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पहले अपने दिल की सुनें


कभी बोलने का मन
तो कभी लिखने का जतन
कभी चाहें धन
अपने आप से लड़ते हुए
आत्म मंथन से डरते हुए
भागे जा रहे हैं हम
कोई और क्या सुनेगा
अपनी ही नहीं सुनते
कोई और क्या पढेगा
खुद ही अपना लिखा नहीं समझते
कोई और क्या देगा दौलत
हम खुद ही किसी को क्या देते
दूसरा कोई क्या काम करेगा
अपना दर्द बढाए जा रहे हैं हम
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आशा पर टिका है आसमान
पर वहाँ से नहीं टपकती
विश्वास पर चल रही हैं दुनिया
पर कोई जमीन पर नहीं उगता
यह तो दिल की बातें है
उन्हें वहीं पालना होगा
किसी और पर जिम्मा डालना बेकार होगा
निराशा में जाने से खुद बचें
विश्वास किसी का टूटने न दें
हमें अपनी राह चलनी है
भले ही कोई हमारी नहीं सुनता
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दिल और दिमाग


कुछ यूंही ख्याल कभी आता है
भला सबके बीच में भी
आदमी खुद को
अकेलेपन के साथ क्यों पाता है
शायद दिल नहीं समझता दिल की बात
अपनों और गैरों में फर्क कर जाता है
अपनों के बीच गैरों की फिक्र
और गैरों के बीच
अपनों की याद में खो जाता है
कभी बाद में तो कभी पहले दौड़ता है
पर वक्त की नजाकत नहीं समझ पाता है
दूसरों पर नजरिया तो दिमाग खूब बनाता
पर अपना ख्याल नहीं कर पाता है
बाहर ही देखता है
आदमी इसलिए अन्दर से खोखला हो जाता है