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‘चक दे इंडिया’ नहीं ‘सच देख इंडिया’-व्यंग्य


बहुत दिनों से सुनते आ रहे हैं ‘चक दे इंडिया’। जब देखों कोई थोड़ी बहुत अच्छी खबर होती है गूंजने लगता है टीवी चैनलों पर ‘चक दे इंडिया’‘। एक काल्पनिक कहानी पर फिल्म बनी जिसमें भारतीय महिला हाकी टीम को विश्वविजेता बता कर पूरे देश को भरमाने की कोशिश की गयी। सच तो यह है कि पिछले 25 वर्षों में भारत किसी भी खेल में विश्व कप जीता नहीं था पर एक फिल्म में काल्पनिक रूप से मिली जीत को भी एक सच की तरह भुनाया गया। भ्रम पैदा कर लोगों की भावनाओं से जुड़े व्यवसाय में किस तरह कमाई हो सकती है ऐसा उदाहरण अन्य कहीं नहीं मिल सकता।

अनेक विज्ञापन वाले अपने माडल कों किसी काल्पनिक प्रतियोगिता में जितवाकर अपने द्वारा विज्ञापित वस्तु दिखाते हुए उससे गंवाने लगते हैं ‘चक दे इंडिया’। कोई ‘रीयल्टी शो’ होता है तो उसमें कई बार प्रतियोगी गाने लगते हैं तो कई बार उस शो की समप्ति पर विजेता के सम्मान में भी गाया जाता है ‘चक दे इंडिया’। धीरे धीरे लोग इसे भूलने लगे थे पर क्रिकेट के बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता जीतने पर तो जैसे प्रचार माध्यमों की उचट कर लग गयी। जिसे देखो वही बजाये जा रहा था। यहीं से उनको अवसर मिला। क्रिकेट में उसके बाद कोई भी छोटी मोटी जीत मिली तो यही गाना चैनलों पर सुनाई देता है। जब हार जाती है तो उसके लिये कोई मातमी धुन बजना चाहिए पर एसा कोई भी नहीं करता जबकि फिल्मों ने कई ऐसे मातमी गीत और संगीत के कार्यक्रम बना रखे हैं। जब टीम पिट जाती है उस समय अपने खिलाडि़यों को थोड़ा बहुत कोसकर अपने दायित्वों की इतिश्री कर लेते हैं।

काल्पनिक कहानियों से कुछ नहीं होता। फिल्म और उसके गीत क्षणिक रूप से आनंद प्रदान करते है, पर जीवन के लिये वह निरर्थक हैं। पहले लोग फिल्म देखकर भूल जाते थे और जो गाने जीवन के लिये थोड़ा बहुत अर्थ रखते थे तो उसे गुनागनाने लगते थे पर आज के प्रचार माध्यम तो उन गानों को भुनाने के लालायित रहते हैं। कई बार तो समाचार पत्र पत्रिकाएं अपने किसी सकारात्मक लेख या समाचार को प्रभावी बनाने के लिये लिख देते है ‘चक दे इंडिया’ ।

वैसे देखा जाये तो बजाय ‘चक दे इंडिया की जगह होना चाहिए ‘सच देख इंडिया‘। सच तो यह है कि इस लेखक को गीत नहीं लिखना आता वरना लिख देता ‘सच देख इंडिया’। अगर प्रयास भी किया तो तुक मिलाने के चक्कर में शब्द गड़बड़ा जायेंगे और अगर उनको ठीक रखने का प्रयास किया तो तुक नहीं बनेगी। चलिये इस पर एक गीतनुमा एक हास्य कविता लिखने का प्रयास करके देखते हैं।

सच देख इंडिया, सच देख इंडिया
ख्वाब देखा तो सच से मूंह फेर लिया
सच देख इंडिया
परदे पर देखा होगा, अपने लिये विश्व कप
पर कीर्तिमानों में देश को जीरो ने घेर लिया
सच देख इंडिया
हाकी में नहीं जा रही इंडिया की टीम
सच में कभी नहीं जमती, देश के जीत की थीम
सच देख इंडिया
दुनियां भर के खिलाड़ी दिखायेंगे बीजिंग में अपने जौहर
इंडिया में बैठकर देखेंगे, परायों को बीबी और शौहर
सच देख इंडिया
सास-बहु सीरियल में सुनकर धमाके दिल बहालाआगे
शहर में होने वाले असली धमाकों से कान नहीं बचा पाओगे
काल्पनिक कहानियां कितना भी डरायें
सच भयानक दृश्यों से ज्यादा डरावनी नहीं होती
उनमें कितना भी खूबसूरत अहसास हो
जिंदगी इतनी खुशनुमा भी नहीं होती
सच देख इंडिया
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हां, यह सच है कि यह गीत की तरह नहीं लिखा पर जब कड़वे सच हों तो शब्दों को बाहर आने देने से रोकना भी अच्छा नहीं लगता नहीं तो वह रुके हुए पानी की तरह अंदर ही अंदर गंदा होकर हृदय को खोखला कर देते हैं। कभी ‘ये है मेरा इंडिया’ तो कभी ‘मेड इन इंडिया’ तो कभी ‘चक दे इंडिया’ जैसे फिल्मी वाक्यों को जीवन में दोहराते रहने से सच नहीं बदल जायेगा। एक अजीब माहौल है। यहां दर्द है, संवेदना है और अभिव्यक्ति के साधन है पर फिर भी वह सब कुछ हो रहा है जिसे नहीं होना चाहिए। पहले कथा कहानियां सुनाकर इस देश को भ्रमित किया गया और फिल्म की काल्पनिक कहानियों से कुछ वाक्यांश लेकर उसमें देश के लोगों का दिल और दिमाग भटकाना एक व्यापार हो सकता है पर इससे पूरी कौम मानसिक रूप से कितनी कमजोर हो गयी है जो इंतजार करती है किसी घटना का ताकि उस संवेदना व्यक्त की जा सकें। आम आदमी का समझ में तो आ सकता है पर जिन लोगों खेल और समाज के संबंध में कुछ करने का दायित्व है उनकी नाकामी एक चिंता का विषय है। लोग अपनी तकलीफों के साथ जी रहे हैं उसे भुलाने के लिये वह इन काल्पनिक कहानियों में मन बहला रहे हैं पर समाज और राष्ट्र को आगे ले जाने वाला चिंतन और अध्ययन का भाव उनमें लुप्त होता जा रहा है। फिल्मी वाक्यांशों से इस देश की वास्तविकता नहीं बदल सकती। इसके लिये पहले ‘चक दे इंडिया’ की जगह कहना पड़ेगा ‘सच देख इंडिया’
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लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

अनाम और छद्मनामः कहीं अनुकूल तो कहीं प्रतिकूल-आलेख


अभी एक लेख समाप्त करते वक्त मेरे दिमाग में अपने ब्लाग पर आई टिप्पणियों को लेकर कुछ विचार थे। उस लेख में उसका व्यापक उल्लेख करना व्यर्थ था इसलिये अलग से यह आलेख लिख रहा हूं।

मैंने लिखा था कि प्रेम, मित्रता, स्नेह, और सद्भावना का कोई स्वरूप नहीं होता। कई बार तो ऐसा लगता है कि मेरे एक-दो मित्र ही है जो नाम बदल बदल कर टिप्पणी देते हैं। सोचते हैं कि एक ही नाम देखकर यह बोर न हो जाता हो। मैं इस सोच में रहा था कि क्या कोई महिला ब्लाग लेखिका भी जिसके मन में मेरे प्रति सद्भावना है जो नाम बदलकर मुझे प्रेरित करती है।
असल में हिंदी ब्लाग जगत की शूरूआत ही छद्म और अनाम ब्लाग लेखकों ने की होगी-ऐसा लगता है। कभी-कभी तो लगता है कि असली नाम तो बहुत कम होंगे उससे अधिक छद्म नाम होंगे।
मेरी स्थिति अन्य ब्लाग लेखकों से थोड़ी अलग है। कुछ ब्लाग लेखक छद्म नाम के लोगों की प्रतिकूल टिप्पणियों से परेशान हैं तो मैं अनुकूल टिप्पणियों को देखकर हैरान हो जाता हूं। कई बार ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो अपनी पोस्ट लेकर आते हैं और कहते हैं कि हम दो-तीन माह से ब्लाग जगत से दूर थे पर लगतार इसे देख रहे थे। अब लगातार लिखते रहेंगे। वगैरह..वगैरह। हिंदी ब्लाग सभी एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों पर मै निरंतर विचरण करता हूं। कई ब्लाग लेखक गायब हो जाते हैं। कई नये आते हैं।
कुछ ब्लाग लेखकों की शैली का अभ्यस्त हूं तो कई बार नये ब्लाग लेखकों से उनकी मिलती-जुलती शैली देखकर ऐसा लगता है कि कहीं वही पुराने वाले तो नहीं।

पिछले छह महीने में मेरा कुछ लोगों से संपर्क हुआ और उनसे आत्मीयता स्थापित हुई। उन्होंने कई नई जानकारियां दीं। कुछ उनसे सीखा। अचानक फिर कहां चले गये। कम से चार पांच ब्लाग लेखक तो मेरे ब्लाग पर इतनी प्रभावपूर्ण टिप्पणियां लिख गये कि मैंने अपने ब्लाग/पत्रिका पर पाठ ही लिख लिया। उनके ब्लाग फिर नहीं दिखे। कुछ आपत्तिजनक सामग्री वाले ब्लाग दिखे फिर वह गायब हो गये। ऐसे में यह संदेह/विश्वास होता है कि कुछ ऐसे ब्लाग लेखक हैं जिनके लिए लिखना एक तरह से व्यसन/आदत हो गयी है। अधिक लिखने से लेखक के ‘एक्सपोज‘ ( इसका हिंदी शब्द मुझे बासी ही समझ में आता है) होने का भय रहता है और लिखना भी जरूरी है शायद इसलिये कुछ नाम ब्लाग लेखक छद्म नाम से लिखते हैं। कुछ तो उस नाम से बकायदा निष्काम भाव से टिप्पणियां भी लिखते है। लड़ाई झगड़े और विवाद वाले पाठों पर ऐसे छद्म नाम वाले लेखकों का तो जमावड़ा ही हो जाता है। दो पक्ष में तो दो विपक्ष में दिखाई देते हैं।
मेरे मित्रों में ऐसे कितने ब्लाग लेखक हैं यह तो पता नहीं। हो सकता है यह मेरा भ्रम हो क्योंकि उनकी टिप्पणियों में जो स्नेह, प्रेम, और सद्भावना भरी होती है उसके अधिक स्वरूप नहीं होते। कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब मैं कुछ कड़ा या व्यंग्यात्मक पाठ लिख देता हूं और मुझे लगता है शायद इस पर अकेला पड़ जाऊंगा तब ऐसे मित्र टिप्पणियां रखते है यह बताने के लिऐ कि हमारी सहमति तुम्हारी साथ है। उनकी टिप्पणियों से एक संतोष मिलता है कि उस विषय पर अकेला नहीं हूं। बहरहाल अंतर्जाल पर अनाम, छद्मनाम और और वास्तविक नाम के लोग रहेंगे। उनकी भूमिका अपने अनुसार रहेगी। एक बात तय है कि केवल आलोचना ही छद्म नाम या अनाम होकर नहीं की जाती बल्कि प्रेम और स्नेह के लिये भी यही तरीका अपनाया गया है।

लेखक की स्मरण शक्ति मित्र भी होती है और शत्रु भी-चिंतन


होली का हल्ला थम चुका है। कोई नशे में मदहोश होकर तो कोई रंग खेलते हुए थककर सो रहा है तो कोई मस्ती में अभी भी झूम रहा है कि उसके खुश होने का कोटा पूरा हो जाये। सब इस दुनिया से बेखबर होना चाहते हैं मगर कुछ लोग फिर भी हैं जो चिन्त्तन करते हैं। आम आदमी की याददाश्त कमजोर होती है पर एक लेखक की स्मरण शक्ति ही उसकी मित्र होती है-कुछ मायनों में दुश्मन भी।

चेतावनियों के स्वर कानों में गूँज रहे हैं और आंखों के सामने अखबारों में छपे गर्मी के आसन्न संकट के शब्द घूम रहे हैं। इस होली पर पानी खूब उडाया गया होगा। इसमें किसी ने कोई हमदर्दी नहीं दिखाई। अब आरही है गर्मी। पहले से ही दस्तक दे चुकी है और उसका जो भयानक रूप सामने आने वाला है वह हर वर्ष हम देखते हैं। गर्मी में पानी की कमीं के हर जगह से समाचार आयेंगे। कहीं आन्दोलन होगा। लोगों के हृदय में उष्णता उत्पन्न होगी और उसका ध्यान बंटाने के लिए बहुत सारे अन्य अर्थहीन विषय उठाये जायेंगे।

कभी-कभी लगता है देश में कोई समस्या ही नहीं है केवल दिखावा है। लोग पानी को रोते हैं पर फैलाते भी खूब हैं। देश के शहरों में सबके पास मोबाइल दिखता है उस पर बातें करते हैं। कौन है जो देश की हालत पर रोता है। कहीं से किसानों की आत्महत्या की खबर आती है पर कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। सब कुछ सामान्य चलता दिख रहा है। लोग घुट-घुटकर जी रहे हैं पर बाहर से दिखता है कि सामान्य हैं। लोग चीख रहे हैं पर कोई किसी की नहीं सुन रहा है। किसी से ज्ञान चर्चा करना निरर्थक लगता है क्योंकि वह अगले ही पर अपने अज्ञान का परिचय देता है।

वैचारिक रूप से दायरों में सिमट गए लोगों से अब बात करना मुश्किल लगता है। जिसके पास जाओ वह या तो अपने घर की परेशानी बताता है या वह उसकी किसी भौतिक उपलब्धि का बयान करता है। में खामोश होकर सुनता हूँ। मुझे अपने घर-परिवार के जो काम करने हैं उनको करता हूँ। जो चीजें लाना होता है लाता हूँ पर उनका बखान नहीं करता।
”सुनो कल मैं मेले गया था वहाँ से नया फ्रिज ले आया।”
”मैंने अपने बेटे को गाडी दिलवा दी।”
”मैंने अपनी बेटी को मोबाइल दिलाया है।”
सब सुनता हूँ। फिर करते हैं देशकाल और राजनीति की बातें-जैसे कि बहुत बडे ज्ञाता हों। जब बताओ कि किस तरह सब जगह तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार उनकी बुद्धि को संचालित किया जा रहा है। समाचार उनको इस तरह दिए जा रहे हैं कि देश, समाज और लोगों की यथास्थिति बनी रहे और वह उसमें बदलाव की नहीं सोचें। बदलाव की बात कोई सोच कर वह कई लोगों के लिए परेशानी पैदा करेंगे। व्यवस्था में सुधार की बातें पर बहुत की जातीं हैं पर बदलाव की नहीं। तमाम तरह के वादे और नारे गढे गए और भी गढे जायेंगे।

कभी-कभी उकता जाता हूँ, फिर सोचता हूँ कि सब मेरी तरह नहीं हो सकते। अपने जैसे लोगों का संपर्क ढूँढता हूँ और जब वह मिलते हैं तो लगता है कि वह भी इस दुनिया से क्षुब्ध हैं पर बदलाव की बात पर वह भी उदास हो जाते हैं उनको नहीं लगता कि वह उसे बदल सकते हैं और खुद को भी बदलने पर अपने साथ जुडे लोगों के विद्रोह का भय उन्हें सताता है-जिसे मोह भी कह सकते हैं।

कहीं एकांत मंदिर में जाकर बैठता हूँ और ध्यान लगाता हूँ। श्रीगीता में श्री कृष्ण जी के यह शब्द ”गुण ही गुण को बरतते हैं” मुझे याद आते है। मेरे अधरों पर मुस्कराहट खेल जाती है। मन प्रसन्न हो जाता है। भला मैं दूसरों से क्या अपेक्षा करूं। दूसरे के अन्दर गुणों का मैं नियंत्रणकर्ता नहीं हो सकता। जो गुण उसमें है नहीं और वह पैदा भी नहीं कर सकता उससे भला मैं क्यों कोइ अपेक्षा करूं। मैं निर्लिप्त भाव को प्राप्त होता हूँ। यह दुनिया मेरी नहीं है बल्कि मैं इसमें हूँ। वह चलती रहेगी उसके साथ मुझे चलना है और उसे दृष्टा बनकर चलते देखना है। लोगों को अपने मन ,बुद्धि और अहंकार के वश में पडा देख कर उनका अभिनय देखना है। धीरे-धीरे मन की व्यग्रता ख़त्म हो जाती है।

पहले वह सुधरे


पहले कौन सुधरे? यहाँ हर कोई एक दूसरे से सुधर जाने की उम्मीद करता है पर कोई स्वयं सुधरना नहीं चाहता। सामने वाला सुधर जाये तो हम भी सुधर जाएं यही शर्त हर कोई लगाता है। बरसों से अनेक प्रकार से विश्व में सुधार वादी आन्दोलन चलते रहे हैं पर कोई सुधार कहीं परिलक्षित नहीं हो रहा है। लोगों को सुधारने के लिए अनेक पुस्तकें लिखीं गयीं हैं और वह इतनी बृहद रचनाएं हैं कि उन्हें कोई पढ़ना ही नहीं चाहता और इसलिए जो इनको पढ़ते हैं वह विद्वान् बन जाते हैं लोगों का मार्गदर्शन करते हुए वाह-वाही लूटते हैं। अपने हिसाब से उसकी व्याख्या कर लोगों को बताते हैं और लोग उनकी बात सुनकर खुश हो जाते हैं और मान लेते हैं कि उसमें यही लिखा होगा। ऐसी हालत में लोगों का सुधारने और मार्ग दर्शन का ठेका लेने वालों की हमेशा चांदी रही है। दिन-ब-दिन लोगों में नैतिक,वैचारिक और सामाजिक आचरण में गिरावट आयी है उसे देखकर यह कहा जा सकता है कि बिगाड़ अधिक आ रहा है।
ग्राहक कहता है कि व्यापारी सुधर जाये और अच्छी चीज दे और दाम भी सही बताये। व्यापारी कहता है कि ग्राहक सुधर जाये। जनता कहती है कि हमारे नेता सुधर जाये, और नेता कहते हैं कि लोग अपने आप में सुधार लायें क्योंकि वही तो सबको चुनती है और सही चुनाव करे तो हमें भी ऐसे लोग मिलेंगे तो हम सही काम करेंगे। गुरु कहे चेला सुधरे तो सही शिक्षा दें सकें और चेले कहते हैं कि गुरु अगर सही शिक्षा दे तो हम भटके ही क्यों?
पाकिस्तान की जनता कहे मुशर्रफ जाएं तो शांति हो और मुशर्रफ कहते हैं कि शांति हो मुझे जिन्दगी की गारंटी हो जाये तो में चला जाऊंगा। इराक़ में लोग कहें अमेरिका की सेना हमारे यहाँ से चली जाये तो हम खामोश हो जायेंगे और अमेरिका कहता हैकि पहले लोग खामोश हो जाएं तो हम अपनी सेना वहां से हटा लें। मतलब सुधार का कहीं से छोर पकड़ सकते हो पर उसे अपने हाथ में अधिक देर नहीं रख सकते। महात्मा गांधी ने कहा अहिंसक आन्दोलन के जरिये सब किले फतह कर सकते हैं पर जिनके हाथ में बंदूकें हैं वह कहते हैं है कि पहले किला फतह कर लें तो अहिंसक हो जायेंगे। अब भला किस्में साहस है कि उन्हें समझाए कि यही तो वक्त है गांधी जी के मार्ग का अनुसरण करने का। ऐसा इसलिए सब जगह हो रहा है कि लोग अपने धर्म ग्रंथों को नहीं पढ़ते और उनके पढे हुए तथाकथित विद्वानों की बात को सच मानते हैं। लोग कहते हैं कि टाइम नहीं है। वैसे टीवी देखने, अखबार पढ़ने और परनिंदा करने में लोग कितना समय नष्ट करते हैं पर धर्म ग्रंथों की बात करो तो कहेंगे उसमे क्या है पढ़ने को? वह तो बुढापे में पढेंगे। वह स्वयं नहीं पढ़ते तो बच्चों की रूचि भी नहीं होती। नतीजा सामने है। लोग बातें तो संस्कारों कें करते हैं पर वह कहाँ से आयें यह कोई नहीं बताता।
कोई कहता है कि ‘संस्कारवान बहू चाहिए’ तो कोई कहता है कि हमें ‘संस्कारवान दामाद चाहिए’। पहली तो यह बात कि संस्कार का क्या मतलब है? यह कोई स्पष्ट नहीं करता। दूसरे उनसे पूछों कि क्या तुमने अपने घर परिवार में संस्कार स्थापित करने का क्या प्रयास किया है?
लोग अपनी सफाई में कुछ कहते रहें पर यह वास्तविकता यह है कि लोग अपने घर में इंजीनियर, डाक्टर, और अफसर बनाने के कारखाने तो लगाना चाहते हैं पर कोई ‘संस्कारवान’ बनाने का प्रयास नहीं करते। सब एक दूसरे से यह आशा करते हैं कि वह सुधर जाये। ससुराल वाले कहें बहू और दामाद सुधर जाएं और वह कहें ससुराल वाले सुधर जाएं। पति कहे पत्नी सुधर कर सब सहती जाये और पत्नी कहे पति अपने आप में सुधार लाये और मूहं बंद और कान खोलकर हमारी पूरी बात सुनता जाये।
सुधार का कोई सिरा पकडो तो लोग शिकायतों का पुलिंदा थमा देते है, जिन्हें देखकर दिमाग चकरा जाये और सच्चे सुधारक तो अपने कान पकड़ लेते हैं शायद इसलिए सुधार लाना अब एक पेशा हो गया है। समाज में सुधार लाने के लिए तमाम लोग अपनी दूकान खोले बैठे हैं। नतीजा यह है कि कहीं भी बातें खूब होती हैं पर सुधार कहीं दिखाई नहीं देता।