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विकास और कदाचार(उन्नति और भ्रष्टाचार) -हिन्दी व्यंग्य कवितायें (devlopment and corruption-hindi satire poem,hindi vyangya kavita)


रबड़ के चार पहियों पर सजी कार
विकास का प्रतीक हो गयी है,
चलते हुए उगलती है धुआं
इंसान बन गया मैंढक
ढूंढता है जैसे अपने रहने के लिये कुआं,
ताजी हवा में सांस लेती जिंदगी
अब अतीत हो गयी है।
———-
उन्होंने पूछा था अपने दोस्त से
खुशियां दिलाने वाली जगह का पता
उसने शराबखाने का रास्ता दिखाया,
चलते रहे मदहोश होकर उसी रास्ते
संभाला तब उन्होने होश
जब अस्पताल जाकर
बीमारों में अपना नाम लिखाया।
———-
हमने उनसे पूछा कदाचार के बारे में
उन्होंने जमाने भर के कसूर बताये,
भरी थी जेब उनकी भी हरे नोटों से
जो उन्होंने ‘ईमादारी की कमाई‘ जताये।
मान ली उनकी बात तब तक के लिये
जब तक उनके ‘चेहरे’
रंगे हाथ कदाचार करते पकड़े नज़र नहीं आये।
————

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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नया वर्ष और सितारों के सितारे-हिन्दी व्यंग्य लेख (happy new year and srar of star-hindi vyangya lekh)


धरती के सितारों को अपने सितारों की फिक्र नहीं जितनी कि उनके चेहरे, अदायें और मुद्रायें बेचने वालों को है। धरती के बाकी हिस्से का नहीं पता पर भारतीय धरती के सितारे तो दो ही बस्तियों में बसते हैं-एक है क्रिकेट और दूसरी है फिल्म। यही कारण है कि टीवी चैनल ज्योतिषियों को लाकर उनका भविष्य अपने कार्यक्रमों में दिखा रहे हैं। समाचार चैनलों को कुछ ज्यादा ही फिक्र है क्योंकि वह नव वर्ष के उपलक्ष्य में कोई प्रत्यक्ष कार्यक्रम नहीं बनाते बल्कि मनोरंजन चैनलों से उधार लेते हैं। इसलिये अगर इस साल का आखिरी दिन का समय काटना कहें या टालना या ठेलना उनके लिये दुरुह कार्य साबित होता दिख रहा है।
उनको इंतजार है कि कब रात के 12 बजें तो नेपथ्य-पर्दे के पीछे-कुछ संगीत को शोर तो कुछ फटाखों के स्वर से सजी पहले से ही तैयार धुनें बजायें और उसमें प्रयोक्ताओं को आकर्षित अधिक से अधिक संख्या में कर अपने विज्ञापनदाताओं को अनुग्रहीत करें-अनुग्रहीत इसलिये लिखा क्योंकि विज्ञापनदाताओं को तो हर हाल में विज्ञापन देना है क्योंकि उनके स्वामियों को भी इन समाचार चैनलों में अपने जिम्मेदार व्यक्तित्व और चेहरे प्रचार कराना है। इस ठेला ठेली में एक दिन की बात क्या कहें पिछले एक सप्ताह से सारे चैनल जूझ रहे हैं-नया वर्ष, नया वर्ष। ऐसे में समय काटना जरूरी है तो फिर क्रिकेट और फिल्म के सितारों का ही आसरा बचता है क्योंकि उनके विज्ञापनों में अधिकतर वही छाये रहते हैं।
अगर किसी सितारे की फिल्म पिट जाये तो भी उनके विज्ञापन पर गाज गिरनी है और किसी क्रिकेट खिलाड़ी का फार्म बिगड़ जाये तो भी उनको ही भुगतना है-याद करें जब 2007 में पचास ओवरीय क्रिकेट मैचों की विश्व कप प्रतियोगिता में भारत हारा तो लोगों के गुस्से के भय से सभी ने उनके अभिनीत विज्ञापनों कोे हटा लिया था और यह तब तक चला जब भारत को बीस ओवरीय क्रिकेट प्रतियोगिता जीतने का मौका नहीं दिया गया! उस समय बड़े बड़े नाम गड्ढे में गिर गये लगते थे पर फिर अब वही सामने आ गये हैं। जिनके भविष्य पूछे जा रहे हैं यह वही हैं जिनका 2007 में दस महीने तक लोग चेहरा तक नहीं देखना चाहते थे।
हैरानी होती है यह सब देखकर! कला, खेल, साहित्य, पत्रकारिता तथा अन्य आदर्श क्षेत्रों पर बाजार अपने हिसाब से दृष्टि डालता है और उस पर आश्रित प्रचार माध्यम वैसे ही व्यवहार करते हैं।
उद्घोषक पूछ रहा है कि ‘अमुक खिलाड़ी का नया वर्ष कैसा रहेगा?’ज्योतिषी बता रहा है‘ ग्रहों की दशा ठीक है। इसलिये उनका नया साल बहुत अच्छा रहेगा।’
नेपथ्य में बैठा प्रचार प्रबंधक चैन की सांस ले रहा होगा-‘चलो, यार इसके विज्ञापन तो बहुत सारे हैं। इसलिये अपने ग्रह अच्छे हैं।’
फिर ज्योतिषी दूसरे खिलाड़ी के बारे में बोल रहा है-‘उसके ग्रह भारी हैं। अमुक ग्रह की वजह से उनके चोटिल रहने की संभावनायें हैं, हालांकि इसके बावजूद उनका प्रदर्शन अच्छा रहेगा।’
प्रचार प्रबंधक ने सोचा होगा-‘अरे यार, ठीक है चोटिल रहेगा तो भी खेलेगा तो सही! अपने विज्ञापन तो चलते रहेंगे। हमें क्या!
तीसरे खिलाड़ी के बारे में ज्योतिषी जब बोलने लगा तो उसके अधरों पर एक मुस्काल खेल गयी-शायद वह सोच रहे थे कि सारी दुनियां इस खिलाड़ी के भविष्यवाणी का इंतजार कर रही है और वह अपने मेहमान चैनल के सभी लोगों का खुश करने जा रहे हैं। वह बोले-‘यह खिलाड़ी तो स्वयं ही बड़ा सितारा है। इसके पास अभी साढ़े तीन साल खेलेने के लिये हैं। यह भी बढ़िया रहेंगे!’
उदुघोषक भी खुश हो गया क्योंकि उसे लगा होगा कि नेपथ्य में बैठा प्रचार प्रबंधक इससे बहुत उत्साहित हुआ होगा। वह बीच में बोला-‘वह सितार क्या अगले वर्ष भी ऐसे ही कीर्तिमान बनाता रहेगा, जैसे इस साल बना रहा है।’
ज्योतिषी ने कहा-‘हां!’
वहां मौजूद सभी लोगों के चेहरे पर खुशी भरी मुस्कान की लहरें खेलती दिख रही थीं।
हमें भी याद आया कि हम पुराने ईसवी संवत् से नये की तरफ जा रहे हैं इसलिये बाजार और प्रचार के इस खेल में बोर होने से अच्छा है कि अपना कुछ लिखें। हमारी परवाह किसे है? हम ठहरे आम प्रयोक्ता! आम आदमी! विदेशों का तो पता नहीं पर यहां बाजार अपनी बात थोपता है। ऐसे ज्योतिष कार्यक्रम तीन महीने बाद फिर दिखेंगे जब अपना ठेठ देशी नया वर्ष शुरु होगा पर उस समय इतना शोर नहीं होगा। बाजार ने धीरे धीरे यहां अपना ऐजेंडा थोपा है। अरे, जिसे वह कीर्तिमान बनाने वाला सितारा कह रहे हैं उसके खाते में ढेर सारी निजी उपलब्धियां हैं पर देश के नाम पर एक विश्व कप नहीं है।
सोचा क्या करें! इधर सर्दी ज्यादा है! बाहर निकल कर कहां जायें! ऐसे में अपना एक पाठ ठेल दें। अपना भविष्य जानने में दिलचस्पी नहीं है क्योंकि डर लगता है कि कोई ऐसा वैसा बता दे तो खालीपीली का तनाव हो जायेगा। जो खुशी आयेगी वह स्वीकार है और जो गम आयेगा उससे लड़ने के लिये तैयार हैं। फिर यह समय का चक्र है। न यहां दुःख स्थिर है न सुख। अगर हम भारतीय दर्शन को माने तो आत्मा अमर है इसका मतलब है कि जीवन ही स्थिर नहीं है मृत्यु तो एक विश्राम है। ऐसे में उस सर्वशक्तिमान को ही नमन करें जो सभी की रक्षा करता है और समय पड़ने पर दुष्टों का संहार करने के लिये स्वयं प्रवृत्त भी होता है।
बहरहाल याद तो नहीं आ रहा है पर उस दिन कहीं सुनने, पढ़ने या देखने को मिला कि कुंभ राशि में बृहस्पति महाराज का प्रवेश हो रहा है। बृहस्पति सबसे अधिक शक्ति शाली ग्रह देवता हैं और वाकई उसके बाद हमने महसूस किया जीवन के कमजोर चल रहे पक्ष में मजबूती आयी। वैसे नाम से हमारी राशि मीन पर जन्म से कुंभ है। इन दोनों का राशिफल करीब करीब एक जैसा रहता है। हमारे सितारों की फिक्र हम नहीं करते पर दूसरा भी क्यों करेगा क्योंकि हम सितारे थोड़े ही हैं। यह अलग बात है कि सितारे अपने सितारों की फिक्र नहीं भी करते हों-इसकी उनको जरूरत भी क्या है-पर उनके सहारे धन की दौलत के शिखर पर खड़ा बाजार और उसके सहारे टिका प्रचार ढांचे से जुड़े लोगों को जरूर फिक्र है वह भी इसलिये क्योंकि वह बिकती जो है।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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मूर्ख लिखते हैं और समझदार पढ़ते हैं-हास्य व्यंग्य


ब्लोगर अपने घर के बाहर पोर्च पर अपनी पत्नी के साथ खडा था। उसी समय दूसरा ब्लोग आकर दरवाजे पर खडा हो गया। पहला ब्लोगर इससे पहले कुछ कहता उसने अभिवादन के लिए हाथ उठा दिए-”नमस्ते भाभीजी।

पहला ब्लोगर उसकी इन हरकतों का इतना अभ्यस्त हो चुका था कि उसने अपनी उपेक्षा को अनदेखा कर दिया। वह कुछ उससे कहे गृहस्वामिनी ने उसका स्वागत करते हुए कहा-”आईये ब्लोगरश्री भाईसाहब। बहुत दिनों बाद आपका आना हुआ है।”

पहले ब्लोगर ने प्रतिवाद किया और कहा-”हाँ, अगर उस सम्मानपत्र की बात कर रही हो जो यह कहीं से छपवाकर लाया और तुमसे हस्ताक्षर कराकर ले गया था तो मैं बता दूं उससे यह तय करना मुश्किल है कि यह ब्लोगश्री है कि ब्लोगरश्री। अभी उस भ्रम का निवारण नहीं हुआ है। अभी इसके नाम के आगे किसी पदवी का उपयोग करना ठीक नहीं है।”

गृहस्वामिनी ने दरवाजा खोल दिया। दूसरा ब्लोगर अन्दर आते हुए बोला-”यार, आज तुमसे जरूरी काम पड़ गया इसलिए आया हूँ।”
पहले ब्लोगर ने कहा-”तुम कल आना। आज मुझे एक जरूरी पोस्ट लिखनी है।
गृहस्वामिनी ने बीच में हस्तक्षेप किया और कहा-”आप कंप्यूटर के पास बैठकर बात करिये। मैं तब तक चाय बनाकर लाती हूँ। घर आये मेहमान से ऐसे बात नहीं की जाती है। ”
पहले ब्लोगर को मजबूर होकर उसे अन्दर ले जाना पडा। दूसरे ब्लोगर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा–”मैं होली पर मूर्ख ब्लोगर सम्मेलन आयोजित करना चाहता हूँ। अपने शहर में तो बहुत कम लोग लिखते हैं कोई ऐसा शहर बताओ जहाँ लिखे वाले अधिक हों तो वहीं जाकर एक सम्मेलन कर लूंगा। तुम तो इंटरनेट पर लिखने वाले अधिकतर सभी ब्लोगरों को जानते हो.”
पहले ब्लोगर ने शुष्क स्वर में कहा-”हाँ, यहाँ तो तुम अकेले मूर्ख ब्लोगर हो। इसलिए कोई सम्मेलन नहीं हो सकता। किस शहर में मूर्ख ब्लोगर अधिक हैं मैं कैसे कह सकता हूँ।

दूसरा ब्लोगर बोला-”मैंने तुमसे कहा नहीं पर हकीकत यह है कि मेरी नजर में तुम एक मूर्ख ब्लोगर हो। जो ब्लोगर लिखते हैं वह मूर्ख और जो पढ़ते हैं वह समझदार हैं। समझदार ब्लोगर पढ़कर कमेन्ट लगाते हैं और कभी-कभी नाम के लिए लिखते हैं।”
पहले ब्लोगर ने कहा-”ठीक है। फिर इस मूर्ख ब्लोगर के पास क्यों आये हो? अपना काम बता दिया अब निकल लो यहाँ से।

दूसरा ब्लोगर बोला-”यार, मैं तो मजाक कर रहा था। जैसे होली पर मूर्ख कवि सम्मेलन होता है उसमें भारी-भरकम कवि भी मूर्ख कहलाने को तैयार हो जाते हैं। वैसे ही मैं ब्लोगरों का सम्मेलन करना चाहता हूँ।तुम तो मजाक में कहीं बात का बुरा मान गए.”

इतने में गृहस्वामिनी चाय लेकर आ गए, साथ में प्लेट में बिस्किट भी थे।
दूसरा ब्लोगर बोला-”भाभीजी की मेहमाननवाजी का मैं कायल हूँ। बहुत समझदार हैं।
पहले ब्लोगर ने कहा-”हाँ, हम जैसे मूर्ख को संभाल रही हैं।”
दूसरा ब्लोगर ने कहा–”नहीं तुम भी बहुत समझदार हो। वर्ना इंटरनेट पर इतने सारे ब्लोग पर इतना लिख पाते। ”
वह चली गयी तो दूसरा ब्लोगर बोला-”देखो, तुम्हारी पत्नी के सामने तुम्हारी इज्जत रख ली।”
पहले ब्लोगर ने कहा–”मेरी कि अपनी। अगर तुम नहीं रखते तो अगली बार की चाय का इंतजाम कैसे होता।
दूसरे ब्लोगर ने कहा–”अब यह तो बताओं किस शहर में अधिक ब्लोगर हैं।
पहले ने कहा-”यहाँ कितने असली ब्लोगर हैं और कितने छद्म ब्लोगर पता कहाँ लगता है। ”
दूसरे ने कहा-”ठीक है मैं चलता हूँ। और हाँ इस ब्लोगर मीट पर एक रिपोर्ट जरूर लिख देना।तुम्हारे यहाँ आकर अगर कोई काम नहीं हुआ। मुझे मालुम था नहीं होगा पर सोचा चलो एक रिपोर्ट तो बन जायेगी।”
पहला ब्लोगर इससे पहले कुछ कहता, वह कप रखकर चला गया। गृहस्वामिनी अन्दर आयी और पूछा-”क्या बात हुई?”
पहले ब्लोगर ने कहा-”कह रहा था कि मूर्ख ब्लोगर लिखते हैं और समझदार पढ़ते हैं?”
गृहस्वामिनी ने पूछा-”इसका क्या मतलब?”
ब्लोगर कंधे उचकाते और हाथ फैलाते हुए कहा-”मैं खुद नहीं जानता। पर मैं उससे यह पूछना भूल गया कि इस ब्लोगर मीट पर हास्य कविता लिखनी है कि नहीं। अगली बार पूछ लूंगा।”

नोट-यह हास्य-व्यंग्य रचना काल्पनिक है और किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है. अगर किसी से मेल हो जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा. इसका रचयिता किसी दूसरे ब्लोबर से नहीं मिला है।

कुछ इधर-उधर की-आलेख


जब अपने ब्लोग पर कोई टिप्पणीनहीं होती तो एक निराशा मन में घर कर जाती है और ऐसा लगता है कि हम व्यर्थ ही लिख रहे हैं। अगर मुझे शुरू से ही टिप्पणियाँ नहीं मिली होती तब शायद इस बारे में नहीं सोचता और न लिखता। शुरू में जब मैंने लिखना शुरू किया तो मुझे यह मालुम भी नहीं था कि इस तरह टिप्पणियाँ मिलेंगी और मैं भी लिखूंगा। फिर जब टिप्पणियाँ आनी शुरू हुईं तो मुझे हिन्दी में लिखने का आईडिया भी नहीं था। बाद में ब्लोग स्पॉट पर टाईप कर दूसरेब्लोग पर टिप्पणियाँ करने लगा। शुरू में मैं केवल औपचारिक रूप से कमेंट रखता पर अब पूरा पढ़कर उसके अंशों पर टिप्पणियाँ करता हूँ। टिप्पणियों को लेकर मेरे अन्दर कोई दुराग्रह नहीं है। जिस ब्लोग को पढता हूँ और उससे अगर प्रभावित होता हूँ तो इस बात की परवाह नहीं करता कि उस ब्लोगर ने मुझे कभी टिप्पणी दी कि नहीं और आगे देगा कि नहीं। मैंने आत्ममंथन किया और पाया कि यह विचार अपने अन्दर एक प्रकार की कुंठा पैदा करता है और उससे अपना रचना कर्म प्रभावित होता है।
मैं बहुत लिखने वालों में हूँ इसलिए यह आशा तो बिलकुल नहीं करता कि मेरे मित्र मुझे हर लिखे पर टिप्पणी दें क्योंकि मेरा यहाँ उद्देश्य अपनी बात आम पाठक तक पहुँचना है। इसके बावजूद अपनी लिखी पोस्ट पर कमेन्ट आयेगी कि नहीं मुझे पता होता है। कुछ पोस्ट लिखते ही मुझे पता लग जाता है कि इस पर कोई टिप्पणी नहीं आयेगी क्योंकि वह भले ही मेरी दृष्टि से बहुत अच्छी और उसे पढ़ने वालों की संख्या भी कमनहीं होती परउसमें कुछ ऐसी विवादस्पद बातें होतीं है कि लोग उनसे टिप्पणी करने से बचते हैं । हाँ कुछ ऐसी कवितायेँ हास्य या गंभीर सन्देश का भाव से सराबोर होतीं हैं और उनको पोस्ट करते समय मुझे पता लग जाता है कि कोई न कोई टिप्पणी जरूर आयेगी। आखिर जब मैं किसी से प्रभावित होकर दूसरों को कमेन्ट देने में परवाह नहीं करता तो कई और लोग भी हैं जो इस बात के परवाह नहीं करते कि मैं उनको कमेन्ट देता हूँ किनहीं।
अब मैं अपने लिखे पर ही अधिक ध्यान देता हूँ कि वह पढ़ने वालों को प्रभावित कर सके। कई बार कुछ लोगों को कमेन्ट न मिलने के शिकायत होती है उन्हें एक बात मैं कहना चाहता हूँ कि वह इस बात की परवाह न करें क्योंकि कमेन्ट न आना इस बात का प्रमाण नहीं है कि लोग हमसे चिढे हुए हैं या उपेक्षा कर रहे हैं। इसका कारण पोस्ट का प्रभावपूर्ण न होना भी हो सकता है और दिन और समय भी। दिन के समय ब्लोगर कम ही सक्रिय दिखते हैंकभी तो ऐसा लगता है कि सुबह और शाम अधिक उपलब्ध होते हैं दूसरे शादी और क्रिकेट के दिनों और समय में भी उनके सक्रियता कम दिखती है। ऐसे में कमेन्ट लगाने वालों की संख्या कम हो जाती है।
आखिरी बात यह कि जिन लोगों को यह शिकायत है कि कमेन्ट कम मिल रहीं है उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि वह स्वयं कमेन्ट कितनी देते हैं। अगर उनको लगता है कि उनको कम पढा जा रहा है तो इसके लिए भी वह खुद ही जिम्मेदार हैं क्योंकि वह स्वयं भी ब्लोग को नहीं पढ़ रहे वरना उनको यह पता लगता कि यहाँ किस तरह के पाठक है और उनके प्रिय विषय क्या हैयहाँ एक बात समझ लेना चाहिऐ कि अधिकतर ब्लोगर उच्च शिक्षा प्राप्त हैं और हल्का-फुल्का लिखकर उनको प्रभावित नहीं कर सकते-भले ही कुछ लोगों को औपचारिक रूप से कमेन्ट देते हों। कुछ लोग दूसरों के ब्लोग अपने यहाँ दिखाते हैं। शीर्षक के साथ अपनी एक लाइन जोड़ देते हैं। उनको एक नहीं बारह कमेन्ट होते हैं पर जिनके ब्लोग वहाँ है उनको कोई देखता भी नहीं है। एक प्रतिष्ठत ब्लोग पर मेरे एक नहीं तीन ब्लोग के शीर्षक थे पर मेरे ब्लोग पर एक भी पाठक वहाँ से नहीं आया और उस पर पंद्रह कमेन्ट थे। मतलब यह कि जिस तरह कमेन्ट आना अच्छी रचना होने का प्रमाण नहीं है उसी तरह उसका न आना भी खराब होने का प्रमाण नहीं है। हाँ अगर बहुत अच्छी है तो कई लोग बिना हिचक कमेन्ट देंगे ही-यही सोचकर लिखता जाता हूँ। लिखना और कमेन्ट लेना-देना दो अलग विधाएं हैं अत: दोनों के बारे में अपना दृष्टिकोण अलग-अलग समय पर अलग रखना होगा। कमेन्ट लिखने के लिए हम जैसे खुद हैं वैसे ही सब हैं । हिन्दी लेखन के लिए यह एक अलग और नया विषय है और इसमें किसी से उम्मीद करने की बजाय हमें भी इसलिए लिए तैयार करना होगा। हाँ अपने लिखे पर अवश्य ध्यान दें क्योंकि यह आगे आम पाठक द्वारा भी पढा जाने वाला है अत: अपने विषय का चयन करते समय इस बात का ध्यान भी अवश्य रखें ।

पहले वह सुधरे


पहले कौन सुधरे? यहाँ हर कोई एक दूसरे से सुधर जाने की उम्मीद करता है पर कोई स्वयं सुधरना नहीं चाहता। सामने वाला सुधर जाये तो हम भी सुधर जाएं यही शर्त हर कोई लगाता है। बरसों से अनेक प्रकार से विश्व में सुधार वादी आन्दोलन चलते रहे हैं पर कोई सुधार कहीं परिलक्षित नहीं हो रहा है। लोगों को सुधारने के लिए अनेक पुस्तकें लिखीं गयीं हैं और वह इतनी बृहद रचनाएं हैं कि उन्हें कोई पढ़ना ही नहीं चाहता और इसलिए जो इनको पढ़ते हैं वह विद्वान् बन जाते हैं लोगों का मार्गदर्शन करते हुए वाह-वाही लूटते हैं। अपने हिसाब से उसकी व्याख्या कर लोगों को बताते हैं और लोग उनकी बात सुनकर खुश हो जाते हैं और मान लेते हैं कि उसमें यही लिखा होगा। ऐसी हालत में लोगों का सुधारने और मार्ग दर्शन का ठेका लेने वालों की हमेशा चांदी रही है। दिन-ब-दिन लोगों में नैतिक,वैचारिक और सामाजिक आचरण में गिरावट आयी है उसे देखकर यह कहा जा सकता है कि बिगाड़ अधिक आ रहा है।
ग्राहक कहता है कि व्यापारी सुधर जाये और अच्छी चीज दे और दाम भी सही बताये। व्यापारी कहता है कि ग्राहक सुधर जाये। जनता कहती है कि हमारे नेता सुधर जाये, और नेता कहते हैं कि लोग अपने आप में सुधार लायें क्योंकि वही तो सबको चुनती है और सही चुनाव करे तो हमें भी ऐसे लोग मिलेंगे तो हम सही काम करेंगे। गुरु कहे चेला सुधरे तो सही शिक्षा दें सकें और चेले कहते हैं कि गुरु अगर सही शिक्षा दे तो हम भटके ही क्यों?
पाकिस्तान की जनता कहे मुशर्रफ जाएं तो शांति हो और मुशर्रफ कहते हैं कि शांति हो मुझे जिन्दगी की गारंटी हो जाये तो में चला जाऊंगा। इराक़ में लोग कहें अमेरिका की सेना हमारे यहाँ से चली जाये तो हम खामोश हो जायेंगे और अमेरिका कहता हैकि पहले लोग खामोश हो जाएं तो हम अपनी सेना वहां से हटा लें। मतलब सुधार का कहीं से छोर पकड़ सकते हो पर उसे अपने हाथ में अधिक देर नहीं रख सकते। महात्मा गांधी ने कहा अहिंसक आन्दोलन के जरिये सब किले फतह कर सकते हैं पर जिनके हाथ में बंदूकें हैं वह कहते हैं है कि पहले किला फतह कर लें तो अहिंसक हो जायेंगे। अब भला किस्में साहस है कि उन्हें समझाए कि यही तो वक्त है गांधी जी के मार्ग का अनुसरण करने का। ऐसा इसलिए सब जगह हो रहा है कि लोग अपने धर्म ग्रंथों को नहीं पढ़ते और उनके पढे हुए तथाकथित विद्वानों की बात को सच मानते हैं। लोग कहते हैं कि टाइम नहीं है। वैसे टीवी देखने, अखबार पढ़ने और परनिंदा करने में लोग कितना समय नष्ट करते हैं पर धर्म ग्रंथों की बात करो तो कहेंगे उसमे क्या है पढ़ने को? वह तो बुढापे में पढेंगे। वह स्वयं नहीं पढ़ते तो बच्चों की रूचि भी नहीं होती। नतीजा सामने है। लोग बातें तो संस्कारों कें करते हैं पर वह कहाँ से आयें यह कोई नहीं बताता।
कोई कहता है कि ‘संस्कारवान बहू चाहिए’ तो कोई कहता है कि हमें ‘संस्कारवान दामाद चाहिए’। पहली तो यह बात कि संस्कार का क्या मतलब है? यह कोई स्पष्ट नहीं करता। दूसरे उनसे पूछों कि क्या तुमने अपने घर परिवार में संस्कार स्थापित करने का क्या प्रयास किया है?
लोग अपनी सफाई में कुछ कहते रहें पर यह वास्तविकता यह है कि लोग अपने घर में इंजीनियर, डाक्टर, और अफसर बनाने के कारखाने तो लगाना चाहते हैं पर कोई ‘संस्कारवान’ बनाने का प्रयास नहीं करते। सब एक दूसरे से यह आशा करते हैं कि वह सुधर जाये। ससुराल वाले कहें बहू और दामाद सुधर जाएं और वह कहें ससुराल वाले सुधर जाएं। पति कहे पत्नी सुधर कर सब सहती जाये और पत्नी कहे पति अपने आप में सुधार लाये और मूहं बंद और कान खोलकर हमारी पूरी बात सुनता जाये।
सुधार का कोई सिरा पकडो तो लोग शिकायतों का पुलिंदा थमा देते है, जिन्हें देखकर दिमाग चकरा जाये और सच्चे सुधारक तो अपने कान पकड़ लेते हैं शायद इसलिए सुधार लाना अब एक पेशा हो गया है। समाज में सुधार लाने के लिए तमाम लोग अपनी दूकान खोले बैठे हैं। नतीजा यह है कि कहीं भी बातें खूब होती हैं पर सुधार कहीं दिखाई नहीं देता।