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मन का सहारा ढूंढने जाते हैं लोग सांईं के पास-हिन्दी लेख


                 अभी हाल ही में एक धर्मगुरु ने शिरडी के सांई बाबा के भगवान न होने का घोषणा कर डाली जिस पर हमारे देश के व्यवसायिक प्रचार माध्यम बहस चलाकर अपना विज्ञापन का समय पास कर रहे हैं। यह बहस पुरानी है पर जब कोई विषय न हो तो हमारे देश के प्रचार माध्यम धर्म के पुराने विषयों को नये ढंग से प्रचारित करते हैं। यह बुरा भी नहीं है।  सांई बाबा को भगवान मानने वाले लोगों की कमी इस देश में नहीं है। कोई कहता है कि उनके बीस करोड़ भक्त हैं।  हम यहां भक्तों की संख्या से थोड़ा अचंभित है। दरअसल सांई बाबा के दरबार में हमारे यहां प्रचलित भगवान के विभिन्न स्वरूपों के भजन भी चलते है जिनके आकर्षण में भी लोग जाते हैं।  उनकी दरबार में जाने वाले सभी लोग उनके भक्त हों यह जरूरी नहीं हैं क्योंकि हमारे यहां अनेक लोग पर्यटन की वजह से भी मंदिरों में जाते हैं।  हमारा अनुभव तो यह भी कहता है कि अनेक  लोग अपने शहर के मंदिरों में नहीं जाते पर प्रसिद्ध मंदिरो पर अपनी आस्था जताने में गौरव अनुभव करते है।

                 अनेंक लोग  सांई बाबा के ंमंदिर में जाते हैं मगर वही वृंदावन के बांकेबिहारी, हरिद्वार में हर की पौड़ी, उज्जैन में महाकाल तथा  जम्मू की वैष्णोदेवी में भी जाते है। इसके बावजूद उन पर किसी एक स्वरूप के भक्त होने की छाप नहीं बनाई जा सकती।  भक्ति में भटकाव का आरोप भी नहीं लगाया जा सकता।  इनमें से अनेक यह भी मानते हैं कि सर्वशक्तिमान की निराकार, निष्काम तथा निर्मल भाव से भक्ति करने पर मन, बुद्धि और विचार शुद्ध होने से सांसरिक कार्य स्वतः ही सिद्ध होते है।  यह लोग किसी पर अपनी भक्ति में पाखंड का आरोप लगाना पसंद नहीं करते। निराकार के उपासक होने के बावजूद साकार रूप की आराधना अतार्किक नहीं मानी जा सकती।

                 भारत में लोगों के अंदर अध्यात्मिक विषय के प्रति रुझान स्वाभाविक रूप से रहता है।  सांसरिक विषय तथा उनसे जुड़े कार्य  स्वतः चलते हैं पर किसी को अगर सर्वशक्तिमान के एक स्वरूप की आराधना से लाभ हो जाये तो वह उसका दीवाना हो जाता है। इसका लाभ पेशेवर धार्मिक ठेकेदार उठाते हुए भगवान और भक्त के बीच में गुरु यानि मध्यस्थ बनकर अपनी उपस्थिति जताते है।

                 जैसे जैसे इस देश में परिवहन के आधुनिक वाहन की संख्या बढ़ रही है वैसे वैसे लोगों के अंदर पर्यटन की प्रवृत्ति की बढ़ी है।  अब तो सामान्य तथा धार्मिक पर्यटन स्थानों में अंतर ही नहीं रहा है।  इसके चलते बाज़ार के सौदागरों तथा उनके प्रचार प्रबंधकों ने लोगों की रुचि बनाये रखने के लिये नये नये प्रयोग किये है। इन्हीं प्रयोंगों की देन है जम्मू का वैष्णों मंदिर तथा संाई बाबा में मंदिरों की प्रसिद्धि।  आशा फिल्म में ‘माता ने बुलाया है’ तो अमर अकबर एंथोनी में सांई बाबा पर दिखाये गये गाने से इन दोनों मंदिरों को जो प्रसिद्ध मिली वह अलग से शोध का विषय है पर सच बात तो यह है कि इन दोनों मंदिरों के बारे में यह लेखक इससे पूर्व नहीं जानता था।  भले ही इन फिल्मों के गानों का उद्देश्य न रहा हो कि मंदिर प्रसिद्ध किये जायें पर इतना तय है कि उसके बाद इन स्थानों पर भीड़ बढ़ी।  इसका कारण यह है कि साकार भक्ति उपासकों के नये रूप के प्रति रुझान अधिक रहता है।  हमारे यहां मथुरा, उज्जैन, हरिद्वार, तिरुपति बालाजी, इलाहाबद, बनारस तथा  अनेंक प्रसिद्ध स्थान पौराणिक महत्व के हैं।  नयें स्थानों की प्रसिद्ध के बावजूद वहां भक्तों की भीड़ में कोई कमी नहीं आयी।  वैष्णो माता चूंकि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का ही भाग है इसलिये कोई उन पर आपत्ति नहीं करता पर सांई बाबा को लेकर कुछ धार्मिक गुरु अत्यंत परेशान रहते हैं।

                 सांई बाबा की पहचान अध्यात्मिक ज्ञान के प्रतीक के  रूप में नहीं वरन् सांसरिक विषयों में चमत्कारिक उपलब्धि दिलाने के रूप में बनाई गयी है। श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों को समझें तो अर्थार्थी और आर्ती भक्तों का जमावड़ा अधिक हो सकता है।  कुछ मात्रा में जिज्ञासु भी हो सकते हैं पर ज्ञानियों के लिये उनके स्वरूप में चिंत्तन के लिये कुछ नहीं है पर फिर भी इसका अर्थ कदापि नहीं है कि उनके भक्तों की भावना को ठेस पहुंचायी जाये। गीता ज्ञान की दृष्टि से चारों प्रकार के भक्तों की उपस्थिति को सहजता से स्वीकार करना चाहिये।

                 इतना जरूर देखा जा रहा है कि भारतीय धार्मिक कर्मकांडियों ने पेशेवराना ढंग से उनके नाम का उपयोग करने में सिद्धि प्राप्त कर ली है।  कभी भी सांई बाबा के मंदिर के बाहर नये वाहनों की पूजा होते देखी जा सकती है और सांई बाबा के सेवक लोहे लंगर से बने और बाद में कबाड़ हो जाने वाले सामान की उपयोगिता बढ़ाने क्रे लिये जंतर मंतर करते देखे जा सकते है।  संाई बाबा के मंदिरों की लोकप्रियता बढ़ने का एक कारण यह भी है कि हमारे परंपरागत मंदिरों में रूढता की प्रवृत्ति ने अनेक लोगों को विरक्त कर दिया है।  हम अनेक बार सुनते हैं कि अनेक मंदिरों में ऊंची जाति के लोगों को ही प्रवेश मिल पाता है।  भगवान शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु जैसे आकर्षक तथा व्यापक स्वरूपों पर हमारा दृष्टिकोण संकीर्ण होता गया है।

                 जहां तक भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का विषय है उसका चमत्कारों से कोई संबंध नहीं है।  सांसरिक विषयों में किसी को कम तथा किसी को अधिक सफलता मिलती है।  अब यह भाग्य या कर्मफल के कारण हो सकता है पर जिनको मिल गया वह उसे चमत्कार मानता है तो जिसे नहीं मिला वह चमत्कार की आशा में इधर उधर फिरता है। समय आने पर सभी के काम सिद्ध होते हैं पर जब तक न हो आदमी का मन उसे भटकाता है।  अध्यात्मिक ज्ञानियों के लिये सांईबाबा की भक्ति का समाज में बढ़ता प्रचार चिंता का विषय नहीं हो सकता।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

 

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

 

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