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पाकिस्तान का यह 62 वर्ष पुराना सच है-आलेख


पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ जरदारी का कहना है कि पाकिस्तान तालिबान के विरुद्ध अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। एक बहुत बड़े भूभाग पर उसने कब्जा कर लिया और वहां उनकी नहीं चलती। यह एक कड़वा सच है पर एक प्रश्न है कि जिस भूभाग की वह बात कर रहे हैं उस पर वैसे भी पाकिस्तान का शासन तो हमेशा नाममात्र का रहा है। हां, यह अलग बात है कि पाकिस्तान के हुक्मरानों ने अपने स्वार्थ की खातिर वहां के लोगों को उन स्थानों पर फैलने की आजादी नहीं दी जहां वह नहीं पहुंचे थे। अपने सभ्य समाज पर नियंत्रण के लिये उन्हें वह उग्रपंथी बहुत पसंद आये पर वही अब उनके जीजान का संकट बन गये हैं। वैसे भी पाकिस्तान का सभ्य समाज भी कम गलतफहमियों में नहीं रहा। आजादी के बाद से वह संपूर्ण भारत पर कब्जा करने का ख्वाब सजाये उन्हीं कट्टरपंथी जमातों को पालता रहा जो आज उनको संकट का कारण दिखाई दे रही हैं। जब तक सेना का शासन रहता है यह उग्रपंथी खामोशी से अपना काम करते हैं जैसे ही लोकतांत्रिक शासन आता है वैसे ही उनकी आक्रामकता बढ़ जाती है क्योंकि उनको गैरहिंसक शासन पसंद नहीं आता।

भारतीय बुद्धिजीवियों, लेखकों और पत्रकारों का सोच कभी लाहौर से आगे गया ही नहीं। समय समय पर अनेक बुद्धिजीवियों और लेखकों के पाकिस्तान दौरे हुए-या यह कहना चाहिये कि लाहौर के दौरे ही हुए-वहां उन्होंने पाकिस्तान के बौद्धिक लोगांें से चर्चा की और यहां आकर सीमित दायरे में अपने विचार व्यक्त कर दिये। वह उस गहराई तक पहुंचे ही नहीं जहां उग्रपंथ हमेशा बैठा ही रहा। तालिबान और अलकायदा की उपस्थिति से पाकिस्तान के सीमाप्रांत और ब्लूचिस्तान में उग्रपंथ नहीं फैला बल्कि वहां मौजूद तत्वों का इन संगठनों ने फायदा उठाया। हां, उन्होंने इतना जरूर किया कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मौजूद सुविधाओं का उपयोग करने के लिये वहां अपना ठिकाना बनाया और उग्रपंथ वहां तक ले आये। बहुत कम लोग इस बात की चर्चा करते हैं कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लोग अपने देश के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। अपने उपेक्षा के कारण उनमें भारी असंतोष है और कुछ भारतीय सैन्य विशेषज्ञ कहते हैं कि वह तो एक रसगुल्ले की तरह चाहे जब पाकिस्तान से अलग कर दो।

असल बात यह है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में एक बहुत बड़े इलाके के लोगों में स्वाभाविक रूप से आक्रामकता है और अशिक्षा,गरीबी और पिछड़ापन उन्हें विकसित नहीं होने देता। पाकिस्तान की स्वात घाटी-जिसे उसका स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है-अब उग्रपंथियेां के हाथ में चली गयी है पर पाकिस्तान के हाथ में थी ही कब? अब वहां जिस तरह के स्वर सुनाई दे रहे हैं उससे पाकिस्तान का प्रबुद्ध समझ रहा है यह लगता नहीं है और वह अब भी भारत विरोध पर कायम है।

वहां के लोगों के बारे में भारत के बहुत कम लोग जानते हैं सिवाय इसके कि वहां के निवासी आक्रामक हैं-यदाकदा कुछ विद्वान इस बात की चर्चा जरूर करते हैं। हमारे देश में जो बुजुर्ग आजाद के समय वहां से पलायन कर यहां आये हैं वह अनेक प्रकार की कहानियां सुनाते हैं और उससे तो यही लगता है कि यह आतंकवाद वहां बहुत पहले से ही था। इस लेखक की एक ऐसे बुजुर्ग से चर्चा हुई जो वहां से 12 वर्ष की आयु में ही यहां आये थे और उनके जेहन में वहां की कुछ यादें बसी थीं-वह अपने पिता के साथ काबुल और कंधार तक घूम कर आये थे। जब अमेरिका ने पाकिस्तान पर हमला किया तब वह टीवी पर यह खबर देख कर हंसे थे और कहा था-‘वह चाहे कितना भी ताकतवर है पर उसे विजय नहीं मिलेगी। वह लोग मारता रहेगा पर दूसरे पैदा होते रहेंगे। अंग्रेजों ने लाख कोशिश कर ली पर वह डूरंड लाईन पार नहीं कर पाये तो अमेरिका भी वहां कामयाब नहीं हो पायेगा।’

वहां कबीलाई सरदारों का शासन है। बाकी लोग उनके गुलाम की तरह होते हैं। उनके परिश्रम और शक्ति के सहारे सरदार खूब धन संचय करते हैं और फिर अवसर मिल जाये तो दूसरों से हफ्ता या चंदा भी वसूल करते हैं। जब अफगानिस्तान में नार्दन अलायंस की सेना प्रवेश हुई थी तब पता लगा कि अनेक तालिबानी सरदारों ने पैसा लेकर पाला बदला था और वह उनके साथ हो गये थे। एक बार सत्ता बदली तो फिर वह अपने पुराने ढर्रे पर लौट गये। अगर पाकिस्तान को वहां अपना नियंत्रण स्थापित करना था तो उसे आधुनिक शिक्षा प्रणाली का वहां प्रचार करना था पर पाकिस्तान के स्वार्थी हुक्मरानों ने भारत विरोध के मुद्दे के सहारे ही अपना शासन चलना उचित समझा और बाकी अन्य प्रांतों को वह भूल गये। प्रबुद्ध वर्ग ने भी यही सोचा कि कबीलाई लोगों की आक्रमकता से वह युद्धों में विश्वविजेता बन जायेंगे।
मगर यह संकट गहरा है या फिर उसे बना दिया गया है। पाकिस्तान की सेना अभी इन आतंकवादियों से लड़ रही है पर जरदारी साहब स्वयं मान रहे हैं कि उग्रपंथियों के खिलाफ वह उतनी ही शक्तिशाली नहीं है। फिर इसका हल क्या है? अमेरिका बमबारी करता है तो पाकिस्तान उसका विरोध भी करता है और भारत से मदद लेने की बात आये तो वहां का प्रबुद्ध वर्ग हायतौबा मचा देता है जबकि संकट अब उसकी तरफ ही आने वाला है। मतलब यह है कि वहां का प्रबुद्ध वर्ग उग्रपंथ की चपेट में आने को तैयार है पर भारत से मित्रता उसे स्वीकार्य नहीं है। भारत में जाकर उनके लेखक,बुद्धिजीवी,गायक,अभिनेता,अभिनेत्रियां और अन्य कलाकार जाकर कमायें पर फिर भी मित्रता न बने यह उनका ध्येय है। भारत से मित्रता होते ही उनकी रचनात्मकता के आधार समाप्त हो जायेंगे। पाकिस्तान की शैक्षणिक पुस्तकोंं में भारत और हिंदू धर्म का विरोध पढ़ाया जाता है। भारत को वणिक देश मानते हुए वह कायर तो कहते हैं पर धन और व्यापार की ताकत को स्वीकार न कर वह शतुरमुर्ग की भूमिका अदा करना चाहते हैं।

प्रसंगवश कुछ लोग देश में कभी महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसक वारदातों पर इतने उत्तेजित होकर तालिबानी संस्कृति आने की चर्चा करते हैं। वह घोर अज्ञानी है वह जानते ही नहीं जिस तालिबानी संस्कृति की बात कह रहे हैं वह तो केवल नाम भर है पाकिस्तान और अफगानिस्तान में वह सदियों से है। भारत में कम से कम एक प्रबुद्ध वर्ग तो है जो कभी भी इन हिंसंक वारदातों पर पीडि़तों के साथ खड़ा होने का साहस करता है पर पाकिस्तान में यह संभव नहीं है। भारत में जिस तरह दहेज एक्ट का प्रयोग निर्दोष पुरुषों के विरुद्ध होने की शिकायतेंं हो रही हैं वैसे ही पाकिस्तान में महिलाओं के विरुद्ध वैश्यावृत्ति कानून के दुरुपयोग की बात कही जाती है।

पाकिस्तान में पंजाबी लाबी हमेशा ही हावी रही है। जरदारी सिंध के हैं और वह जानते हैं कि देश की सामाजिक स्थिति क्या है? इसके बावजूद वह दिखावे के लिये अखंड पाकिस्तान के लिये जूझ रहे हैं जिसका कभी अस्तित्व रहा ही नहीं। सबसे बड़ी बात यह है कि अपने प्रांत के प्रति उनके न्याय की जो अपेक्षा की जा रही है वह भारत से मित्रता के बिना संभव ही नहीं है। पाकिस्तान का सिंध प्रांत विदेशी और कबाइली आतंकियों का गढ़ बन गया है और वहां सिंध प्रांत के लोग उनको पसंद कम ही करते हैं मगर सेना, प्रशासन और अन्य राजनीतिक संस्थाओं में वहां के लोगों का प्रभाव बहुत कम है। वहां की पंजाबी लाबी अपने प्रांत को तो आतंक से मुक्त रखना चाहती है पर उनको इस बात की परवाह नहीं कि अन्य प्रांतों में क्या होगा? अखबारों जब पाकिस्तान के बारे में समाचार आते हैं तो कई तरह की विचित्रता दिखती है। कभी पाकिस्तान क्या कहता है कभी क्या? लाहौर तक ही सोचने वाले लोग केवल पाकिस्तान देखते हैं पर जो इससे आगे की जानकारी का ध्यान रखते हैं वह अच्छी तरह से समझते हैं कि यह सब वहां सक्रिय लाबियों के आपसी द्वंद्व का परिणाम है।
ऐसे में पाकिस्तान के प्रबुद्ध वर्ग को यह बात समझ लेना चाहिये कि वह आपसी द्वंद्व में उलझने और भारत से बैर रखने की नीति त्याग कर इस बात की फिक्र करें कि एक आसन्न संकट उनके सामने आने वाला है जिसमें उनकी आवाज ही बंद कर दी जायेगी। अभी तक उनको अपनी सरकारों से जो सुरक्षा मिलती आ रही थी वह कभी भी तालिबान के हाथ में जा सकती है। 62 साल से बना हुआ सच अब उनके राष्ट्रपति ने कहा इससे बाहर के लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता-उनके कबाइली लोग युद्धों में पाकिस्तान को युद्धों में विश्वविजेता नहीं बना सकतें इस बात को सभी समझ गये हैं-पर पाकिस्तान के प्रबुद्ध वर्ग को यह बात ध्यान रखना चाहिये कि इस बार यह आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है कि पाकिस्तान के एक बहुत बड़े इलाके में वहां का संविधान नहीं चलता।
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क्या टीवी और रेडियो के समाचार उदघोषकों को पत्रकार माना जा सकता है-आलेख


समाचार टीवी चैनलों पर काम करने वाले अनेक उद्षोषक स्वयं को टीवी पत्रकार कहकर प्रचारित करते हैं पर यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि वहां उनकी पत्रकार के रूप में क्या भूमिका होती है? जहां तक समाचार पत्र पत्रिकाओं का सवाल है तो वहां काम करने वाले सभी पत्रकार नहीं कहलाते। वहां कंपोजिंग करने वाले आपरेटर या प्रूफरीडर भले ही स्वयं को पत्रकार कहते हैं पर तकनीकी रूप से वहां काम करने वाले सदस्य उनको इस तरह का दर्जा नहीं देते। लगता है कि उद्घोषक शब्द में वजन कम होने से पत्रकार शब्द का लोग अधिक उपयोग कर रहे हैं।

पत्रकार से आशय यह है कि जो समाचार और संवाद का प्रेषण,संकलन और संपादन का कार्य करने के साथ उस पर अपना नजरिया रखने की विद्या से जुड़े होते हैंं। इनमें संवाद प्रेषण करने वाले को संवाददाता कहा जाता है कि न कि पत्रकार। पत्रकार सीधे रूप से समाचार के संकलन और संपादन के साथ ही उस पर अपना विचार लिखने का काम करता है। समाचार या संपादकीय लिखने के बाद उसकी भूमिका समाप्त हो जाती है और उसके बाद कंपोजीटर और प्रूफरीडर काम देखते हैं। यह अलग बात है कि आजकल कई जगह हाकर भी संवाददाता की भूमिका निभाते हैं और जो नहीं निभाते वह भी अपने को पत्रकार कहते हैं।

टीवी या रेडियो पर समाचार को सुनाना कोई सरल या सहज कम काम नहीं हैं। उसमें भी मेहनत और कौशल की आवश्कयता होती है। रेडियो पर जिन लोगों ने देवकीनंदन पाडे,इंदू वाही और अशोक वाजपेयी की आवाज में समाचार सुन चुका हो वह जानता है कि यह एक कला है जो हरेक को नहीं आती। इसके बावजूद वह कभी अपने को रेडियो पत्रकार नहीं कहते थे क्योंकि वह समाचार प्रेषण, संकलन और संपादन की विधा से जुड़े हुए नहीं थे। यह एक वास्तविक तथ्य है कि पत्रकार का काम केवल इन्हीं चार विधाओं तक ही सीमित है। उसके बाद पाठक या दर्शक तक समाचार तक पहुंचाने वाले लोग पत्रकार की श्रेणी में नहीं आते। हो सकता है कि कुछ लोग समाचारों के दौरान अपने स्वर या शब्दों से लोगों के जज्बातों को उभारने का काम करने पर यह दावा करें कि वह अपने विचार देकर वही काम करते हैं जो संपादक अपने समाचार पत्र-पत्रिका में संपादकीय लिखकर करता है तो वह भी जमता नहीं।
कहीं आग लगी है तो उसके डरावने का बयान या कहीं बाढ़ आयी तो उसके नुक्सान के दृश्य दिखाते हुए वीभत्सापूर्ण शब्द का उपयोग लोगों के मर्म छेदने को संपादकीय लेखन से नहीं जोड़ा जा सकता। संपादकीय लेखन में संपादक अपना दृष्टिकोण कई तरह के स्त्रोतों के आधार पर लिखा जाता है और उसमें किसी एक घटना विशेष के साथ अन्य घटनाओं को भी समावेश किया जाता है जबकि टीवी के समाचार उद्घोषकों के लिये यह संभव नहीं होता।

हो सकता है कि कुछ समाचार उद्घोषक समाचार और संपादन के विद्याओं से जुड़े हों पर अभी तक समाचार पत्र पत्रिकाओं में उनके बारे में जो जानकारी पढ़ने को मिलती है उसके आधार पर तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह कहीं पत्रकारिता जैसा कुछ कर रहे हों। यह उनके साक्षात्कारों के आधार पर ही कहा जा सकता है जिसमें वह उनके नाम के आगे टीवी पत्रकार शब्द जुड़ा होता है पर पढ़ने पर यह पता ही नहीं लगता कि वह समाचार लेखन,प्रेषण,संकलन,और संपादन से किसी रूप में जुड़े हैं। उससे तो यही पता लगता है कि वह समाचार वाचन से जुड़े हैं। हां, उनके द्वारा लिये गये साक्षात्कारों को पत्रकारिता का हिस्सा माना जा सकता है बशर्ते वह प्रश्न आदि स्वयं तैयार करने के साथ ही मौलिक रूप कल्पना कर कार्यक्रम बनाते होंं और साथ में उस पर रख गया नजरिया उनका अपना हो। वैसे टीवी उद्घोषकों को देखकर लगता नहीं कि वह इतनी मेहनत करते होंगे क्योंकि क्योंकि कैमरे के समक्ष उनके जो चेहरे पर ताजगी दिखती है। समाचार संकलन और संपादन का काम करने के बाद इतनी ताजगी रहना संभव नहीं है। फिर उनको मेकअप रूप में तैयार होने का समय भी नहीं मिल सकता।

अनेक सम्मानीय लोग काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा की खातिर कहते हैं कि समाचार टीवी चैनलों सहित सभी प्रचार माध्यमों में देर रात तक महिलाओं की ड्यूटी नहीं लगाना चाहिये। देश में हुई कुछ घटनाओं को देखते हुए वह ऐसा कहते हैं। उनका यह तर्क भी है कि खबर सुनने वाले तो केवल खबर की विषय सामग्री सुनना ही पसंद करते हैं इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन सुना रहा है? उस दिन एक सज्जन कह रहे थे कि इतने मधुर स्वर वाले उद्घोषकों की आवाज में समाचार सुने और उनमें पुरुष भी थे। अब वह नहीं हैं तो क्या रेडियो पर समाचार नहीं सुन रहे?

एक वरिष्ठ पत्रकार ने तो लिखा था कि पहले भी समाचार पत्रों में महिलायें काम करतीं थीं पर उनको शाम के बाद की ड्यूटी नहीं दी जाती थी। तब भी समय बुरा था तो आज तो और भी बुरा हो गया है तब भला क्यों महिलाओं की रात्रिकालीन ड्यूटी लगायी जाती है। वैसे इस मामले में किसी नियम बनाने की मांग की बजाय प्रबंधकों को स्वयं ही कोई आचार संहिता बनाना चाहिये।

हरेक के अपने अपने तर्क हैं। क्या कहा जा सकता हैं। दरअसल बात वहीं अटकती है कि कमाते तो सभी हैं पर व्यवसायिक दृष्टिकोण किसी किसी में होता है। हिंदी भाषा के लेखक भले ही कुछ न कमाते हों पर हिंदी भाषियों के मनोरंजन के नाम पर खूब कमाई है। प्रचार माध्यमों ने तय कर रखा है कि समाचार भी मनोरंजन की तरह परोसे जायें क्योंकि उनको अपनी सामग्री पर भरोसा नहीं है। इसलिये उनको लगता है कि सुंदर चेहरे देखकर ही कोई उनके समाचार सुनेगा। इसलिये आकर्षक चेहरे वाले पुरुष और महिलाओं को उद्घोषक बना देते हैं क्योंकि बाकी काम तो वहां के पत्रकारों को करना है। ऐसा लगता है कि टीवी के पत्रकार भी अपने को दोयम दर्जे का अनुभव करते हैं और यही कारण है कि टीवी समाचार अब समाचार कम मनोरंजन अधिक लगते हैं और जो लोग खबरें एक तरह से चाटने के आदी हैं उन्हें बहुत निराशा लगती है। बहुत लोग ऐसे हैं कि किसी अखबार के कोने में दबी रूस के साइबेरिया में बिल्ली द्वारा चूहा खा लेने की खबर को भी पढ़ना नहीं छोड़ते (यह बात एक मजाक की तरह कही जा रही है)। समाचार टीवी चैनल एक घंटे के कार्यक्रम में दस मिनट भी समाचार नहीं देते। बाकी पचास मिनट तो उनकों हास्य,फिल्म और क्रिकेट के लिये चाहिये।

ऐसे पढ़ाकूओं को अगर यह पता लग जाये कि कहीं ब्लाग भी लिखा जा रहा है तो हो सकता है कि टीवी चैनलों को देखना छोड़ यहां अपनी भंडास निकालने लगें। न आता हो तो कहीं से टाइपिंग भी सीख आयेंगे। हिंदी टाईप नहीं चलती तो रोमन से अंग्रेजी लिखकर ही हिंदी लिख लेंगे। गुस्सा तो यहां भी निकलेगा कि यार कोई हमारे पढ़ने लायक कोई लिखता क्यों नहीं! भला किसमें बूता है कि इतनी खबरें लिख सके-यह समझाना उनको कठिन है। इस लेख का उद्देश्य किसी प्रकार की आलोचना करना नहीं है क्योंकि जो उद्घोषक यह काम कर रहे हैं वह तो प्रशंसनीय हैं पर जो नहीं कर रहे तो यह पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि उद्घोषणा के काम में भी परिश्रम और कौशल की आवश्यकता होती है। बात केवल इतनी है कि क्या उनको पत्रकार माना जा सकता है?
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