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नया साल और नशा-हिन्दी व्यंग्य कविताये(naya sal aur nasha-hindi satire poem


शराब पीते नहीं

मांस खाना आया नहीं

वह अंग्रेजी नये वर्ष का

स्वागत कहां कर पाते हैं।

भारतीय नव संवत् के

आगमन पर पकवान खाकर

प्रसन्न मन होता है

मजेदार मौसम का

आनंद भी उठाते हैं।

कहें दीपक बापू विकास के मद में,

पैसे के बड़े कद में,

ताकत के ऊंचे पद मे

जिनकी आंखें मायावी प्रवाह से

 बहक जाती हैं,

सुबह उगता सूरज

देखते से होते वंचित

रात के अंधेरे को खाती

कृत्रिम रौशनी उनको बहुत भाती है,

प्राचीन पर्वों से

जिनका मन अभी भरा नहीं है,

मस्तिष्क में स्वदेशी का

सपना अभी मरा नहीं है,

अंग्रेजी के नशे से

वही बचकर खड़े रह पाते हैं।

———————

चालाक और क्रूर इंसान के लिये

पूरा ज़माने के

सभी लोग खिलौना है।

कभी खून बहाते

दिल से उसमें नहाते

इंसानियत का प्रश्न

उनके सामने बौना है।

कहें दीपक बापू हथियारों पर

चलती है जिनकी जिंदगी

दया का अर्थ नहीं जानते,

खून और पानी में

अंतर नहीं मानते,

मिलाकर हाथ उनसे

अपना सुकून खोना है।

————————–

—-

 

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सम्मान की चाहत समाज सेवक-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


अपना खून सभी को

प्यारा है

पराया पानी लगता है।

दूसरे के दर्द पर

झूठे आंसु बहाते

या हास्य रस बरसाते

अपने दिल पर लगे भाव जैसा

 नहीं सानी लगता है।

कहें दीपक बापू औपचारिकता से

निभाते हैं लोग संबंध,

नहीं रहती आत्मीयता की सुगंध

भावनाओं की आड़ में

हर कहीं शब्दों का

दानी ही सभी को ठगता है।

———————–

सम्मान पाने के मोह में

संत कवि और समाज सेवक का

वेश लोग बना लेते हैं।

एक से काम बन जाये

दूसरा भी आजमाते

कमजोर दिमाग के होते

मजबूत दिखने के लिये

सिर और मुख पर

केश भी तना लेते हैं।

कहे दीपक बापू प्रचार पाने के लिये

कोई चुटकुले सुनाता,

कोई शायरी गुनगनाता,

पर्दे पर जमे रहने के लिये

हर कोई नया रास्ता बनाता है,

जनहित से वास्ता जताता है,

जरूरत पड़े तो

अपना इलाका देश भी बना लेते हैं।

———————-

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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चालाक लोगों का शब्दकोष-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


गज़ब हैं वह लोग

चेहरे पर जिनके रहती हंसी

हृदय में घात छिपाते हैं।

स्वार्थ के लिये

पहले हाथ जोड़ते

फिर लात दिखाते हैं।

कहें दीपक बापू भाव भंगिमा

करे देती हैं हमें मंत्रमुग्ध

चालाक लोगों पर

जिनके शब्द कोष में

सहानुभूति के अर्थ नहीं होते,

दर्द हरने का करते व्यापार

दवा की नदी में

पैसे से  हाथ धोते,

अपरे चरित्र लगे खून के छींटों पर

चर्चा करो तो

विरोधी की मात दिखाते हैं।

——————-

एक उड़ते हुए पत्थर से

फूटता सिर किसी का

पूरे शहर में

दंगल शुरु हो जाता है।

शांति के  शत्रु

मौन से रहते बेचैन

जलते घर और कराहते लोग

सपनों में देखना उनको पसंद है

जब उड़ाते हैं नींद ज़माने की

करते अपना हृदय तृप्त

शहर में अमंगल गुरु हो जाता है।

कहें दीपक बापू मनुष्य देह में

पशु भी जन्म लेते हैं

रक्त की धारा बहाने पर रहते आमादा

जब लग जाता दांव उनका

चहकता शहर भी

जगल हो जाता है।

——————-

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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छद्म नायकों का खेल-हिन्दी कविता


स्वयं पर नहीं आती हंसी जिनको

दूसरों को चिढाकर

परम आंनद पाते  हैं।

स्वयं घर से निकलते

पहनकर धवल कपड़े

दूसरे पर कीचड़ उछालकर

  रुदन मचाते हैं।

जिन्होंने अपना पूरा जीवन

पेशेवर हमदर्द बनकर बिताया

ज़माने के जख्म पर

नारों का नमक वही छिड़क जाते हैं।

बंद सुविधायुक्त कमरों में

विलासिता के साथ गुजारते

 रात के अंधेरे

दिन में चौराहे पर  आकर

वही समाज सुधार के लिये

हल्ला मचाते हैं।

कहें दीपक बापू बचना

ऐसे कागजी नायकों से

नाव डुबाने की कोशिश से पहले

उसे दिखावे के लिये बचाते हैं।

—————–

एक उड़ते हुए पत्थर से

फूटता सिर किसी का

पूरे शहर में

दंगल शुरु हो जाता है।

शांति के  शत्रु

मौन से रहते बेचैन

जलते घर और कराहते लोग

सपनों में देखना उनको पसंद है

जब उड़ाते हैं नींद ज़माने की

करते अपना हृदय तृप्त

शहर में अमंगल गुरु हो जाता है।

कहें दीपक बापू मनुष्य देह में

पशु भी जन्म लेते हैं

रक्त की धारा बहाने पर रहते आमादा

जब लग जाता दांव उनका

चहकता शहर भी

जगल हो जाता है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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दिखते गंभीर करते दिखावा-हिन्दी व्यंग्य कविता


अपने मुख से

बड़े बड़े शब्द बोलने वाले

हर कदम पर मिलते हैं वीर।

अपने आसन से उठते तो

पांव कांपते हैं,

इशारे के लिये उठाते हाथ

उनके फेफड़े कांपते हैं,

बोलते तो चीखते लगते

भाषा में नहीं होते

उनके तरकश में व्याकरण के तीर।

कहें दीपक बापू आधुनिक रथो पर

सवार है हजारों समाज सेवक

त्याग के दावे करते,

गरीब को  न मिल जाये

पूरी रोटी

इस ख्याल से भी डरते,

हंसते हैं मन ही मन

दूसरे को दर्द पर

बाहर दिखावा करते जैसे हों गंभीर।

———————

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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काला और गोरा धन-हिन्दी कविता


 धन ने भी कर लिये

अपने दो रूप

काला और सफेद।

पीछे दौड़े हर इंसान

गले लगाता सभी को

राक्षस और देवता का

करता नहीं कभी भेद।

बन गया जो सेठ

कर लेता सभी को मुट्ठी में

नहीं देखता ज़माना

उसके चरित्र में छेद।

कहें दीपक बापू भगवान नाम का

स्मरण बहुत बड़ी कमाई

मानी जाती है,

भक्ति की कीमत भी

धन से ही जानी जाती है,

कोई सफेद कागज पर

काले अक्षर लिखकर कमाता,

कोई सफेद अक्षर पर पर

कालिख पोतकर अपन काम जमाता,

सभी सिक्कों की बरसात के

इंतजार में खड़े हैं,

भर जाये झोली

इसी चाह में अडे हैं,

सुमार्ग से आता नहीं

कुमार्ग से आये धन पर

किसी को नहीं खेद है।

——————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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धन तेेेेरस पर मन का रस बनायें-हिन्दी चिंत्तन लेख


            आज पूरे देश में धनतेरस का पर्व मनाया जा रहा है। भारतीय धर्मों को मानने वाले लोग आज के दिन  दीपावली की पूजा के लिये सामान आदि खरीदते हैं।  इस दिन बाज़ार में भीड़ रहती है तो यह भी सच है कि स्टील, पीतल, सोने तथा अन्य धातुओं से निर्मित सामान भी अन्य दिनों की अपेक्षा अत्यंत महंगे हो जाते है। यही  कारण  है कि वर्ष के किसी भी दिन की अपेक्षा धनतेरस के दिन सामान्य व्यापार में सर्वाधिक आय वाला दिन होता है।  खेरिज व्यापार में सामान्य दिनों की अपेक्षा चार से दस गुना का विक्रय होता है। यह अलग बात है कि दिपावली गुजरते हुए तत्काल मंदी भी आ जाती है।

            समय के साथ महंगाई बढ़ी तो धीमे धीमे धनतेरस के दिन खरीददारी एक औपचारिकता बन कर रह गयी है।  अर्थशास्त्र की दृष्टि से भारत में धन का असमान वितरण एक बहुत भारी समस्या है, यह हमने आज से तीस बरस पहले पढ़ा था।  अर्थशास्त्र के विद्यार्थी को समाज का भी ज्ञान रखना चाहिये और इस आधार पर हम कह सकते हैं कि भले ही हम शहरी क्षेत्रों में धनी लोगों की संख्या बढ़ने का दृश्य देखकर प्रसन्न हों पर सच यह है कि उसके अनुपात में अल्प धनियों की संख्या बढ़ी है।  जहां धातुओं के बड़े सामानों को खरीदने वाले दिखते हैं वहां उनका दाम पूछकर उनसे मुंह फेरने वालों की संख्या ज्यादा होती है। अनेक लोग तो स्टील की टंकी का दाम पूछकर एक चम्मच खरीद कर ही धनतेरस मना लेते हैं। जहां कथित आर्थिक विकास ने अनेक ऐसे लोगों को धनवान बना दिया कि जिनके पास स्टील की कटोरी खरीदने की ताकत नहीं थी अपनी वर्तमान भारी भरकम आये के सामने सोने का कड़ा भी सस्ता लगता है तो वहीं अनेक लोग जो मध्यम वर्ग के थे अब स्वयं को निम्न वर्ग का अनुभव करने लगे हैं। जिनके लिये धनतेरस का दिन औपचारिकता से ही बीतता है।

            इस तरह की चर्चा राजसी विषय है मगर हम  सात्विक दृष्टि से विचार करें तो  इस संसार में सहज जीवन के लिये हृदय में प्रसन्नता होना ही सच्चा सुख है।  धन कितना है, यह महत्वपूर्ण नहीं है हम उसका उपयोग कितना करते हैं यह बात विचारणीय है।  तिजोरियों में पड़ा या बैंक खातों में दर्ज धन मन को प्रसन्न कर सकता है पर उसका उपयोग न करने से वह एक कूड़े के समान है।  दूसरी बात यह कि धन अपने उपयोग के लिये खर्च करने से क्षणिक आनंद मिलता है पर जरूरतमंद की सहायता निष्काम भाव से करने से हृदय में जो उच्च भाव आता है उसका कोई मोल नहीं है।  दूसरी बात यह कि कि धन और पानी एक समान है।  रुके रहे तो सड़ जाते हैं या फिर निकलने का मार्ग बनाते हैं।  धन आता है तो उसके जाने का मार्ग भी बनाते रहना चाहिये वरना वह सड़े हुए पानी की तरह स्वयं के लिये भी कष्टदायक हो जाता है। इंसान जब स्वेच्छा से धन नहीं निकालता तो प्रकृतिक कारण उसे इसके लिये विवश करते हैं कि वह अपनी जेब खोले।

            अपने धन का उपयोग का स्वयं की आवश्यकताओं के लिये सभी करते हैं पर जो दूसरे की आवश्यकता पर उसे देते हैं वह दान या सहायता कहलाता है।  जिन लोगों को धनतेरस के दिन कमाई होती है वह स्वयं के लिये कोई खरीददारी नहीं कर पाते।  मिट्टी के दीपक, फटाखे तथा पूजा का सामान बेचने के लिये फेरी लगाने वाले तो इस प्रयास में रहते हैं कि सामान्य दिनों की अपेंक्षा उनको अधिक मजदूरी मिल जाये तो शायद अपनी अतिरिक्त आवश्यकतायें पूरी हों जायें।  उनकी अपेक्षायें कितनी पूरी होती हैं यह अलग बात है पर निजी क्षेत्र में मजदूरी करने वालों के लिये भी दीपावली का पर्व आशा लेकर आता है।  इस तरह धनतेरस और दीपावली सभी वर्गों के लिये खरीद और बेचने का अवसर समान रूप से ले आता है।

            इस समय मौसम समशीतोष्ण हो जाता है जिससे शीतल हवायें बहते हुए देह और हृदय को प्रसन्न करती हैं। यही तत्व दीपावली को अधिक आनंददायक बना देता है।  हम अपने सभी मित्र ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकों हार्दिक बधाई। जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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हिन्दी दिवस सप्ताह और पखवाड़ा-हिन्दी चिंत्तन लेख


            14 सितम्बर हिन्दी दिवस के बाद सरकारी विभागों में हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी सप्ताह प्रारंभ हो जाता है।  यह अलग बात है उस दौरान औपचारिक कार्यक्रम समाचारों में हिन्दी दिवस की अपेक्षा अधिक स्थान नहीं पाते। इस दौरान वाद विवाद प्रतियोगिताओं, सम्मेलनों और सम्मान कार्यक्रमों में वही पुरानी बात दोहराई जाती हैं।  अगर हम हिन्दी के व्यवसायिक बाज़ार को देखें तो उसके पास एक बहुत विशाल जनसमूह है।  वह अपने लिये कमाई के लिये हर क्षेत्र में अपने हिसाब से भाषाई विकास के लिये रणनीति बना सकता है पर उसमें आत्मविश्वास की कमी है।  टीवी चैनल के समाचार, धारावाहिक, फिल्म की पटकथायें और समाचार पत्र पत्रिकाओं की विषय सामग्री में प्रबंधकों की भाषा के प्रति कुंठा ही नहीं वरन् उससे जड़ आमजन समूह के प्रति भारी अविश्वास दिखाई देता है।  यह अविश्वास और विचार हीनता आमजन समूह की मूढ़ता की वजह से नहीं वरन् प्रबंधकों और कार्यकर्ताओं में अपने ही उनके अंदर अपने कर्म से प्रतिबद्धता के अभाव  से ही उपजी होती है।

            हिन्दी पर वही पेशेवर विद्वान इन बहसों में भाग लेने आते हैं जिन्होंने हिंग्लििश या हिंग्रेजी के सहारे प्रतिष्ठा के आकाश को छुआ होता है और उनकी रचनायें मनोंरजन या कथित रूप से सामाजिक चेतना के विषय से जुड़ी होती है। प्रगतिशील, जनवादी तथा अन्य विचाराधाराओं के विद्वानों ने प्रचार जगत तथा उसके संगठनों पर अधिकार कर रखा है इसलिये मौलिक, स्वतंत्र तथा जातीय, धार्मिक, राजनीतिक तथा कला के समूहें से पृथक लेखकों के लिये कहीं कोई स्थान नहीं है।  अब अंतर्जाल ने यह सुविधा दी है तो उसे सामाजिक माध्यम कहकर सीमित किया जा रहा है।  पूंजी, प्रतिष्ठा और प्रचार के शिखर संगठनों के महापुरुष निरंतर यह संदेश देते हैं कि यह सामाजिक प्रचार माध्यम भी उनकी कृपा से ही चल रहा है।  प्रचार माध्यम शिखर पुरुषों के ब्लॉग, ट्विटर और फेसबुक की चर्चा कर आमजन को यह संदेश तो देते हैं कि वह सामाजिक माध्यम को महत्व प्रदान कर रहे हैं पर साथ ही यह भी बता देते हैं कि हर विचारक की औकात उसकी भौतिक शक्ति के अनुसार ही आंकी जायेगी।

            हम जैसे सात वर्ष से अंतर्जाल पर सक्रिय हिन्दी लेखक अगर स्वांत सुखाय न हों तो लिखना ही बंद कर दें। हमारा स्तर अभी तक एक अंतर्जाल प्रयोक्ता से आगे नहीं बढ़ पाया।  दो तीन वर्ष तक हमें निराशा लगी पर जब हमने अध्ययन किया तो पता लगा कि भाषा, जाति, धर्म, अर्थ और समाज सेवा में कामनाओं के साथ राजसी प्रवृत्ति के पुरुषों से अपेक्षा करना व्यर्थ है क्योंकि उनके लक्ष्य कभी पूरे नहीं होते इसलिये हमें प्रतिष्ठित करने का समय उन्हें मिल ही नहीं सकता।  हमने हिन्दी भाषा में अंग्रेजी शब्दों के मिश्रण के प्रतिकूल एक लेख यहां लिखा था।  उस पर ढेर सारी प्रतिक्रिंयायें आयीं। उनमें विरोध तथा समर्थन दोनों ही शामिल था।  इस तरह के मिश्रण के अभियान प्रारंभ होने की जानकारी हमें अंतर्जाल पर ही मिली थी तब ऐसा लगा कि शायद यह एक भ्रम हो पर जल्द ही वह सच सामने आने लगा।  भाषाई रणनीतिकार हिन्दी को रोजगारोन्मुख बनाने के लिये उस राह पर चल पड़े थे जिसकी कल्पना करना हमारे लिये कठिन था।  कहने को यह भाषा के साथ उनकी प्रतिबद्धता थी पर सच उनकी अपनी रचनाओं के सहारे प्रतिष्ठा बनाये रखने के विश्वास का अभाव का प्रमाण था।

            विचारधाराओं से जुड़े ऐसे आकाशीय विद्वान अपनी बात जनमानस में कहने के लिये उतावले रहते हैं। उन्हें अपनी रचना पर तत्काल प्रतिक्रिया चाहिये क्योंकि उससे ही उनकी भौतिक उपलब्धि होती है।  समाज के पढ़े लिखे तबके से ही उनके सरोकार रह गये हैं। उन्हें अल्पशिक्षित, मनोरंजन प्रिय तथा  अध्यात्मिक वृत्ति के लोगों पर प्रभाव डालने का प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह उनके प्रतिबद्ध पाठकों से ही संदेश ग्रहण करता है। इसलिये उन्होंने अपने इसी संदेशवाहक तबको संबोधित करते रहने के लिये शब्द योजना बनाई।        हमारे यहां विचाराधाराओं से जुड़े अधिकतर लोग अध्यात्म विषय पर लिखना बेगार मानते हैं क्योंकि यह काम तो उन्होंने पेशेवर धार्मिक विद्वानों की सौंप दिया है।  यही कारण है कि आधुनिक हिन्दी लेखक भारतीय जनमानस की अध्यात्मिक सोच से परे होकर अपनी रचना करते हैं। भारतीय जनमानस में अध्यात्मिक दर्शन कूट कूट कर भरा है इसलिये वह इन लेखकों की रचनाओं को एक सीमा तक ही स्वीकार करता है।  अगर वह मनोरंजक हुई्रं तो लोकप्रियता पाती हैं पर लेखक की छवि कभी अध्यात्मिक नहीं बनती। यही कारण है कि अनेक हिन्दी भाषी लेखक प्रचार के शिखर पर दिखते हैं पर भारतीय जनमानस में उनके लिये वैसा स्थान नहीं है जैसा कि पुराने कवियों और लेखकों का रहा है।

            ऐसे ही लेखक अपनी श्रेष्ठता अपनी भौतिक उपलब्धियों के आधार पर प्रमाणित करने हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह या हिन्दी पखवाड़ा केे मंचों का उपयोग करने को लालायित रहते हैं।  यह बुरा नहीं है पर हिन्दी भाषा पर नियंत्रण करने का भाव उनकी आत्ममुग्धता को ही दर्शाती है। जहां तक भाषा का प्रश्न है वह समाज की विचार धारा तय करती है। हमारी मान्यता है कि शुद्ध हिन्दी का उपयोग ही हमारी रचनाओं की शक्ति है। व्यवसायिक क्षेत्र कभी हिन्दी का मार्ग तय नहीं कर सकता। जो लोग यह सोच रहे हैं कि वह हिन्दी के भाग्यविधाता हैं उन्हें यह भ्रम नहीं रखना चाहिये कि समाज उनकी हिन्दी को मान रहा है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

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धनवान समाज से हिन्दी भाषा के विकास की अपेक्षा न करें-14 सितम्बर पर हिन्दी दिवस पर विशेष लेख


      14 सितम्बर हिन्दी दिवस के अवसर पर ऐसा पहली बार हुआ है जब हिन्दी टीवी चैनल इस पर उत्सव मनाकर अपने विज्ञापन प्रसारण का समय पार लगा रहे हैं।  एक टीवी चैनल ने तो अपना मंच फिल्मी अंदाज में तैयार कर हिन्दी भाषा के आधार पर व्यवसायिक करने वाले लोगों को आमंत्रित किया।  उसमें तमाम विद्वान अपने तर्क दे रहे थे।  एक विद्वान ने स्वीकार किया कि हिन्दी भाषा का आधार किसान और मजदूर हैं।  हम जैसे मौलिक लेखक मानते हैं कि हिन्दी सामान्य जनमानस की चहेती भाषा है और विशिष्ट लोगों के राष्ट्रभाषा या मातृभाषा बचाने के प्रयास दिखावटी हैं।  इस चर्चा में बाज़ार या व्यावसायिक क्षेत्रों में प्रचलित हिन्दी पर चर्चा हुई।  कुछ विद्वानों का मानना था कि बाज़ार हिन्दी का स्वरूप बिगाड़ रहा है तो अन्य की राय थी ऐसा कुछ नहीं है और हिन्दी भाषियों को उदार होना चाहिये।

      हिन्दी दिवस पर इस तरह की चर्चायें होती रहती हैं पर पहली बार ऐसी चर्चा टीवी चैनल पर हुई।  इसमें समाचार पत्र पत्रिकाओं में शीर्षकों तथा विषय सामग्रंी के साथ  में अंग्रेजी शब्दों के उपयोग पर भी विचार हुआ।  इस तरह की प्रवृत्ति ठीक है या नहीं यह एक अलग विषय है पर इसका पाठकों पर जो प्रभाव हो रहा है उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। अक्सर लोग यह शिकायत करते हैं कि अंग्रेजी अखबार हिन्दी से अधिक महंगे हैं।  अगर हम इसके पीछे के कारण जाने तो समझ में आयेगा कि चूंकि लोग अखबारों को अंग्रेजी भाषा ज्ञान बनाये रखने के लिये पढ़ते हैं इसलिये उनकी प्रसार संख्या मांग से कम होती है।  मांग आपूर्ति के नियमानुसार  वह  महंगे दाम पर भी बिक जाते हैं। जबकि हिन्दी प्रकाशनों की संख्या अधिक है तो पाठक संभवत उस मात्रा में उपलब्ध नहीं है। एक समय हिन्दी समाचार पत्र पत्रिकायें लोकप्रिय थीं पर इसका कारण उनकी विषय सामग्री कम उसके अध्ययन से  हिन्दी भाषा को आत्मसात करने की प्रवृत्ति लोगों में अधिक थी।  लोग साहित्यक किताबों की बजाय समाचार पत्र पत्रिकाओं पर हिन्दी ज्ञान के लिये निर्भर रहना पंसद करे थे। अब अगर कोई व्यक्ति हिन्दी समाचार पत्र पत्रिकाओं के अध्ययन से हिन्दी भाषा आत्मसात करने की बात सोच भी नहीं सकता।  हिन्दी समाचार पत्र यह मानकर चल रहे हैं कि युवा वर्ग हिन्दी नहीं जानता इसलिये अपने विशिष्ट पृष्ठों में अंग्रेजी शब्दों का अनावश्यक  उपयोग करते हैं। हमें पता नहीं कि इसका उन्हें लाभ है या नहीं पर हम जैसे पाठक ऐसी सामग्री को पढ़ने में भारी असहजता अनुभव करते हैं।  हिन्दी समाचार पत्र पत्रिकाओं ने अपने पाठकों का मानस समझा नहीं जो कि अध्यात्म प्रवृत्ति का है। यही कारण है कि देश भर के प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थाओं की पत्र पत्रिकायें आजकल लोगों के घरों में अधिक मिलती है और हिन्दी के व्यवसायिक प्रकाशनों को ग्राहक उसी तरह ढूंढने पर रहे हैं जैसे कि कपड़े वाला ढूंढता है। एक समय सामाजिक, राजनीतिक, महिला, बाल तथा मनोरंजन के विषयों वाली पत्रिकायें अक्सर लोगों के घर में मिल जाती थीं पर आजकल यह नहीं होता। कह सकते हैं कि इसके लिये आधुनिक संचार माध्यमों जिम्मेदार हैं पर सवाल उठता है कि आखिर अध्यात्मिक पत्र पत्रिकाओं पर यह नियम लागू क्यों नहीं होता? हिन्दी व्यवसायिक प्रकाशनों के प्रबंधकों को इसके लिये आत्म मंथन करना चाहिये कि इतना बड़ा जनसमूह होते हुए भी उनके प्रकाशनों से लोग क्यों मुंह मोड़ रहे हैं। कहीं यह भाषा के लिये आयी उनकी प्रतिबद्धता की कमी तो नहीं है?

      इतना ही नहीं यह प्रकाशन समूह देश में रचना के पठन पाठन तथा सृजन की नयी प्रवृत्तियों के संवाहक भी नहीं बन पाये और दूसरी भाषाओं के रचनाकारों तथा रचनाओं को हिन्दी में अनुवाद कर प्रस्तुत कर यह श्रेय तो लेते रहे हैं कि वह हिन्दी पाठक के लिये बेहतर विषय सामग्री प्रस्तुत की हैं पर आजादी के बाद एक भी लेखक का नाम इनके पास नहीं है जिसे उन्होंने अपने सहारे प्रतिष्ठा दिलाई हो।  क्या हिन्दी में बेहतर कहानियां नहीं लिखी जातीं या प्रभावी कविताओं की कमी है? यह सोच हिन्दी प्रकाशन समूहों के प्रबंधकों और संपादकों का हो सकता है पर यही उनके उस कम आत्मविश्वास का भी प्रमाण है जिसके कारण भारतीय जनमानस में हिन्दी प्रकाशनों की प्रतिष्ठा कम हुई है।

      आखिरी बात यह कि बाज़ार पर आक्षेप करना ठीक नहीं है। भाषा का संबंध भाव से और भाव का संबंध भूमि से होता है। भारत में हिन्दी ही सर्वोत्म भाषा है जो सहज चिंत्तन में सहायक होने के साथ ही उसके संवाद और उसके प्रेक्षण के लिये एक उचित माध्यम है। माने या माने पर इस सत्य से अलग जाकर हिन्दी के विकास पर बहस करना केवल औपचारिकत मात्र रह जाती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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आशिक जब कातिल बन जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य काव्य रचनायें


मधुर कर्णप्रिय शब्द बोले

ऐसे मुख की तलाश जारी है

पर कोई बोलता नहीं है,

किसी से अपनी बात

खुलकर कह सकें

ऐसे कान की तलाश जारी है

पर कोई खोलता नहीं है,

कोई हमारे जज़्बात को समझे

ऐसे दिल की तलाश जारी है

पर शब्दों कोई तोलता नहीं है,

कहें दीपक बापू जिंदा इंसानों में

जागी शख्सियत की तलाश जारी है

मगर कोई डोलता नहीं है।

—————–

आशिकों के कातिल बन जाने की खबर रोज आती है,

टीवी पर विज्ञापनों के बीच सनसनी छा जाती है।

कहें दीपक बापू दिल कांच की तरह टूट कर नहीं बिखरते

अब भड़ास अब गोली की तरह चलकर आग बरसाती है।

——-

आशिक नाकाम होने पर अब मायूस गीत नहीं गाते है,

कहीं गोली दागते कहीं जाकर चाकू चलाते हैं।

कहें दीपक बापू इश्कबाज हो गये इंकलाबी

नाकाम आशिक कलम छोड़कर  हथियार चलाते हैं।

———-

आशिकों ने प्रेमपत्र लिखने के लिये कलम उठाना छोड़ दिया है,

एक हाथ का मोबाइल दूसरे का चाकू से नाता जोड़ दिया है,

कहें दीपक बापू इश्क पर क्या कविता और कहानी लिखें,

टीवी पर चलती खबरों ने उसे सनसनी की तरफ मोड़ दिया है।

————–

तदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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मन का सहारा ढूंढने जाते हैं लोग सांईं के पास-हिन्दी लेख


                 अभी हाल ही में एक धर्मगुरु ने शिरडी के सांई बाबा के भगवान न होने का घोषणा कर डाली जिस पर हमारे देश के व्यवसायिक प्रचार माध्यम बहस चलाकर अपना विज्ञापन का समय पास कर रहे हैं। यह बहस पुरानी है पर जब कोई विषय न हो तो हमारे देश के प्रचार माध्यम धर्म के पुराने विषयों को नये ढंग से प्रचारित करते हैं। यह बुरा भी नहीं है।  सांई बाबा को भगवान मानने वाले लोगों की कमी इस देश में नहीं है। कोई कहता है कि उनके बीस करोड़ भक्त हैं।  हम यहां भक्तों की संख्या से थोड़ा अचंभित है। दरअसल सांई बाबा के दरबार में हमारे यहां प्रचलित भगवान के विभिन्न स्वरूपों के भजन भी चलते है जिनके आकर्षण में भी लोग जाते हैं।  उनकी दरबार में जाने वाले सभी लोग उनके भक्त हों यह जरूरी नहीं हैं क्योंकि हमारे यहां अनेक लोग पर्यटन की वजह से भी मंदिरों में जाते हैं।  हमारा अनुभव तो यह भी कहता है कि अनेक  लोग अपने शहर के मंदिरों में नहीं जाते पर प्रसिद्ध मंदिरो पर अपनी आस्था जताने में गौरव अनुभव करते है।

                 अनेंक लोग  सांई बाबा के ंमंदिर में जाते हैं मगर वही वृंदावन के बांकेबिहारी, हरिद्वार में हर की पौड़ी, उज्जैन में महाकाल तथा  जम्मू की वैष्णोदेवी में भी जाते है। इसके बावजूद उन पर किसी एक स्वरूप के भक्त होने की छाप नहीं बनाई जा सकती।  भक्ति में भटकाव का आरोप भी नहीं लगाया जा सकता।  इनमें से अनेक यह भी मानते हैं कि सर्वशक्तिमान की निराकार, निष्काम तथा निर्मल भाव से भक्ति करने पर मन, बुद्धि और विचार शुद्ध होने से सांसरिक कार्य स्वतः ही सिद्ध होते है।  यह लोग किसी पर अपनी भक्ति में पाखंड का आरोप लगाना पसंद नहीं करते। निराकार के उपासक होने के बावजूद साकार रूप की आराधना अतार्किक नहीं मानी जा सकती।

                 भारत में लोगों के अंदर अध्यात्मिक विषय के प्रति रुझान स्वाभाविक रूप से रहता है।  सांसरिक विषय तथा उनसे जुड़े कार्य  स्वतः चलते हैं पर किसी को अगर सर्वशक्तिमान के एक स्वरूप की आराधना से लाभ हो जाये तो वह उसका दीवाना हो जाता है। इसका लाभ पेशेवर धार्मिक ठेकेदार उठाते हुए भगवान और भक्त के बीच में गुरु यानि मध्यस्थ बनकर अपनी उपस्थिति जताते है।

                 जैसे जैसे इस देश में परिवहन के आधुनिक वाहन की संख्या बढ़ रही है वैसे वैसे लोगों के अंदर पर्यटन की प्रवृत्ति की बढ़ी है।  अब तो सामान्य तथा धार्मिक पर्यटन स्थानों में अंतर ही नहीं रहा है।  इसके चलते बाज़ार के सौदागरों तथा उनके प्रचार प्रबंधकों ने लोगों की रुचि बनाये रखने के लिये नये नये प्रयोग किये है। इन्हीं प्रयोंगों की देन है जम्मू का वैष्णों मंदिर तथा संाई बाबा में मंदिरों की प्रसिद्धि।  आशा फिल्म में ‘माता ने बुलाया है’ तो अमर अकबर एंथोनी में सांई बाबा पर दिखाये गये गाने से इन दोनों मंदिरों को जो प्रसिद्ध मिली वह अलग से शोध का विषय है पर सच बात तो यह है कि इन दोनों मंदिरों के बारे में यह लेखक इससे पूर्व नहीं जानता था।  भले ही इन फिल्मों के गानों का उद्देश्य न रहा हो कि मंदिर प्रसिद्ध किये जायें पर इतना तय है कि उसके बाद इन स्थानों पर भीड़ बढ़ी।  इसका कारण यह है कि साकार भक्ति उपासकों के नये रूप के प्रति रुझान अधिक रहता है।  हमारे यहां मथुरा, उज्जैन, हरिद्वार, तिरुपति बालाजी, इलाहाबद, बनारस तथा  अनेंक प्रसिद्ध स्थान पौराणिक महत्व के हैं।  नयें स्थानों की प्रसिद्ध के बावजूद वहां भक्तों की भीड़ में कोई कमी नहीं आयी।  वैष्णो माता चूंकि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का ही भाग है इसलिये कोई उन पर आपत्ति नहीं करता पर सांई बाबा को लेकर कुछ धार्मिक गुरु अत्यंत परेशान रहते हैं।

                 सांई बाबा की पहचान अध्यात्मिक ज्ञान के प्रतीक के  रूप में नहीं वरन् सांसरिक विषयों में चमत्कारिक उपलब्धि दिलाने के रूप में बनाई गयी है। श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों को समझें तो अर्थार्थी और आर्ती भक्तों का जमावड़ा अधिक हो सकता है।  कुछ मात्रा में जिज्ञासु भी हो सकते हैं पर ज्ञानियों के लिये उनके स्वरूप में चिंत्तन के लिये कुछ नहीं है पर फिर भी इसका अर्थ कदापि नहीं है कि उनके भक्तों की भावना को ठेस पहुंचायी जाये। गीता ज्ञान की दृष्टि से चारों प्रकार के भक्तों की उपस्थिति को सहजता से स्वीकार करना चाहिये।

                 इतना जरूर देखा जा रहा है कि भारतीय धार्मिक कर्मकांडियों ने पेशेवराना ढंग से उनके नाम का उपयोग करने में सिद्धि प्राप्त कर ली है।  कभी भी सांई बाबा के मंदिर के बाहर नये वाहनों की पूजा होते देखी जा सकती है और सांई बाबा के सेवक लोहे लंगर से बने और बाद में कबाड़ हो जाने वाले सामान की उपयोगिता बढ़ाने क्रे लिये जंतर मंतर करते देखे जा सकते है।  संाई बाबा के मंदिरों की लोकप्रियता बढ़ने का एक कारण यह भी है कि हमारे परंपरागत मंदिरों में रूढता की प्रवृत्ति ने अनेक लोगों को विरक्त कर दिया है।  हम अनेक बार सुनते हैं कि अनेक मंदिरों में ऊंची जाति के लोगों को ही प्रवेश मिल पाता है।  भगवान शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु जैसे आकर्षक तथा व्यापक स्वरूपों पर हमारा दृष्टिकोण संकीर्ण होता गया है।

                 जहां तक भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का विषय है उसका चमत्कारों से कोई संबंध नहीं है।  सांसरिक विषयों में किसी को कम तथा किसी को अधिक सफलता मिलती है।  अब यह भाग्य या कर्मफल के कारण हो सकता है पर जिनको मिल गया वह उसे चमत्कार मानता है तो जिसे नहीं मिला वह चमत्कार की आशा में इधर उधर फिरता है। समय आने पर सभी के काम सिद्ध होते हैं पर जब तक न हो आदमी का मन उसे भटकाता है।  अध्यात्मिक ज्ञानियों के लिये सांईबाबा की भक्ति का समाज में बढ़ता प्रचार चिंता का विषय नहीं हो सकता।

————————————–

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

 

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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वादों का मेला-हिंदी व्यंग्य कविता


भरोसा देकर थोड़ी देर के साथी हमारा दिल लूट जाते हैं,

मतलब तक साथ निभाते सभी फिर छूट जाते हैं।

हार बार बाज़ार में सजता है कुंभ की तरह वादों का मेला,

सपने सामने दिखाते पीछे छिपाकर चालाकी गुरु और चेला,

मंच पर वक्ता बदलते है मगर जुबां से बात एक ही सुनाते,

शब्दों का जादू जिनका चल जाये वह कीमत लेकर भुनाते,

जहान को बदलने का नारा सुनते हुए लोगों के कान पक गये,

न हालात बदले न वादों की शक्ल सौदागर आते रोज नये,

कहें दीपक बापू ऊंची बातें करते हैं छोटी नीयत के लोग

हम तो एक कान से सुनते दूसरे से निकाले जाते हैं।

———–

 

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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योग साधना में नियम का बहुत महत्व है-हिन्दी चिंत्तन लेख


                        इस बार की दीपावली के दो दिन हमारे लिये दैहिक दृष्टि से सुखद नहीं रहे।  धनतेरस की शाम से चला बुखार और जुकाम नाम के विकारों का संयुक्त अभियान रविवार शाम तक हमें हैरान किये रहा।  योग साधना का अभ्यास इतना ही इसमें काम आया कि हमने अपने घरेलु उपायों से इसे थामे रखा।  इन्हेलर से एक दो बार नाम को साफ करने का प्रयास किया तो वह भी उल्टा पड़ा। कहा जाता है कि जुकाम तीन दिन तक तो रहता ही है। यह सही हो सकता है पर चिकित्सक से इलाज कराते हुए आदमी तो तसल्ली तो रहती है कि उसे कोई दूसरा ठीक कर लोग। इन्हेलर ने जुकाम को जाम कर दिया तो वह ज्यादा उग्र हो उठा।  बहरहाल हमने जिन उपायों से जुकाम और बुखार का इलाज किया वह सार्वजनिक करना यूं भी ठीक नहीं है क्योंकि हमारे पास कोई चिकित्सीय प्रमाणपत्र नही है।  चार पांच तरीके तो उपयोग किये ही एक बार विक्स की गोली भी मन को शांत करने के लिये ले ही ली।

                        एक साथी ने प्रश्न किया-‘‘तुम्हें जुकाम कैसे हुआ? तुम तो रोज योगसाधना करते हो।’’

                        हमने कहा कि’’हमेशा ही योगसाधना थोड़े ही करते हैं। फिर हम नियम से कभी विचलित न हों ऐसे कोई सिद्ध भी नहीं है।’’

                        वह बोला-‘‘यह ठीक है पर तुम तो ज्ञानी भी हो।

                        हमने कहा-‘‘यह ठीक है कि हम कभी कभी ज्ञान बघारते हैं पर हम उसके भी साधक है, कोई सिद्ध नहीं! ज्ञानी का प्रमाण पत्र हमें दूसरा क्या देगा हमें स्वयं ही स्वीकार्य नहीं है।

                        योग साधना का आशय केवल प्राणायाम और आसन से ही नहीं होता वरन् उसमें नियम का भी बहुत महत्व है। नियम या नीति के विपरीत चलने का परिणाम विकार के रूप में प्रकट होता है।  दिपावली के दिनों में जब खाद्य विशेषज्ञ चिल्लाकर यह बता रहे हों कि हर जिले में इतना दूध नहीं होता जितना खोया मिल रहा है, इसलिये मिलावटी या नकली होने की पूरी संभावना है। जवाब यह भी हो सकता है कि दूसरे जिले से असली भी तो आ सकता है इसलिये नकली खोया नहीं भी हो सकता है। यह अत्यंत मूर्खतपूर्ण जवाब होगा क्योंकि यहां पूरे देश की बात हो रही है। हर जिले में ऐसा नहीं हो सकता।  दूध उत्पादन के बनिस्बत हर जिले में  उससे कई गुना खोया बाज़ार में दिख रहा है।

                        हमने जिस दुकानदार से मिठाई खरीदी उसकी छवि मध्यम स्तर की है इसलिये सब बात पर यकीन था कि शुद्ध सामान मिलेगा।  खाने के बाद जो प्रतिक्रिया हुई उससे मन दुःखी हो गया। हमने एक साथी से इस बात की चर्चा की तो उसने यह शंका जाहिर की कि खोया नकली न हो पर संभव है मिठाई रखी हुई हो। हमें सच पता नहीं पर उस मिठाई ने एक नहीं दो दिन परेशान किया।  मतलब वह दुकानदार नकली सामान न दे पर रखा हुआ दे सकता है यही उसकी मध्यम स्तर छवि का परिचायक है।

                        शुक्रवार शाम को मिठाई खरीदकर दो टुकड़े खाये।  उसके तत्काल बाद दैहिक स्थिति थोड़ी तनावपूर्ण लगी। रात तक उसने पूरी तरह घेर लिया। नींद आती जाती रही।  बहरहाल यह आसन और प्राणायाम का प्रभाव रहा कि शानिवार प्रातःकाल उठते समय थकावट नहीं लगी पर तनाव अनुभव हो रहा था।  योग साधना से निवृत होकर नहाधोकर चाय पी तो वह तनाव अधिक बढ़ गया।  बुुखार और जुकाम शांत भाव से आक्रामक दिख रहे थे। हमें लगा कि वायु विकार के कारण भी यह हो सकता है जो जुकाम के सहयोग से बना है।  दोपहर को खाने के बाद राहत अनुभव हुई पर दुर्भाग्य यह कि हमने सोचा कि फिर दो टुकड़े खा लिये।  उसके बाद बुखार तथा जुकाम ने आक्रामक रूप धारण कर लिया।  बहरहाल हमने नींद आराम से ली।  रविवार को गर्म पानी से नहाये।  ठंड लगने लगी थी।  होम्योपैथी की गोलियां  बुखार और जुकाम के विरुद्ध दागी। साथ ही तय किया कि अब मिठाई को हाथ नहीं लगायेंगे।  दिन में हमने दोनों विकारों के विरुद्ध  जवाबी हमला भी किया।  हमें लगा कि अगर यह मिठाई का असर है तो रविवार शाम तक ठीक हो जाना चाहिये।  हैरानी है शाम छह बजे होते होते हमारा शरीर यह बताने लगा कि विकार अब पीछे हटने लगे।  इससे हमारा मनोबल बढ़ा।  बीमारी के दौरान जो सबसे महत्वपूर्ण बात लगी वह यह कि आदमी का मनोबल ही उसे चलता है।  संघर्ष करते हुए हम निश्चित थे कि यह विकार दो दिन तक हैरान करेगा पर मनोबल गिरा हुआ था। सच कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  जब दैहिक शक्ति ने सकारात्मक संकेत दिये तो हमने अपने आपसे ही पूछा वह एक घंटे अंदर बैठा मन कौनसा था जो विचलित था और यह कौन है जो अब आश्वस्त होकर बाहर घूमने की प्रेरणा दे रहा है। यह मजे की बात है कि धूप में जाते हुए भी जो कदम लड़खड़ा रहे थे वही रात को तन कर खड़े थे।

                        हमने अनेक बार तय किया था कि जहां तक हो सके बाज़ार में तैयार खुली खाद्य पेय सामग्री से बचें रहें।  हमने देखा है कि जब बाज़ार का ऐसा सामान जो रखा जा सकता है उसे खाने पर हमें ऐसे ही जूझना पड़ता है।  कमाल इस बात का है कि बाज़ार से तैयार खुली खाद्य सामग्री। न खाने तक हमें कोई परेशानी नहीं होती। बीमार होने पर निकटवर्ती इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो हमने अपना नियम तोड़ा है।  बाज़ार में कभी खा लिया तो इस बात से डरे रहते हैं कि कहीं बीमार न पड़ जायें।  इसलिये कम ही खाते हैं पर दो बार निकल गये पर तीसरी बार  फंस ही जाते है।  स्थिति यह है कि हम पैक सामग्री की निर्माण अथवा पैक करने की तिथि देख लेते हैं।  हमारे कुछ विद्वान सही कहते हैं कि हमारे देश में भूखमरी बहुत है पर सच यह है कि यहां भूख की बनिस्पत बल्कि  खाकर मरने वाले लोगों की संख्या ज्यादा होती है।   मिलावटी, विषैले और नकली सामान खाकर मरने वाले लोगों की संख्या का अनुमान हमारे पास  नहीं है वरना वह भी कम नहीं हो सकती।

                        कहते हैं कि भगवान जो करता है वह अच्छे के लिये ही करता है। भौतिक रूप से दीपावली पर लाभ होने की कामना पालने वाले बहुत हैं पर हम जैसे अध्यात्मिक ज्ञान साधक को इस दीपावली पर बीमार होकर चिंत्तन करने का अवसर मिला उससे लगता है कि योग माता ने मति फेरकर वह अवसर दिया। जैसे संदेश दिया हो कि आसन और प्राणायम पर न इतराओ नियम भी कोई विषय है जिस पर कुछ चिंत्तन करो। दीपावली के दिन तो खूब पटाखे छोड़े गये, मिठाईयां खायी गयीं और अनेक जगह कार्यक्रम आयोजित किये गये।  सोमवार की प्रातःकाल हमें यह पता लगा कि हमारे फेफड़ों में कोई संक्रमण जरूर हुआ है क्योंकि सारे आसन हो गये पर हास्यासन पहले की तरह नहीं हो सका या कहें कि कर ही  नही पायें।  इससे ज्यादा चिंता यूं नहीं हुई क्योंकि बाकी अंग सही काम कर रहे हैं। दूसरी बात यह भी कि हम हास्यासन नहीं करते होते तो यह पता ही नहीं लगता कि हमारे फेफड़ों में संक्रमण विद्यमान है।  हो सकता है ऐसे में मिठाई फिर खा लेते।  कम से कम अब सावधानी रखने का विचार तो आया।  इसलिये हम तो यह कहेंगे कि हमारे लिये यह दीपावली भी शुभ रही। 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

 

ग्वालियर मध्य प्रदेश
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भरोसा देकर दिल लूटे जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता


भरोसा देकर थोड़ी देर के साथी हमारा दिल लूट जाते हैं,

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हार बार बाज़ार में सजता है कुंभ की तरह वादों का मेला,

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मंच पर वक्ता बदलते है मगर जुबां से बात एक ही सुनाते,

शब्दों का जादू जिनका चल जाये वह कीमत लेकर भुनाते,

जहान को बदलने का नारा सुनते हुए लोगों के कान पक गये,

न हालात बदले न वादों की शक्ल सौदागर आते रोज नये,

कहें दीपक बापू ऊंची बातें करते हैं छोटी नीयत के लोग

हम तो एक कान से सुनते दूसरे से निकाले जाते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

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आम आदमी के हालात नहीं बदलते-हिंदी व्यंग्य कविता


 आम इंसानों के हालत कभी हमें बदलते नहीं दिखते,

भलाई के सौदागर तख्त पर बैठ जाते नये वादे लिखते।

कहें दीपक बापू नया चेहरा पर्दे पर ताजगी ले आता है,

अदायें होती पुरानी वह जल्दी स्वाद में बासी हो जाता है।

गरीब को अमीर बनाने की रोज बनती यहां  नयी योजना,

फिर भी सड़क पर कचड़े में भूखों को रोटी पड़ती है खोजना।

इतिहास पर लिखे गये ढेरों कागज की स्याही में नहाये हैं,

मेहनतकशों के पसीने से बने सोने सफेदपोश लुटेरों ने पाये हैं।

बैखौफ हैं बहशी इंसान पहरेदारों से कर ली यारी,

कसूरवारों चुका रहे हफ्ता नहीं आती फंसने की बारी।

खबरचियों को सनसनी पर बहस में चाहिये रोज मसाला,

ज़माने की भलाई के दावे कमाई के आगे नहीं टिकते।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

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