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उधार की बैसाखियाँ


आकाश में चमकते सितारे भी
नहीं दूर कर पाते दिल का अंधियारा
जब होता है वह किसी गम का मारा
चन्द्रमा भी शीतल नहीं कर पाता
जब अपनों में भी वह गैरों जैसे
अहसास की आग में जल जाता
सूर्य की गर्मी भी उसमें ताकत
नहीं पैदा कर पाती
जब आदमी अपने जज्बात से हार जाता
कोई नहीं देता यहाँ मांगने पर सहारा

इसलिए डटे रहो अपनी नीयत पर
चलते रहो अपनी ईमान की राह पर
इन रास्तों की शकल तो कदम कदम पर
बदलती रहेगी
कहीं होगी सपाट तो कहीं पथरीली होगी
अपने पाँव पर चलते जाओ
जीतता वही है जो उधार की बैसाखियाँ नहीं माँगता
जिसने ढूढे हैं सहारे
वह हमेशा ही इस जंग में हारा

जिन्दगी के रास्ते


कुछ ख्वाब थे जो हकीकत नहीं बने
कुछ सपने थे जो सच नहीं बने
जिन्दगी के रास्ते हैं ऊबड़-खाबड़
आदमी अपने कदम चाहे जैसे बढाए
ऐसे रास्ते बिलकुल नहीं बने
ख्यालों में चाहे जैसा सजा ले
रास्ते पर आरामगाहें मिल जाएं
ऐसे यहाँ जहाँ नहीं बने
सच के रास्ते पर चलना है
यही पक्का इरादा है जिनका
वह कभी गिरते नहीं
अपनी मंजिलों की तरफ
सीना तानकर आगे बढ़तें हैं
यह रास्ते उनके लिए अपने बने