Tag Archives: khyal

रात भुलावा, सुबह छलावा-हिंदी कविता


चिल्ला चिल्ला कर वह

करते हैं एक साथ होने का दावा

यह केवल है छलावा

मन में हैं ढेर सारे सवाल

जिनका जवाब ढूंढने से वह कतराते

आपस में ही एक दूसरे के लिये तमाम शक

जो न हो सामने

उसी पर ही शुबहा जताते

महफिलों में वह कितना भी शोर मचालें

अपने आपसे ही छिपालें

पर आदमी अपने अकेलेपन से घबड़ाकर

जाता है वहां अपने दिल का दर्द कम करने

पर लौटता है नये जख्म साथ लेकर

फिर होता है उसे पछतावा

रात होते उदास होता है मन सबका

फिर शुरू होता है सुबह से छलावा
………………………………………….

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप