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थोथा चना बाजे क्यों ना


जिन्हें बोलना चाहिए
वह खामोश हो जाते हैं
जिन्हे खामोश होना चाहिए
वह बोले जाते हैं
कहने वाले सही कह गये
‘थोथा चना बाजे घना’
पर किसे समझाने कौन सुने
कान बंद कर लें
अपना ध्यान इधर-उधर लें
किसी को करना नहीं बोलने से मना
अपने ही बोले और लिखे शब्द का अर्थ
लोग नही जानते
अनर्थ पर बहस को
लोकतंत्र का प्रतीक मानते
दूसरे के दोषों पर डालें नजर
अपने गुणों के बखान पर
गुजारे दिन-रात का हर पहर
दुरूपयोग करें हर पल का
और कीमती वक़्त बताएं अपना

खालीपन


अब रिश्तों में लगता है
अजीब सा फीकापन
बडे बोझिल होते जाते हैं
उम्र के बढ़ते -बढते
जिनके साथ बीता था बचपन
जब लोग लगाते हैं
रीति-रिवाज निभाने की शर्तें
हो जाती हैं अनबन
इसलिये अपनों से ज्यादा
गैरों में ढूँढ रहा है आदमी अपनापन
वहाँ भी जब होती है
निभाने के लिए शर्तें
मुश्किल हो जाता है आगे बढना
तब आदमी सब से अलग
अकेले में ही बैठकर भरता है
कभी अच्छी तो कभी बुरी आदतों से
अपना खालीपन