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रहीम के दोहे:बन्दर कभी हाथी नहीं हो सकता


बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि
हरि हाथीं सौं कब हुतो, कहूं रहीम पहिचानि

कविवर रहीम कहते है इस संसार में बड़े लोग तो वह जो छोट आदमी की पीड़ा सुनकर उस पर दया करते हैं, परंतु बंदर कभी हाथी नहीं हो सकता-कुछ लोग बंदर की तरह उछलकूद कर दया दिखाते हैं पर करते कुछ नहीं। वह कभी हाथी नहीं हो सकते।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आजकल बच्चों, विकलांगों, महिलाओं और तमाम के तरह की बीमारियों के मरीजों की सहायतार्थ संगीत कार्यक्रम, क्रिकेट मैच तथा अन्य मनोरंजक कार्यक्रम होते हैं-जो कि मदद के नाम पर दिखावे से अधिक कुछ नहीं है। यह तो केवल बंदर की तरह उछलकूद होती है। ऐसे व्यवसायिक कार्यक्रम तो तमाम तरह के आर्थिक लाभ के लिये किये जाते हैं। जो सच्चे समाज सेवी हैं वह बिना किसी उद्देश्य के लोगों की मदद करते है, और वह प्रचार से परे अपना काम वैसे ही किये जाते हैं जैसे हाथी अपनी राह पर बिना किसी की परवाह किये चलता जाता है।

समझदार लोग तो सब जानते हैं पर कुछ बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा का नाटक करने वालों को देखकर इस कटु सत्य को भूल जाते है। कई लोग ऐसे कार्यक्रमों की टिकिट यह सोचकर खरीद लेते हैं कि वह इस तरह दान भी करेंगे और मनोरंजन भी कर लेंगे। उन्हें यह भ्रम तोड़ लेना चाहिये कि वह दान कर रहे हैं क्योंकि सुपात्र को ही दिया दान फलीभूत होता है। अतः हमें अपने बीच एसे लोग की पहचान कर लेना चाहिए जो इस तरह समाज सेवा का नाटक करते है। इनसे तो दूर रहना ही बेहतर है।

रहीम के दोहःगुरु से शिक्षा लेकर अपनी राह चलें


कहते को कहिं जान दे, गुरू की सीख तू लेय
साकट जन और स्वान को, फेरि जवाब न देय

कविवर रहीम कहते है कि कहने वालों को कुछ भी कहने दो अपने गुरू की सीख लें और फिर अपने मार्ग पर चलें। अज्ञानी लोग और श्वान के भौंकने पर ध्यान न दें

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों का काम है कहना। सच तो यह है कि अपने जीवन में वह लोग कोई भी उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाते जो जो इस तरह कहने पर ध्यान देकर कोई कदम नहीं उठाते। अपने गुरू से चाहे वह आध्यात्मिक हो या सांसरिक ज्ञान देने वाला उसे शिक्षा ग्रहण कर अपने जीवन पथ पर बेखटके चल देना चाहिए। अगर उसके बाद अगर किसी के कहने पर ध्यान देते हैं तो अकारण व्यवधान पैदा होगा और अपने मार्ग पर चलने में विलंब करने से हानि भी हो सकती है। एक बात मान कर चलिए यहां ज्ञान बघारने वालों की कमी नहीं है। ऐसे लोग जिन्हें किसी भक्ति या सांसरिक क्षेत्र का खास ज्ञान नहीं होता वह खालीपीली अपनी सलाहें देते हैं और अपने अनुभव भी ऐसे बताते हैं जो उनके खुद नहीं बल्कि किसी अन्य व्यक्ति ने उनको सुनाये होते हैं।

इतना ही नहीं जब अपने माग पर चलेंगे तो दस लोग टोकेंगे। आपके कार्यो की मीनमेख निकालेंगे और तमाम तरह के भय दिखाऐंगे। इन सबकी परवाह मत करो और चलते जाओ। यही जीवन का नियम है। हम देख सकते हैं जो लोग अपने जीवन में सफल हुए हैं उन्होंने अन्य लोगों की क्या अपने लोगों भी परवाह नहीं की। जिन्होनें परवाह की ऐसे असंख्य लोगों को हम अपने आसपास देख सकते हैं।

यह इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति-पत्रिका’ पर प्रकाशित है। यह व्याख्या मौलिक है तथा इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।

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इसके अन्य वेब पृष्ट हैं
1. शब्दलेख सारथी
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

रहीम के दोहे:मेंढक आवाज देते हों तो कोयल हो जाती है खामोश


पावस देखि रहीम मन, कोइन साधे मौन
अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछत कोय

कविवर रहीम कहते है कि वर्षा ऋतु आते ही मेंढको की आवाज चारों तरफ गूंजने लगती है तब कोयल यह सोचकर खामोश हो जाती है कि उसकी आवाज कौन सुनेगा।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अक्सर हम देश में संगीत, साहित्य, खेल और अन्य कला क्षेत्रों में प्रतिभाओं की कमी की शिकायत करते हैं। यह केवल हमारा भ्रम है। 105 करोड़ लोगों के इस देश में एक से एक प्रतिभाशाली लोग हैं। एक से एक ऊर्जावान और ज्ञानवान लोग हैं। भारतभूमि तो सदैव अलौकिक और आसाधारण लोगों की जननी रही है। हां, आजकल हर क्षेत्र व्यवसायिक हो गया है। जो बिकता है वही दिखता है। इसलिये जो चाटुकारिता के साथ व्यवसायिक कौशल में दक्ष हैं या जिनका कोई गाडफादर होता है वही चमकते हैं और यकीनन वह अपने क्षेत्र में मेंढक की तरह टर्राने वाले होते हैं। थोड़ा सीख लिया और चल पड़े उसे बाजार में बेचने जहां माया की बरसात हो। जो अपने क्षेत्रों में प्रतिभाशाली हैं और जिन्होंने अपनी विधा हासिल करने के लिये अपनी पूरी शक्ति और बुद्धि झोंक दी और उनकी प्रतिभा निर्विवाद है वह कोयल की तरह माया की वर्षा में आवाज नहीं देते-मतलब वह किसी के घर जाकर रोजगार की याचना नहीं करते और आजकल तो मायावी लोग किसी को अपने सामने कुछ समझते ही नहीं और उनको तो मेंढक की टर्राने वाले लोग ही भाते हैं।

कई बार देखा होगा आपने कि फिल्म और संगीत के क्षेत्र में देश में प्रतिभाओं की कमी की बात कुछ उसके कथित अनुभवी और समझदार लोग करते हैं पर उनको यह पता ही नहीं कि कोयल और मेंढक की आवाज में अंतर होता है। एक बार उनको माया के जाल से दूर खड़े होकर देखना चाहिए कि देश में कहां कहां प्रतिभाएं और उनका उपयोग कैसा है तब समझ में आयेगा। मगर बात फिर वही होती है कि वह भी स्वयं मेंढक की तरह टर्रटर्राने वाले लोग हैं वह क्या जाने कि प्रतिभाएं किस मेहनत और मशक्कत से बनती हैं। वैसे बेहतर भी यही है कि अपने अंदर कोई गुण हो तो उसे गाने से कोई लाभ नहीं है। एक दिन सबके पास समय आता है। आखिर बरसात बंद होती है और फिर कोयल के गुनगनाने का समय भी आता है। उसी तरह प्रकृति का नियम है कि वह सभी को एक बार अवसर अवश्य देती है और इसीलिये कोई कोयल की तरह प्रतिभाशाली है तो उसे मेंढक की तरह टर्रटर्राने की आवश्यकता नहीं है और वह ऐसा कर भी नहीं सकते। हमें प्रतिभाशालियों का इसलिये सम्मान और प्रशंसा करना चाहिए कि स्वभावगतः रूप से दूसरे की चाटुकारिता करने का अवगुण नहीं होता।

Rahim’s couplets: arrogance of the small man’s testimony


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1.Rahim says that big man who is suffering more days, it can not hide its prosperity because people have seen a decline in tolerance when his life is his grief to the people it takes to address it. So two out of elephant teeth come because he could not tolerate their hunger.

2.Rahim says that the big man his mouth sometimes do not boast their own people while the small show of arrogance. Like the first gooseberry mustard small but appears like a small mustard jackfruit ever is missing.

In the context of the current interpretation – is said that such a wealthy person does not show arrogance as the newly rich show. It appears that they are already naturally rich in the society honours is the newly wealthy are deprived of it because his deeds to his mastery of his deeds, and to use the property as a way to Others have not.

However, the big man is considered to be the same as that which best practice in the interest of society. In addition, he helps others. The heart of the same people who respect their work comes on the money, rank and power from rich people to get respect is to mock him and he is satisfied they are in arrogance. Today, all that money and place the condition of society are sitting on top of what the people of the dwarf character. He is not eligible to sit on top of that illusory when he sits on are, they have the arrogance of his power is. The people of character and integrity of the business, is the arrogance they do not go anywhere access to their properties because they are coming because even though there is respected everywhere.

रहीम के दोहे:पुरषार्थ करना अपने हाथ में परिणाम नहीं


जेहि रहीम तन मन लियो, कियों हिए बिच भीन
तासों दुख सुख कहन की, रही बात अब कौन

कवि रहीम का कथन है कि जिस व्यक्ति ने तन मन पर अधिकार कर लिया है, उसने हृदय में स्थान बना लिया है, ऐसे प्रेमी से दुख, सुख कहने की अब कौन सी बात शेष रह गयी .

निज कर क्रिया रहीम कहीं, सुधि भावी के हाथ
पाँसे अपने हाथ में, दांव न अपने हाथ

कवि रहीम कहते हैं कि अपने हाथ में तो कर्म करना है परिणाम भविष्य के गर्भ में है जैसे जुआरी के हाथ में खेल के पाँसे कौडी तो अपने हाथ में होते हैं, परन्तु दाव अपने वश में नहीं होता.

रहीम के दोहे:मूर्खों के सभा में विद्वान अधिक नहीं ठहरते


मूढ़ मंडली में सुजन, ठहरत नहीं बिसेषि
स्याम कचन में सेत ज्यों, दूर कीजिअत देखि

कविवर रहीम कहते हैं की जैसे काले केशों में कोई सफ़ेद बाल देखकर उसे निकल देता है, उसी प्रकार मूर्खों की सभा में चतुर पुरुष बहुत समय तक नहीं रुक पाता.

जद्यपि अवनि अनेक सुख, तोव तासु रसताल
सतत तुलसी मानसर, तदपि न तजहिं मराल

कविवर रहीम कहते हैं की धरती पर अनेक सुख है और सरोवर स्वच्छ जल से भरे हुए हैं तथापि हंस मानसरोवर को नहीं त्यागते.

होहिं बडे लघु समय सह, तो लघु सकहिं न काढि
चन्द्र दूबरो कूबरी, तऊ देखत तें बाढि

कविवर रहीम कहते हैं की बडे व्यक्ति बुरे समय को भी सहन करते हैं। वह उनकी महानता को कम नहीं करता। दूज का चन्द्रमा कुबड़ा होता है, किन्तु देखते-देखे बढ़ता जाता है।

जैसी जाकी बुद्धि है, तैसी कहै बनाय
ताकों बुरो न मानिए, लें कहाँ सो जाय

संत शिरोमणि रहीम कहते हैं कि जिस मनुष्य की जैसी बुद्धि होती है, वह उसके अनुरूप ही कार्य करता है, उस व्यक्ति का बुरा मत मानिए क्योंकि वह और अधिक बुद्धि कहाँ से लेने जाएगा।