिम में विद्वान नहीं हुए पर उनकी रचनायें वह रामायण, भागवत, महाभारत, रामचरित मानस और गुरुग्रंथ साहिब जैसी व्यापक आधार वाली नहीं हैं। इसके अलावा चाणक्य और विदुर जैसे दार्शनिक हमारे पास रहे हैं।  ऐसे में सुकरात और स्वेट मार्डेन जैसे पश्चिमी दार्शनिकों को बौद्धिक जनमानस में वैसी जगह नहीं मिल पायी जैसी कि प्रगतिशील और जनवादी चाहते थे। महत्वपूर्ण बात यह कि हमारे देश में काव्यात्मक शैली अधिक लोकप्रिय रही है। एक श्लोक या दोहे में ऐसी बात कही जाती है जिसमें ज्ञान और विज्ञान समा जाता है। गद्यात्मक रचनायें अधिक गेय नहीं रही जबकि प्रगतिशील और जनवादी इस विधा में अधिक लिखते हैं। जनवादी और प्रगतिशील भारतीय समाज के अंधविश्वास और पाखंड पर प्रहार करते हैं पर उससे बचने का मार्ग वह नहीं बताते। उनकी प्रहारात्मक शैली समाज में चिढ़ पैदा करती है। जबकि हम देखें कि यह कार्य भगवान गुरुनानकजी संतप्रवर कबीर, और कविवर रहीम ने भी किया पर उन्होंने परमात्मा के नाम स्मरण का मार्ग भी बताया।  समाज उन्हें आज भी प्रेरक मानता है। इसलिये यह कहना कि भारतीय समाज में असहिष्णुता बढ़ रही है गलत है।

                                   दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों की ताकत देश में वर्षों से प्रवाहित अध्यात्मिक ज्ञान ही है जिसके अध्ययन करने पर ही ऐसी तर्कशक्ति मिल सकती जिससे  प्रगतिशील और जनवादियों से बहस के चुनौती दी जा सके।  इस लेखक ने अनुभव किया है कि जनवादी  बहस के समय भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के नाम से ही चिढ़ते हैं।  मनुस्मृति में उनके अवर्णों और स्त्री के प्रति अपमान ही नज़र आता है।  जबकि उसी मनुस्मृति में स्त्री के साथ जबरन संपर्क करने वाले को ऐसी कड़ी सजा की बात कही गयी है जिसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती। जब हम ऐसे तर्क देते हैं तो वह मुंह छिपाकर भाग जाते है।  एक मजेदार बात यह कि जनवादी हिन्दू धर्म के अलावा सभी धर्मों मेें गुण मानते हैं।  यह राज हमारे आज तक समझ में नहीं आया पर अब लगने लगा है कि उनके पास भारतीय बौद्धिक समाज में पैठ बनाने के लिये यह नीति अपनाने को अलावा कोई चारा भी नहीं है।  दूर के ढोल सुहावने की तर्ज पर ही  वह पाश्चात्य विचाराधारा के सहारे अपना अस्तित्व बनाये रख सकते है।

                                   इसलिये राष्ट्रवादी विचाराधारा के लोगों अब ऐसे अध्यात्मिक अभ्यासियों को  साथ लेना चाहिये जो गृहस्थ होने के साथ ही लेखन कार्य में सक्रिय हों। पेशेवर धार्मिक शिखर पुरुषों के पास केवल ज्ञान के नारे रट्टे हुए हैं और वह आस्था पर चोट की आड़ लेकर आक्रामक बने रहते हैं।  हमने जब मनुस्मृति और विदुर के संदेश लिखना प्रारंभ किये थे तब टिप्पणीकर्ताओं ने साफ कर दिया था कि आप किसी सम्मान की आशा न करें क्योंकि आप धाराओं से बाहर जाकर काम कर रहे हैं। हम करते भी नहीं।  सच बात तो यह है कि जिस तरह देश में वातावरण रहा है उसके चलते मनुस्मृति के संदेशों की व्याख्या करने वालो को सम्मानित करने का अर्थ हैं अपने पांव कुल्हारी मारना।  हम आज भी नहीं चाहेंगे कि हमें सम्मान देकर मनुवादी होने का कोई दंश झेले पर दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी अब अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ायें-यह हमारी कामना है।

          —————–

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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भारत के मजदूरों समझदार हो जाओ-हिन्दी कविता


दुनियां के मज़दूरों

अब समझदार भी हो जाओ।

करते हैं जो तुम्हें महलों का

स्वामी बनाने का दावा

दौलतमंदों के लिये

करते छलावा

हड़ताल पर मत जाओ।

कहें दीपकबापू हंसिया हथौड़ा

तुम्हारी मजदूरी के हथियार हैं

हुड़दंग का चिन्ह न बनाओे

 दलाल भेड़ों की भीड़ की तरह

तुम्हें चौराहों पर सजाते हैं

उनके बहकावे में न आओ।

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युवा शक्ति के

विकास का नारा

धन के लोभी लगाते हैं।

कहीं चूसते पसीना

कहीं पैसे के लिये

नशे का बाज़ार सजाते है।

कहें दीपक बापू युवा शक्ति से

देश विकसित हो जाता

अगर कोई खूबसूरत सपने के

सच में उगने के बीज बो पाता,

यहां तो युवा खून के सौदागर

मुफ्त का पसीना बनाते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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xबाहूबली फिल्म की सफलता पर चर्चा-हिन्दी लेख


                              अंग्रेजी संस्कारों ने हमारे देश में रविवार को सामान्य अवकाश का दिन बना दिया है। रविवार के दिन सुबह भजन या अध्यात्मिक सत्संग प्रसारित करने वाले टीवी चैनल खोलकर देखें तो वास्तव में शांति मिलती है। चैनल ढूंढने  के लिये रिमोट दबाते समय अगर कोई समाचार चैनल लग जाये तो दिमाग में तनाव आने लगता है-उसमें वही भयानक खबरें चलती हैं जो एक दिन पहले दिख चुकी हैं- और जब तक मनपसंद चैनल तक पहुंचे तक वह बना ही रहता है।  बाद में भजन या सत्संग के आनंद से मिले अमृत पर ही उस तनाव का निवारण हो पता है।

                              वैसे तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार सभी दिन हरि के माने जाते हैं पर अंग्रेजों ने गुलामी से मुक्ति देते समय शिक्षा, राजकीय प्रबंध व्यवस्था तथा रहन सहन के साथ ही भक्ति में भी अपने सिद्धांत सौंपे जिसे हमारे सुविधाभोगी शिखर पुरुषों से सहजता से स्वीकार कर लिय।  जैसा कि नियम है शिखर पुरुषों  का अनुसरण  समाज करता ही है।  हमें याद है पहले अनेक जगह मंगलवार को दुकानें बंद रहती थीं।  वणिक परिवार का होने के नाते मंगलवार हमारा प्रिय दिन था।  बाद में चाकरी में रोटी की तलाश शुरु हुई तो रविवार का दिन ही अध्यात्मिक के लिये मिलने लगा।  इधर हमारे धार्मिक शिखर पुरुषों-उनके अध्यात्मिक ज्ञानी होने का भ्रम कतई न पालें-ने जब देखा कि उनके पास आने वाली भीड़ में नौकरी पेशा तथा बड़ा व्यवसाय या उद्योग चलाने वाले ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो रविवार के दिन ही  अवकाश लेते हैं तो उन्होंने उसे ही मुख्य दिवस बना दिया।

                              इधर प्रचार माध्यम भी रविवार के दिन ‘सुपर संडे’ बनाने का प्रयास करते हैं और उनके स्वामियों के प्रायोजित अनेक संगठन इसी दिन कोई प्रदर्शन आदि कर उनके लिये प्रचार सामग्री बनाते हैं या फिर कोई बंदा सनसनीखेज बयान देता है जिससे उन्हें सारा दिन प्रचारित कर बहस चलाने का अवसर मिल जाता है।  अन्ना आंदोलन और चुनाव के दौरान इन प्रचार माध्यमों को ऐसे अवसर खूब मिले पर अब लगता है कि अब शायद ऐसा नहीं हो पा रहा है। फिर भी महिलाओं के प्रति धटित अपराध अथवा धार्मिक नेताओं के बयानों से यह अपने विज्ञापन प्रसारण के बीच सनसनीखेज सामग्री निकालने का प्रयास कर रहे हैं। यह अलग बात कि जम नहीं पा रहा है।

                              इधर बाहुबली फिल्म की सफलता के अनेक अर्थ निकाले जा रहे हैं।  यह अवसर भी प्रचार माध्यम स्वयं देते है-यह पता नहीं कि वह अनजाने में करते हैं या जानबुझकर-जब बॉलीवुड के सुल्तान और बादशाह से बाहूबली फिल्म के नायक की चर्चा कर रहे हैं। तब अनेक लोगों के दिमाग में यह बात आती तो है कि अक्षय कुमार, अजय देवगन, सन्नी देयोल, अक्षय खन्ना और सुनील शेट्टी जैसे अभिनेता भी हैं जो फिल्म उद्योग को भारी राजस्व कमा कर देते हैं।  अक्षय कुमार के लिये इनके पास कोई उपमा ही नहीं होती।  यह अभिनेता अनेक बार आपस में काम कर चुके हैं पर उसकी चर्चा इतने महत्व की नहीं होती जैसी सुल्तान और बादशाह के आपस में अभिवादन करने पर ही हो जाती है।  अंततः फिल्म और टीवी भावनाओं पर ही अपना बाज़ार चमकाते हैं और इससे जुड़े लोगों का पता होना चाहिये कि उनके इस तरीके पर समाज में जागरुक लोग रेखांकित करते हैं।  सभी तो उनके मानसिक गुलाम नहीं हो सकते। हम ऐसा नहीं सोचते पर ऐसा सोचने वाले लोगों की बातें सुनी हैं इसलिये इस विशिष्ट रविवारीय लेख में लिख रहे हैं।

हरिओम, जय श्रीराम, जय श्री कृष्ण

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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#भारतीय #मीडिया का व्यंजना शैली में #उन्माद फैलाना ठीक नहीं-#हिन्दीचिंत्तनलेख


                              आज एक अभिनेता ने एक कैदी को फांसी की सजा दिये जाने का ट्विटर पर विरोध किया है। हमें पता नहीं कि उस अभिनेता ने ऐसा क्या अनुभव किया कि ऐसी बात लिख दी जो उनके ही प्रशंसकों को धार्मिक दृष्टि से नाराज कर सकती है हालांकि इसके लिये उसे जिम्मेदारी नहीं माना जा सकता वरन् प्रचार माध्यम सांकेतिक रूप से इसमें धर्म तत्व का तड़का लगाने का प्रयास कर रहे हैं। मूलत न्यायालय और प्रशासनिक मसलों पर जिस तिरह प्रचार माध्यम व्यंजना शैली में सांप्रदायिकता उन्माद फैलाने वाले धार्मिक विषय जोड़ रहे हैं वह अत्यंत चिंताजनक है।

  कभी कभी तो यह लगता है कि हमारे प्रचार व्यवसायियों को देश में स्थाई शांति पसंद नहीं है। शायद उनको लगता है कि जिस तरह बिना झगड़े फसाद वाली फिल्में ज्यादा दर्शक नहीं जुटा पाती, उसी तरह जब तक देश में हिंसक या तनाव वाली वारदातें न हों तब तक उनके समाचार और बहसों के लिये दर्शक नहीं मिल पायेंगे। यही कारण है कि वह देश में साम्प्रदायिक तनाव फैलाने के इस तरह प्रयास करते लगते हैं जैसे कि देश की एकता की रक्षा और अखंडता के लिये बहुत चिंतित हों।  यह अलग बात है कि चिंतित केवल वह अपने विज्ञापनों का समय पास करने के लिये ही होते हैं।

                              सबसे बड़ी समस्या न्यायालयीन और प्रशासनिक के क्षेत्राधिकार वाले  मसलों पर सार्वजनिक बहस इस तरह करते हैं जैसे कि वहा कोई मुकदमा चला रहे हों।  अपने यहां वह प्रायोजित विद्वान बुलाते हैं इसलिये कोई उनसे कहता नहीं पर अंतर्जाल पर इन संगठित माध्यमों के लिये मित्रतापूर्ण भाव नहीं दिखता।  इनके समाचारों की स्थिति यह है कि दोपहर को अगर क्रिकेट, राजनीति और फिल्म से जुड़ी सनसनी खबर आ जाये तो फिर यह समझते देर नही लगती कि रात तक वही चलेगी। यही कारण है कि आजकल हम रात को टीवी समाचार छोड़कर अंतर्जाल पर पाठ लिखने लगते हैं।

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खाने पीने में सुपाच्य पदार्थ ग्रहण करना आवश्यक-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष हिन्दी चिंत्तन लेख


        देश में मैगी के भोज्य पदार्थ को लेकर विवाद का दौर चल रहा है। हमारी दृष्टि से  एक उत्पादक संस्थान पर ही चर्चा करना पर्याप्त नहीं है। उपभोग की बदलती प्रवृत्तियों ने संगठित उत्पादक संस्थानों के भोज्य पदार्थों को उस भारतीय समाज का हिस्सा बना दिया है जो स्वास्थ्य का उच्च स्तर घरेलू भोजन में ढूंढने के सिद्धांत को तो मानता है पर विज्ञापन के प्रभाव में अज्ञानी हो जाता है। अनेक संगठित उत्पादक संस्थान खाद्य तथा पेय पदार्थों का विज्ञापन भारतीय चलचित्र क्षेत्र के अभिनेताओं से करवाते हैं।  उन्हें अपने विज्ञापनों में अभिनय करने के लिये भारी राशि देते हैं। इन्हीं विज्ञापनों के प्रसारण प्रकाशन के लिये टीवी चैनल तथा समाचार पत्रों में भी भुगतान किया जाता है। इन उत्पादक संस्थानों के विज्ञापनो के दम पर कितने लोगों की कमाई हो रही है इसका अनुमान तो नहीं है पर इतना तय है कि इसका व्यय अंततः उपभोक्ता के जेब से ही निकाला जाता है। आलू चिप्स के बारे में कहा जाता है कि एक रुपये के आलू की चिप्स के  दस रुपये लिये जाते हैं।

        हमारे देश में अनेक  भोज्य पदार्थ पहलेे ही बनाकर बाद में खाने की परंपरा रही है। चिप्स, अचार, मिठाई तथा पापड़ आदि अनेक पदार्थ हैं जिन्हें हम खाते रहे हैं। पहले घरेलू महिलायें नित नये पदार्थ बनाकर अपना समय काटने के साथ ही परिवार के लिये आनंद का वातावरण बनाती थीं। अब समय बदल गया है। कामकाजी महिलाओं को समय नहीं मिलता तो शहर की गृहस्थ महिलाओं के पास भी अब नये समस्यायें आने लगी हैं जिससे वह परंपरागत भोज्य पदार्थों के निर्माण के लिये तैयार नहीं हो पातीं। उस पर हर चीज बाज़ार में पैसा देकर उपलब्ध होने लगी है। घरेलू भोजन में बाज़ार से अधिक शुद्धता की बात करना अप्रासंगिक लगता है। इसका बृहद उत्पादक संस्थानों को भरपूर लाभ मिला है।

       भारतीय समाज में चेतना और मानसिक दृढ़ता की कमी भी दिखने लगी है। अभी मैगी के विरुद्ध अभियान चल रहा है पर कुछ समय बाद जैसे ही धीमा होगा वैसे ही फिर लोग इसका उपभोग करने लगेंगे। पेय पदार्थों में तो शौचालय स्वच्छ करने वाले द्रव्य मिले होने की बात कही जाती है। फिर भी उसका सेवल धड़ल्ले से होता है। यह अलग बात है कि निजी अस्पतालों में बीमारों की भीड़ देखकर कोई भी यह कह सकता है कि यह सब बाज़ार के खाद्य तथा पेय पदार्थों की अधिक उपभोग के कारण हो रहा है।

        ऐसे में बृहद उत्पादक संस्थानों के खाद्य तथा पेय पदार्थों के प्रतिकूल अभियान छेड़ने से अधिक समाज में इसके दोषों की जानकारी देकर उसे जाग्रत करने की आवश्कयता अधिक लगती है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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रोटी की तलाश-हिन्दी कवितायें


महंगाई तो यूं ही

बढ़ती जायेगी।

भावनायें होंगी सस्ती

हृदय में संवेदनशीलता

घटती जायेगी।

कहें दीपक बापू भरे पेट से

सर्वशक्तिमान की हो

या देश की

भक्ति सहजता से होती है,

रोटी की तलाश में नाकामी

अपने से ही विश्वास खोती है,

मजबूरी बढ़ेगी जितनी

इंसानों में वफादारी उतनी ही

घटती जायेगी।

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निरर्थक विषय पर

बोलें या मौन रहें

कई बार भ्रम हो जाता है।

इंसानों के वादे पर

यकीन करें या उपेक्षा

सोच का क्रम खो जाता है।

कहें दीपक बापू घरती पर

फरिश्ते पैदा होते नहीं

आकाश से टपकना भी मुश्किल

इंसान के बने अंतरिक्ष यानों के बीच

मार्ग ढूंढते ढूंढते ही

उनका पूरा श्रम हो जाता है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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नकारा आदमी की बदतमीजी सहने से कोई लाभ नहीं-भर्तृहरि नीति शतक


सामान्य मनुष्य की यह प्रवृत्ति रहती है कि वह उच्च पदस्थ, धनवान तथा प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचे कथित सिद्ध पुरुषों की चाटुकारिता इस उद्देश्य से करता है कि पता नहीं कब उनमें काम पड़ जाये? जबकि शिखर पुरुषों की भी यह प्रकृत्ति है कि वह अपनी सुविधानुसार ही सामान्य लोगों को लाभ देने का अवसर प्रदान करते हैं।  वह दरियादिल नहीं होते पर समाज उनसे ऐसी अपेक्षा सदैव किये रहता है कि वह कभी न कभी दया कर सकते हैं।  माया के पुतले इन शिखर पुरुषों को अनावश्यक ही प्रतिष्ठा और सम्मान मिलता है जिस कारण हर कोई उन जैसा स्तर पाने की कामना करता है।

पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि

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फलमलशनाय स्वादु पानाय तोयं।

क्षितिरपि शयनार्थ वाससे वल्कलं च।

नवधन-मधुपानभ्रान्तसर्वेन्द्रियाणामविनयमनुमन्तुं नौतसहे दुर्जनाम्।।

            हिन्दी में भावार्थ-खाने के लिये पर्याप्त धन, पीने के लिये मधुर जल, सोने के लिये प्रथ्वी और पहनने के लिये वृक्षों की छाल है तो हमारी नई ताजी संपदा की मदिरा पीकर मस्त हुए दुर्जनों की बदतमीजी सहने की कोई इच्छा नहीं है।

            योगी, सन्यासी और ज्ञानी इस मायावी संसार के सत्य को जानते हैं।  इसलिये ही जितना मिले उससे संतोष कर लेते हैं।  कहा भी जाता है कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है जबकि असंतोष के वशीभूत होकर लोग न केवल अनुचित प्रयास करते हैं वरन् अनावश्यक ही धन, पद और प्रतिष्ठा के शिखर पुरुषों के दरवाजे अनावश्यक नत मस्तक होते हैं।  कालांतर में असंतोष से प्रेरित होकर किये गये प्रयास उन्हें भारी निराश करते हैं। हर व्यक्ति को एक बात याद रखना चाहिये कि उच्च पद, धनवान तथा प्रतिष्ठा के शिखर पर बैठे लोग  कुछ देने के लिये हाथ जरूर उठाते हैं पर वह उनकी सुविधानुसार सकाम प्रयास होता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

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नया साल और नशा-हिन्दी व्यंग्य कविताये(naya sal aur nasha-hindi satire poem


शराब पीते नहीं

मांस खाना आया नहीं

वह अंग्रेजी नये वर्ष का

स्वागत कहां कर पाते हैं।

भारतीय नव संवत् के

आगमन पर पकवान खाकर

प्रसन्न मन होता है

मजेदार मौसम का

आनंद भी उठाते हैं।

कहें दीपक बापू विकास के मद में,

पैसे के बड़े कद में,

ताकत के ऊंचे पद मे

जिनकी आंखें मायावी प्रवाह से

 बहक जाती हैं,

सुबह उगता सूरज

देखते से होते वंचित

रात के अंधेरे को खाती

कृत्रिम रौशनी उनको बहुत भाती है,

प्राचीन पर्वों से

जिनका मन अभी भरा नहीं है,

मस्तिष्क में स्वदेशी का

सपना अभी मरा नहीं है,

अंग्रेजी के नशे से

वही बचकर खड़े रह पाते हैं।

———————

चालाक और क्रूर इंसान के लिये

पूरा ज़माने के

सभी लोग खिलौना है।

कभी खून बहाते

दिल से उसमें नहाते

इंसानियत का प्रश्न

उनके सामने बौना है।

कहें दीपक बापू हथियारों पर

चलती है जिनकी जिंदगी

दया का अर्थ नहीं जानते,

खून और पानी में

अंतर नहीं मानते,

मिलाकर हाथ उनसे

अपना सुकून खोना है।

————————–

—-

 

सम्मान की चाहत समाज सेवक-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


अपना खून सभी को

प्यारा है

पराया पानी लगता है।

दूसरे के दर्द पर

झूठे आंसु बहाते

या हास्य रस बरसाते

अपने दिल पर लगे भाव जैसा

 नहीं सानी लगता है।

कहें दीपक बापू औपचारिकता से

निभाते हैं लोग संबंध,

नहीं रहती आत्मीयता की सुगंध

भावनाओं की आड़ में

हर कहीं शब्दों का

दानी ही सभी को ठगता है।

———————–

सम्मान पाने के मोह में

संत कवि और समाज सेवक का

वेश लोग बना लेते हैं।

एक से काम बन जाये

दूसरा भी आजमाते

कमजोर दिमाग के होते

मजबूत दिखने के लिये

सिर और मुख पर

केश भी तना लेते हैं।

कहे दीपक बापू प्रचार पाने के लिये

कोई चुटकुले सुनाता,

कोई शायरी गुनगनाता,

पर्दे पर जमे रहने के लिये

हर कोई नया रास्ता बनाता है,

जनहित से वास्ता जताता है,

जरूरत पड़े तो

अपना इलाका देश भी बना लेते हैं।

———————-

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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चालाक लोगों का शब्दकोष-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


गज़ब हैं वह लोग

चेहरे पर जिनके रहती हंसी

हृदय में घात छिपाते हैं।

स्वार्थ के लिये

पहले हाथ जोड़ते

फिर लात दिखाते हैं।

कहें दीपक बापू भाव भंगिमा

करे देती हैं हमें मंत्रमुग्ध

चालाक लोगों पर

जिनके शब्द कोष में

सहानुभूति के अर्थ नहीं होते,

दर्द हरने का करते व्यापार

दवा की नदी में

पैसे से  हाथ धोते,

अपरे चरित्र लगे खून के छींटों पर

चर्चा करो तो

विरोधी की मात दिखाते हैं।

——————-

एक उड़ते हुए पत्थर से

फूटता सिर किसी का

पूरे शहर में

दंगल शुरु हो जाता है।

शांति के  शत्रु

मौन से रहते बेचैन

जलते घर और कराहते लोग

सपनों में देखना उनको पसंद है

जब उड़ाते हैं नींद ज़माने की

करते अपना हृदय तृप्त

शहर में अमंगल गुरु हो जाता है।

कहें दीपक बापू मनुष्य देह में

पशु भी जन्म लेते हैं

रक्त की धारा बहाने पर रहते आमादा

जब लग जाता दांव उनका

चहकता शहर भी

जगल हो जाता है।

——————-

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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छद्म नायकों का खेल-हिन्दी कविता


स्वयं पर नहीं आती हंसी जिनको

दूसरों को चिढाकर

परम आंनद पाते  हैं।

स्वयं घर से निकलते

पहनकर धवल कपड़े

दूसरे पर कीचड़ उछालकर

  रुदन मचाते हैं।

जिन्होंने अपना पूरा जीवन

पेशेवर हमदर्द बनकर बिताया

ज़माने के जख्म पर

नारों का नमक वही छिड़क जाते हैं।

बंद सुविधायुक्त कमरों में

विलासिता के साथ गुजारते

 रात के अंधेरे

दिन में चौराहे पर  आकर

वही समाज सुधार के लिये

हल्ला मचाते हैं।

कहें दीपक बापू बचना

ऐसे कागजी नायकों से

नाव डुबाने की कोशिश से पहले

उसे दिखावे के लिये बचाते हैं।

—————–

एक उड़ते हुए पत्थर से

फूटता सिर किसी का

पूरे शहर में

दंगल शुरु हो जाता है।

शांति के  शत्रु

मौन से रहते बेचैन

जलते घर और कराहते लोग

सपनों में देखना उनको पसंद है

जब उड़ाते हैं नींद ज़माने की

करते अपना हृदय तृप्त

शहर में अमंगल गुरु हो जाता है।

कहें दीपक बापू मनुष्य देह में

पशु भी जन्म लेते हैं

रक्त की धारा बहाने पर रहते आमादा

जब लग जाता दांव उनका

चहकता शहर भी

जगल हो जाता है।

——————-

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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दिखते गंभीर करते दिखावा-हिन्दी व्यंग्य कविता


अपने मुख से

बड़े बड़े शब्द बोलने वाले

हर कदम पर मिलते हैं वीर।

अपने आसन से उठते तो

पांव कांपते हैं,

इशारे के लिये उठाते हाथ

उनके फेफड़े कांपते हैं,

बोलते तो चीखते लगते

भाषा में नहीं होते

उनके तरकश में व्याकरण के तीर।

कहें दीपक बापू आधुनिक रथो पर

सवार है हजारों समाज सेवक

त्याग के दावे करते,

गरीब को  न मिल जाये

पूरी रोटी

इस ख्याल से भी डरते,

हंसते हैं मन ही मन

दूसरे को दर्द पर

बाहर दिखावा करते जैसे हों गंभीर।

———————

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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काला और गोरा धन-हिन्दी कविता


 धन ने भी कर लिये

अपने दो रूप

काला और सफेद।

पीछे दौड़े हर इंसान

गले लगाता सभी को

राक्षस और देवता का

करता नहीं कभी भेद।

बन गया जो सेठ

कर लेता सभी को मुट्ठी में

नहीं देखता ज़माना

उसके चरित्र में छेद।

कहें दीपक बापू भगवान नाम का

स्मरण बहुत बड़ी कमाई

मानी जाती है,

भक्ति की कीमत भी

धन से ही जानी जाती है,

कोई सफेद कागज पर

काले अक्षर लिखकर कमाता,

कोई सफेद अक्षर पर पर

कालिख पोतकर अपन काम जमाता,

सभी सिक्कों की बरसात के

इंतजार में खड़े हैं,

भर जाये झोली

इसी चाह में अडे हैं,

सुमार्ग से आता नहीं

कुमार्ग से आये धन पर

किसी को नहीं खेद है।

——————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

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poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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धन तेेेेरस पर मन का रस बनायें-हिन्दी चिंत्तन लेख


            आज पूरे देश में धनतेरस का पर्व मनाया जा रहा है। भारतीय धर्मों को मानने वाले लोग आज के दिन  दीपावली की पूजा के लिये सामान आदि खरीदते हैं।  इस दिन बाज़ार में भीड़ रहती है तो यह भी सच है कि स्टील, पीतल, सोने तथा अन्य धातुओं से निर्मित सामान भी अन्य दिनों की अपेक्षा अत्यंत महंगे हो जाते है। यही  कारण  है कि वर्ष के किसी भी दिन की अपेक्षा धनतेरस के दिन सामान्य व्यापार में सर्वाधिक आय वाला दिन होता है।  खेरिज व्यापार में सामान्य दिनों की अपेक्षा चार से दस गुना का विक्रय होता है। यह अलग बात है कि दिपावली गुजरते हुए तत्काल मंदी भी आ जाती है।

            समय के साथ महंगाई बढ़ी तो धीमे धीमे धनतेरस के दिन खरीददारी एक औपचारिकता बन कर रह गयी है।  अर्थशास्त्र की दृष्टि से भारत में धन का असमान वितरण एक बहुत भारी समस्या है, यह हमने आज से तीस बरस पहले पढ़ा था।  अर्थशास्त्र के विद्यार्थी को समाज का भी ज्ञान रखना चाहिये और इस आधार पर हम कह सकते हैं कि भले ही हम शहरी क्षेत्रों में धनी लोगों की संख्या बढ़ने का दृश्य देखकर प्रसन्न हों पर सच यह है कि उसके अनुपात में अल्प धनियों की संख्या बढ़ी है।  जहां धातुओं के बड़े सामानों को खरीदने वाले दिखते हैं वहां उनका दाम पूछकर उनसे मुंह फेरने वालों की संख्या ज्यादा होती है। अनेक लोग तो स्टील की टंकी का दाम पूछकर एक चम्मच खरीद कर ही धनतेरस मना लेते हैं। जहां कथित आर्थिक विकास ने अनेक ऐसे लोगों को धनवान बना दिया कि जिनके पास स्टील की कटोरी खरीदने की ताकत नहीं थी अपनी वर्तमान भारी भरकम आये के सामने सोने का कड़ा भी सस्ता लगता है तो वहीं अनेक लोग जो मध्यम वर्ग के थे अब स्वयं को निम्न वर्ग का अनुभव करने लगे हैं। जिनके लिये धनतेरस का दिन औपचारिकता से ही बीतता है।

            इस तरह की चर्चा राजसी विषय है मगर हम  सात्विक दृष्टि से विचार करें तो  इस संसार में सहज जीवन के लिये हृदय में प्रसन्नता होना ही सच्चा सुख है।  धन कितना है, यह महत्वपूर्ण नहीं है हम उसका उपयोग कितना करते हैं यह बात विचारणीय है।  तिजोरियों में पड़ा या बैंक खातों में दर्ज धन मन को प्रसन्न कर सकता है पर उसका उपयोग न करने से वह एक कूड़े के समान है।  दूसरी बात यह कि धन अपने उपयोग के लिये खर्च करने से क्षणिक आनंद मिलता है पर जरूरतमंद की सहायता निष्काम भाव से करने से हृदय में जो उच्च भाव आता है उसका कोई मोल नहीं है।  दूसरी बात यह कि कि धन और पानी एक समान है।  रुके रहे तो सड़ जाते हैं या फिर निकलने का मार्ग बनाते हैं।  धन आता है तो उसके जाने का मार्ग भी बनाते रहना चाहिये वरना वह सड़े हुए पानी की तरह स्वयं के लिये भी कष्टदायक हो जाता है। इंसान जब स्वेच्छा से धन नहीं निकालता तो प्रकृतिक कारण उसे इसके लिये विवश करते हैं कि वह अपनी जेब खोले।

            अपने धन का उपयोग का स्वयं की आवश्यकताओं के लिये सभी करते हैं पर जो दूसरे की आवश्यकता पर उसे देते हैं वह दान या सहायता कहलाता है।  जिन लोगों को धनतेरस के दिन कमाई होती है वह स्वयं के लिये कोई खरीददारी नहीं कर पाते।  मिट्टी के दीपक, फटाखे तथा पूजा का सामान बेचने के लिये फेरी लगाने वाले तो इस प्रयास में रहते हैं कि सामान्य दिनों की अपेंक्षा उनको अधिक मजदूरी मिल जाये तो शायद अपनी अतिरिक्त आवश्यकतायें पूरी हों जायें।  उनकी अपेक्षायें कितनी पूरी होती हैं यह अलग बात है पर निजी क्षेत्र में मजदूरी करने वालों के लिये भी दीपावली का पर्व आशा लेकर आता है।  इस तरह धनतेरस और दीपावली सभी वर्गों के लिये खरीद और बेचने का अवसर समान रूप से ले आता है।

            इस समय मौसम समशीतोष्ण हो जाता है जिससे शीतल हवायें बहते हुए देह और हृदय को प्रसन्न करती हैं। यही तत्व दीपावली को अधिक आनंददायक बना देता है।  हम अपने सभी मित्र ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकों हार्दिक बधाई। जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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फेसबुक पर हिंग्लिश के सामने हिन्दी भाषा कितनी टिकेगी-हिन्दी चिंत्तन लेख


            जनसंपर्क, प्रचार तथा लोकप्रियता का जो बाज़ार हिन्दी भाषियों से कमाते हैं उनमें आत्मविश्वास की  भारी कमी है या नित्य चलायमान बने रहने की परंपरा के तहत भाषा से छेड़छाड़ उसके प्रबंधक तथा कार्यकर्ता कर रहे हैं यह कहना कठिन है। हम बात कर रहे हैं फेसबुक पर अभी हाल ही में हिन्दी प्रारूपण में हिंग्लिश शब्द जोड़ने की।  अभी तक हमें दो शब्द दिखाई दिये। एक तो हिन्दी के पुष्टिकरण  की जगह हिंग्लिश  का कंफर्म (conform) दूसरा  मुखपृष्ठ की  जगह होम (home) कर दिया गया है। हमारी दृष्टि से अब समय आ गया है कि हिंग्लिश और हिन्दी वालों को अलग अलग कर देखा जाना चाहिये। कम से कम स्थापित, प्रचलित तथा आदत में जो शब्द आदत में आ गये हैं, उनमें हिन्दी प्रारूपण अपनाने वाले अंतर्जालीय प्रयोक्ताओं का हृदय विदीर्ण करने के लिये ऐसे परिवर्तन नहीं करना चाहिये जो अनावश्यक हों। हमारा मानना है कि फेसबुक पर किये गये ऐसे परिवर्तन एकदम अनावश्यक हैं।

            पहली बात तो हम यह बता दें कि हमने आज तक अपने संपर्क में आये जितने भी युवाओं को फेसबुक पर कार्य करते देखा है वह अंग्रेजी प्रारूप का उपयोग करते हैं।  वह सभी हिंग्लिश वाले हैं। उनमें से कोई भी हिन्दी प्रारूप का उपयोग करना चाहेगा यह हमें लगता नहीं है।  हम जैसे अंग्रेजी से निरक्षर लोग ही फेसबुक का हिन्दी प्रारूप अपनाये हुऐ हैं। देवनागरी हिन्दी में यह सोचते हुए भी लिखना जारी रखे हुए हैं कि इससे व्यापक आधार पर अभिव्यक्ति का आधार नहीं मिलता।  हिंग्लिश वाले हमसे पढ़ेंगे या हम उनको पढ़ायेंगे यह भ्रम हमें नहीं है। हिन्दी दिवस पर हिन्दी प्रयोकताओं को सामान्य समझने वाले अंग्रेजी प्रेमी भाषाई व्यवसायिक विद्वानों के कथित महान विचार सुनने के पश्चात् तो हमें यह भी लगने लगा है कि हिन्दी में हिंग्लिश मिलाने पर प्रतिकूल लिखना भी व्यर्थ है।

            यह पता नहीं है कि फेसबुक पर इस तरह का  परिवर्तन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विद्वान भारतीय सलाहकारों की राय पर हुआ या फिर भारत में स्थित किन्हीं कार्यकर्ताओं या उनके समूह ने ऐसा कर अपनी निरंतर सक्रियता का प्रमाण देकर प्रबंधकों को प्रसन्न करने का प्रयास किया यह कहना कठिन है।  कम से कम हिन्दी भाषियों को प्रयोक्ता की तरह अपने रचना उत्पादों के लिये बाज़ार बनाने वालों को अब हिंग्लिश तथा हिन्दी भाषियों को अलग अलग दृष्टिकोण से देखने का विचार कर ही लेना चाहिये।  उन्हें अब अंग्रेजी रोमन लिपित अंतर्जालीय प्रारूपों में हिन्दी से लोकप्रिय या प्रचलित शब्द रोमन लिपि में लिखना चाहिये।  हिन्दी प्रारूपण का उपयोग केवल हम जैसे अंग्रेजी से अपरिचित लोग ही करते हैं।  उनको ऐसे होम या कंफर्म शब्द अटकते हुए पढ़ने पढ़ते हैं।  स्वर के साथ ही सोच भी तोतली हो जाती है। हिन्दी प्रारूपण एक बार बनाकर उससे मुंह ही फेर लें तो अच्छा है क्योंकि हम जैसे प्रयोक्ता उसी से खुश रहते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

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