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आंसु और मुस्कान-हिन्दी कविता (ansu aur muskan-hindi kavita)न


आंसुओ को आँखों से बाहर
आने से रोके रहे,
चाहे रोने के आते कितने भी मौके
हंसकर देते उनको धोखे रहे,
गैरों के हमलों की क्या शिकायत करते
अपनों के हाथ ही
हमारी खुशियों का गला घौंटे रहे।
————-
ज़मीन के सौदे हो जाते हैं
इंसानों के बीच
कागज पर नाम बदल जाते हैं।
खड़ी रहती है वह अपनी जगह
फसलों की जगह
पत्थर उसे बनाते अपनी पहचान की वजह,
इंसान मरकर
इतिहास के कागजों में चले जाते
अपनी स्वामिनी ज़मीन स्वयं है
नाम के मालिक तो
नाम के लिये आते और जाते हैं।
————–
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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भ्रष्टाचार पर दो हिन्दी क्षणिकाऐ (two short poem on bhratshtachar)


भ्रष्टाचार वह राक्षस है
जो शायद हवा में रहता है।
बड़े बड़े नैतिक योद्धा उसे पकड़कर
मारने के लिये तलवारें लहराते हैं,
पर वह अमर है
क्योंकि उससे मिली कमीशन से
भरी जेब का बोझ नहीं सह पाते हैं,
चल रहा है उसका खेल
हर कोई भले ही
‘उसे पकड़े और मारो’ की बात कहता है
———–
पहले जेबों में रहता था
अब खातों में चमकने लगा है।
भ्रष्टाचार के पहले रूप दिखते थे
पर अब बैंकों में अनाम नाम से रहने लगा है।
————-

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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गद्दार अपना शिकार चुन रहा हो-हिन्दी शायरी (gaddar aur shikar-hindi shayari)


अपनी कमीज़ वह दूसरे से
अधिक उजियारी जरूर करेंगे,
दौलत के साबुन से अपनी
छवि चमकाने की कोशिश में
चरित्र पर दाग भले ही लग जाये
मगर ज़माने में
अपनी गरीब छवि वह दूर करेंगे।
———-
देशभक्ति की बात करते हुए
अब सभी को डर लगता है
क्योंकि पता नहीं कब और
कौन गद्दार सुन रहा हो,
बिक रहे हैं पहरेदार सरेआम
बचाने निकले जब हम देश को
नज़र न पड़ जाये किसी गद्दार की
लिये ईमानदारी की शपथ जो
अपना शिकार चुन रहा हो।
———–

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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शब्दलेख पत्रिका ब्लाग ने पार की एक लाख पाठक संख्या पार-हिन्दी संपादकीय (A Hindi blog shabdlekh patrika)


इस इस लेखक के ब्लाग शब्दलेख पत्रिका  ने भी आज एक लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार कर ली। गूगल पेज रैकिंग में चार अंक प्राप्त तथा एक लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार करने वाला इस लेखक का यह पांचवां ब्लाग है। यह संख्या कोई अधिक मायने रखती क्योंकि हिन्दी भाषियों की संख्या को देखते हुए लगभग तीन वर्ष में इतनी संख्या पार करना कोई अधिक महत्व का नहीं है। न ही इस संख्या को देखते हुए ऐसा कहा जा सकता है कि हिन्दी ने अंतर्जाल पर कोई कीर्तिमान बनाया है पर अगर कोई स्वतंत्र, मौलिक तथा शौकिया लेखक है तो उसके लिये यह एक छोटी उपलब्धि मानी जा सकती है। इस लेखक के अनेक ब्लाग हैं पर इससे पूर्व के चार ब्लाग बहुत पहले ही इस संख्या को पार कर चुके हैं पर कोई ऐसा ब्लाग नहीं है जो अभी एक दिन में हजार की संख्या पार कर चुका है अलबत्ता सभी ब्लाग पर मिलाकर 2500 से तीन हजार तक पाठक/पाठ पठन संख्या पार हो जाती है।
प्रारंभ में इस ब्लाग को अन्य ब्लाग से अधिक बढ़त मिली थी पर बाद में अपने ही साथी ब्लाग की वजह से इसे पिछड़ना भी पड़ा। इसकी वजह यह थी कि इस लेखक ने वर्डप्रेस की बजाय ब्लाग स्पॉट के ब्लाग पर ही अधिक ध्यान दिया जबकि वास्तविकता यह है कि वर्डप्रेस के ब्लाग ही अधिक चल रहे हैं। कभी कभी लगता है कि वर्डप्रेस के ब्लाग पर लिखा जाये पर मुश्किल यह है कि ब्लाग स्पॉट के ब्लाग कुछ अधिक आकर्षक हैं दूसरे उन पर अपने पाठ रखने में अधिक कठिनाई नहीं होती इसलिये उन पर पाठ रखना अधिक सुविधाजनक लगता है। चूंकि यह लेखक शौकिया है और यहां लिखने से कोई धन नहीं मिलता इसलिये अंतर्जाल पर निरंतर लिखने के लिये मनोबल बनाये रखना कठिन होता है। दूसरी बात यह है कि पाठक संख्या में घनात्मक वृद्धि अधिक प्रेरणा नहीं देती। इसके लिये जरूरी है कि गुणात्मक वृद्धि होना। एक बात निश्चित है कि देश में ढेर सारे इंटरनेट कनेक्शन हैं पर उनमें हिन्दी के प्रति सद्भाव अधिक नहीं दिखता है। संभव है कि अभी इंटरनेट पर अच्छे लिखने को नहीं मिलता हो।
दूसरी बात यह है कि दृश्यव्य, श्रव्य तथा प्रकाशन माध्यम अपनी तयशुदा नीति के तहत ब्लाग लेखकों के यहां से विषय लेते हैं पर उनके नाम का उल्लेख करने की बजाय उनके रचनाकार अपना नाम करते हैं।
दूसरी बात यह कि अंतर्जाल पर फिल्मी अभिनेता, अभिनेत्रियां, खिलाड़ी तथा अन्य प्रसिद्ध हस्तियों के ब्लाग है और उनका प्रचार इस तरह होता है जैसे कि लिखना अब केवल बड़े लोगों का काम रह गया है।
एक सुपर स्टार के घर के बाहर से मैट्रो ट्रेन निकलने वाली है। निकलने वाली क्या, अभी तो चंद विशेषज्ञ उनके घर के सामने थोड़ा बहुत निरीक्षण करते दिखे। अभी योजना बनेगी। पता नहीं कितने बरस में पटरी बिछेगी। उस सुपर स्टार की आयु पैंसठ से ऊपर है और संभव है कि पटरियां बिछने में बीस साल और लग जायें। संभव है सुपर स्टार कहीं अन्यत्र मकान बना लें। कहने का अभिप्राय है कि अभी जंगल में मोर नाचने वाला नहीं पर उन्होंने अपनी निजी जिंदगी में दखल पर अपने ब्लाग पर लिख दिया। सारे प्रचार माध्यमों ने उस पर चिल्लपों मचाई। तत्काल उन सुपर स्टार ने ट्विटर पर अपना स्पष्टीकरण दिया कि ‘हम मैट्रों के विरोधी नहीं है। मैं तो केवल अपनी बात ऐसे ही रख रहा था।’
वह ट्विटर भी प्रचार माध्यामों में चर्चित हुआ। इससे संदेश यही जाता है कि इंटरनेट केवल बड़े लोगों का भौंपू है। ऐसे में आम लेखक के लिये अपनी पहचान का संकट बन जाता है। वह चाहे कितना भी लिखे पर उससे पहले यह पूछा जाता है कि ‘तुम हो क्या?’
किसी आम लेखक की निजी जिंदगी उतनी ही उतार चढ़ाव भरी होती है जितनी कि अन्य आम लोगों की। मगर वह फिर भी लिखता है पर अपनी व्यथा को भी तभी कागज पर लाता है जब वह समग्र समाज की लगती है वरना वह उससे जूझते हुए भी उसका उल्लेख नहीं करता। लेखक कभी बड़ा या छोटा नहीं होता मगर अब उसमें खास और आम का अंतर दिखाई देता है और यह सब ब्लाग पर भी दिखाई देता है।
आखिरी बात यह है कि जो वास्तव में लेखक है वह अपने निज अस्तित्व से विचलित नहीं होता और न पहचान के लिये तरसता है क्योंकि समाज की चेतना जहां विलुप्त हो गयी है वहां समस्या पाठक बढ़ाने की नहीं है बल्कि जो हैं उनसे ही निरंतर संवाद बनाये रखना है। जब लेखक लिखता है तब वह अध्यात्म के अधिक निकट होता है और ऐसे में समाज से जुड़ा उसका निज अस्तित्व गौण हो जाता है और अंदर तक पहुंचने वाला लेखन तभी संभव हो पाता है। इस अवसर पर मित्र ब्लाग लेखकों और पाठकों का आभार।
————

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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इश्क पर हास्य कविता-हिन्दी काव्य प्रस्तुति (ishq par hasya kavita-hindi comic poem)


पुरानी प्रेमिका मिली अपने
पुराने प्रेमी कवि से बहुत दिनों बाद
और बोली,
‘कहो क्या हाल हैं,
तुम्हारी कविताओं की कैसी चाल है,
सुना है तुम मेरी याद में
विरह गीत लिखते थे,
तुम पर सड़े टमाटर और फिंकते थे,
अच्छा हुआ तुमसे शादी नहीं की
वरना पछताती,
कितना बुरा होता जब बेस्वादी चटनी से
बुरे आमलेट ही जीवन बिताती,
तुम भी दुःखी दिखते हो
क्या बात है,
पिचक गये तुम्हारे दोनों गाल हैं,
मेरी याद में विरह गीत लिखते तुम्हारा
इतना बुरा क्यों हाल है।’
सुनकर कवि बोला
‘तुमसे विरह होना अच्छा ही रहा था,
उस पर मेरा हर शेर हर मंच पर बहा था,
मगर अब समय बदल गया है,
कन्या भ्रुण हत्याओं ने कर दिया संकट खड़ा,
लड़कियों की हो गयी कमी
हर नवयुवक इश्क की तलाश में परेशन है बड़ा,
जिनकी जेब भरी हुई है
वह कई जगह साथ एक जगह जुगाड़ लगाते हैं,
जिनके पास नहीं है खर्च करने को
वह केवल आहें भर कर रह जाते हैं,
विरह गीतों का भी हाल बुरा है,
हर कोई सफल कवि हास्य से जुड़ा है,
इश्क हो गयी है बाज़ार में बिकने की चीज,
पैसा है तो करने में लगता है लज़ीज,
एक से विरह हो जाने से कौन रोता है,
दौलत पर इश्क यूं ही फिदा होता है,
दिल से नहीं होते इश्क कि टूटने पर कोई हैरान हो,
कल दूसरे से टांका भिड़ जाता है
फिर क्यों कोई विरह गीत सुनने के लिये परेशान हो,
जिन्होंने बस आहें भरी हैं
उनको भी इश्क पर हास्य कविता
सुनने में मजा आता है,
आशिक माशुकाओं का खिल्ली उड़ाने में
उनका दिल खिल जाता है,
कन्या भ्रुण हत्याओं ने कर दिया कचड़ा समाज का,
इश्क पर फिल्में बने या गीत लिखे जा रहे ज्यादा
मगर तरस रहा इसके लिये आम लड़का आज का,
तुम्हारे विरह का दर्द तो अभी अंदर है
मगर उस पर छाया अब हास्य रस का जाल है।
———–

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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रुपयों से लिया जा रहा है हंटर का काम-हास्य कविताएँ (rupya aur hunter-hasya kavitaen)


जैसे जैसी बढ़ी महंगाई
नैतिकता की कीमत नीचे आई,
अपनी भूख से बढ़कर
इंसान की कोई जरूरत नहीं है
यह बात किसी अर्थविज्ञानी के समझ नहीं आई।
———–
बेकाबू हो रहा बाज़ार
सौदागर हो गये बेलगाम,
दौलतमंद के घरों पर
बिक रही है ज़माने को
काबू करने की ताकत
रुपयों से लिया जा रहा हंटर का काम।
———
जिनके पेट भरे हैं
भुखमरी पर सबसे अधिक वही रोते हैं,
अपने जज़्बात के दाम वसूल कर
फिर घोड़े बेचकर सोते हैं।
———–

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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मजदूर दिवस-श्रमिकों के साथ सम्माजनक व्यवहार करें (mazdoor divas, diwas or may day-a special hindi article


भारत में मजदूर दिवस मनाने की कोई परंपरा नहीं है, अलबत्ता यहां विश्वकर्मा जयंती मानी जाती है जिसे करीब करीब इसी तरह का ही माना जा सकता है। यह पाश्चात्य सभ्यता द्वारा प्रदाय अधिकतर दिवसों को खारिज करता है यथा माता दिवस, पिता दिवस, मैत्री दिवस, प्र्रेम दिवस तथा नारी दिवस। मजदूर दिवस भी पश्चिम से ही आयातित विचारधारा से जुड़ा है पर इसे मनाने का समर्थन करना चाहिये।  दरअसल इसे तो बहुत शिद्दत से मनाना चाहिए। 
आधुनिक युग में कार्ल मार्क्स को मजदूरों का मसीहा कहा जाता है। उनके नाम पर मजदूर दिवस मनाया जाता है तो इसमें मजदूर या श्रम शब्द जुड़ा होने से संवेदनायें स्वभाविक रूप जाग्रत हो उठती हैं।  एक बात याद रखिये आज  भारत में जो हम नैतिक, अध्यात्म, तथा तथा देशप्रेम की भावना का अभाव लोगों में देख रहे हैं वह शारीरिक श्रम को निकृष्ट मानने की वजह से है।  हर कोई सफेद कालर वाली नौकरी चाहता है और शारीरिक श्रम करने से शरीर में से  पसीना निकलने से घबड़ा रहे हैं।  भारतीय तथा पाश्चात्य दोनों की प्रकार के  स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि शरीर को जितना चलायेंगे उतना ही स्वस्थ रहेगा तथा जितना सुविधाभोगी बनेंगे उतनी ही तकलीफ होगी। 
सबसे बड़ी बात यह है कि गरीब और श्रमिक को तो एक तरह से मुख्यधारा से अलग मान लिया गया है।  संगठित प्रचार माध्यमो में-टीवी चैनल, रेडियो तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं-इस तरह के प्रसारण तथा प्रकाशन देखने को मिलते हैं जैसे कि श्रम करना एक तरह से घटिया लोगों का काम है।  संगठित प्रचार माध्यमों को इसके लिये दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह आधुनिक बाज़ार के विज्ञापनों पर ही अपना साम्राज्य खड़े किये हैं। यह बाजार सुविधाभोगी पदार्थों का निर्माता तथा विक्रेता है। स्थिति यह है कि फिल्म और टीवी चैनलों के अधिकतर कथानक अमीर घरानों पर आधारित होते हैं जिसमें नायक तथा नायिकाओं को मालिक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है।  उनमें नौकर के पात्र भी होते हैं पर नगण्य भूमिका में। क्हीं नायक या नायिका मज़दूर या नौकर की भूमिका में दिखते हैं तो उनका पहनावा अमीर जेसा ही होता है।  फिर अगर नायक या नायिका का पात्र मजदूर या नौकर है तो कहानी के अंत में वह अमीर बन ही जाता है।  जबकि जीवन में यह सच नज़र नहीं आता।  ऐसे अनेक उदाहरण समाज में  देखे जा सकते हैं कि जो मजदूर रहे तो उनके बच्चे भी मज़दूर बने।  आम आदमी इस सच्चाई के साथ जीता भी है कि उसकी स्थिति में गुणात्मक विकास भाग्य से ही आता है
कार्ल मार्क्स मजदूरों का मसीहा मानने पर विवाद हो सकता है पर पर देश के बुद्धिमान लोगों को अब इस बात के प्रयास करना चाहिये कि हमारी आने वाली पीढ़ी में श्रम के प्रति रूझान बढ़े। यहां श्रम से हमारा स्पष्ट आशय अकुशल श्रम से है-जिसे छोटा काम भी कहा जा सकता है। कुशल श्रम से आशय इंजीनियरिंग, चिकित्सकीय तथा लिपिकीय सेवाओं से है जिनको करने के लिये आजकल हर कोई लालायित है।  इसी अकुशल श्रम को सम्मान की तरह देखने का प्रयास करना चाहिये।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने पास या साथ काम करने वाले श्रमजीवी को कभी असम्मानित या हेय दृष्टि से नहीं देखना चाहिये। मनुष्य मन की यह कमजोरी है कि वह धन न होते हुूए भी सम्मान चाहता है।  दूसरी बात यह है कि श्रमजीवी मजदूरों के प्रति असम्माजनक व्यवहार से उनमें असंतोष और विद्रोह पनपता है जो कालांतर में समाज के लिये खतरनाक होता है।  यही श्रमजीवी और मजदूरी ही धर्म की रक्षा में प्रत्यक्ष सहायक होता है। यही कारण है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में सभी को समान दृष्टि से देखने की बात कही जाती है।    इस विषय पर दो वर्ष पूर्व एक लेख यहां प्रस्तुत है। इसी लेख को कल सैकंड़ों पाठकों द्वारा देखने का प्रयास किया इसलिये इसे इस पाठ के नीचे भी प्रस्तुत किया जा रहा है।

आज मजदूर दिवस है और कई जगह मजदूरों के झुंड एकत्रित कर रैलियाँ निकालीं जायेंगी। ऐसा नहीं है कि हमारे दर्शन में मजदूरों के लिए कोई सन्देश नहीं है पर उसमें मनुष्य में वर्गवाद के वह मन्त्र नहीं है जो समाज में संघर्ष को प्रेरित करते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन द्वारा प्रवर्तित जीवनशैली पर दृष्टिपात करें तो उसमें पूंजीपति मजदूर और गरीब अमीर को आपस में सामंजस्य स्थापित करने का सन्देश है। भारत में एक समय संगठित और अनुशासित समाज था जो कालांतर में बिखर गया। इस समाज में अमीर और गरीब में कोई सामाजिक तौर से कोई अन्तर नहीं था।
न द्वेष्टयकुशर्ल कर्म कुशले नातुषज्जजते।
त्यागी सत्तसमाष्टिी मेघावी छिन्नसंशयः।।
“जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्वगुण से युक्त पुरुष संशय रहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है।”

श्रीमदभागवत गीता के १८वे अध्याय के दसवें श्लोक में उस असली समाजवादी विचारधारा की ओर संकेत किया गया है जो हमारे देश के लिए उपयुक्त है । जैसा कि सभी जानते हैं कि हमारे इस ज्ञान सहित विज्ञानं से सुसज्जित ग्रंथ में कोई भी संदेश विस्तार से नहीं दिया क्योंकि ज्ञान के मूल तत्व सूक्ष्म होते हैं और उन पर विस्तार करने पर भ्रम की स्थिति निमित हो जाती है, जैसा कि अन्य विचारधाराओं के साथ होता है। श्री मद्भागवत गीता में अनेक जगह हेतु रहित दया का भी संदेश दिया गया है जिसमें अपने अधीनस्थ और निकटस्थ व्यक्तियों की सदैव सहायता करने के प्रेरित किया गया है।
स्वै स्वै कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः।
सव्कर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।
अपने अपने स्वाभाविक कार्ये में तत्परता से लगा मनुष्य भक्ति प्राप्त करते हुए उसमें सिद्धि प्राप्त लेता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परम सिद्धि प्राप्त करता है उस विधि को सुन।

यतः प्रवृत्तिभूंतानां वेन सर्वमिद्र ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।
जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्तपति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।

श्रीमदभागवत गीता में ऊपर लिखे श्लोक को देखें तो यह साफ लगता है अकुशल श्रम से आशय मजदूर के कार्य से ही है । आशय साफ है कि अगर आप शरीर से श्रम करे हैं तो उसे छोटा न समझें और अगर कोई कर रहा है तो उसे भी सम्मान दे। यह मजदूरों के लिए संदेश भी है तो पूंजीपतियों के लिए भी है ।
श्री गीता में ही हेतु रहित दया का सन्देश तो स्पष्ट रुप से धनिक वर्ग के लोगों के लिए ही कहा गया है-ताकि समाज में समरसता का भाव बना रहे। कार्ल मार्क्स एक बहुत बडे अर्थशास्त्री माने जाते है जिन के विचारों पर गरीबों और शोषितों के लिए अनेक विचारधाराओं का निर्माण हुआ और जिनका नारा था “दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ”।
शुरू में नये नारों के चलते लोग इसमें बह गये पर अब लोगों को लगने लगा है कि अमीर आदमी भी कोई ग़ैर नहीं वह भी इस समाज का हिस्सा है-और जो उनके खिलाफ उकसाते हैं वही उसने हाथ भी मिलाते हैं । जब आप किसी व्यक्ति या उनके समूह को किसी विशेष संज्ञा से पुकारते हैं तो उसे बाकी लोगों से अलग करते हैं तो कहीं न कहीं समाज में विघटन के बीज बोते हैं।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रीगीता में अपने स्वाभाविक कर्मों में अरुचि न दिखाने का संदेश दिया गया है। सीधा आशय यह है कि कोई भी काम छोटा नहीं है और न तो अपने काम को छोटा और न किसी भी छोटा काम करने वाले व्यक्ति को हेय समझना चाहिये। ऐसा करना बुद्धिमान व्यक्ति का काम नहीं करना चाहियैं। कई बार एसा होता है कि अनेक धनी लोग किसी गरीब व्यक्ति को हेय समझ कर उसकी उपेक्षा करते हैं-यह तामस प्रवृत्ति है। उसी तरह किसी की मजदूरी कम देना या उसका अपमान केवल इसलिये करना कि वह गरीब है, अपराध और पाप है। हमेशा दूसरे के गुणों और व्यवहार के आधार पर उसकी कोटि तय करना चाहिये।
भारतीय समाज में व्यक्ति की भूमिका उसके गुणों, कर्म और व्यक्तित्व के आधार पर तय होती है उसके व्यवसाय और आर्थिक शक्ति पर नहीं। अगर ऐसा नहीं होता तो संत शिरोमणि श्री कबीरदास, श्री रैदास तथा अन्य अनेक ऎसी विभूतियाँ हैं जिनके पास कोई आर्थिक आधार नहीं था पर वे आज हिंदू विचारधारा के आधार स्तम्भ माने जाते हैं।
कुल मिलाकर हमारे देश में अपनी विचारधाराएँ और व्यक्तित्व रहे हैं जिन्होंने इस समाज को एकजुट रखने में अपना योगदान दिया है और इसीलिये वर्गसंघर्ष के भाव को यहां कभी भी लोगों के मन में स्थान नहीं मिल पाया-जो गरीबो और शोषितों के उद्धार के लिए बनी विचारधाराओं का मूल तत्व है। परिश्रम करने वालों ने रूखी सूखी खाकर भगवान का भजन कर अपना जीवन गुजारा तो सेठ लोगों ने स्वयं चिकनी चुपडी खाई तो घी और सोने के दान किये और धार्मिक स्थानों पर धर्म शालाएं बनवाईं । मतलब समाज कल्याण को कोई अलग विषय न मानकर एक सामान्य दायित्व माना गया-बल्कि इसे मनुष्य समुदाय के लिए एक धर्म माना गया वह अपने से कमजोर व्यक्ति की सहायता करे। आज के दिन अकुशल काम करने वाले मजदूरों के लिए एक ही संदेश मैं देना चाहता हूँ कि अपने को हेय न समझो । सेठ साहूकारों और पूंजीपतियों के लिए भी यह कहने में कोइ संकोच नहीं है अपने साथ जुडे मजदूरों और कर्मचारियों पर हेतु रहित दया करें ।

—————————————-
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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सोचने पर उठता है दिल में तूफान-हिन्दी शायरी (dil ka toofan-hindi shayri)


खून दूसरे का बहे
दर्द किसे होता है,
टूटते हैं जिनके घर
उनकर ही दिल रोता है।

अब तो किसी से हमदर्दी
जताते हुए भी डर लगता है
क्योंकि यहां हर हमदर्द भी
शक के दायरे में होता है।

जो बसे है ऊंचे शानदार महलों में
कौन नज़र डाले, उनके किले के फलों में
सड़कों में बहे खून, वह क्यों करेंगे परवाह
उनकी नज़र में, पैदल आदमी मवाद होता है।

सूख गये रोते कराहते हुए आंखों के आंसु
किसी का खून बह जाय,े
या दर्द सड़क पर टपक आये,
सोचने पर उठता है दिल में तूफान
इसलिये दिमाग लंबी तानकर सोता है।
———
अभी उनका खून बहा है
कमजोरों ने सारा दर्द सहा है
यह न समझना, तुम बच जाओगे।
पीठ पीछे वार करने वालों से
पीठ फेरने वालो,
उनके निशानों की तारीफ कर इतराने वालों
एक दिन खंजर की जद में तुम भी आओगे।
———–

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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अपना अपना दाव-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (apna apna daav-hindi satire poem)


अंधों की तरह रेवड़ियां बांटने का
चलन अब आंख वालों में भी हो गया है।
कहीं पुजते दौलतमंद
कहीं सजते ऊंचे ओहदे वाले
कहीं जमते बाजुओं में दम वाले
तो कहीं उनके चाटुकार चमकते हैं
लोगों के हैं अपने अपने दाव
उजले नकाब पहनने पर हैं आमदा
क्योंकि चरित्र सभी का खो गया है।
——–
सम्मान बेचने वाले ने
एक कवि से कहा
‘कुछ जेब ढीली करो तो
हमसे सम्मान पाओ।
आजकल सब बिकता है बाजार में
शब्दों से खाली वाह वाह मिलती है,
कविता कागज पर लिखकर
पैसा खर्च करने की बजाय
हमारी जेब में पहुंचाओ।
कुछ अपना कुछ हमारा सम्मान बढ़ाओ।’
कवि ने कहा
‘पैसा होता तो कवितायें क्यों लिखता,
अभाव न होते तो कवि कैसे दिखता,
सम्मान खरीदने की ताकत होती
तो कवितायें भी खरीद कर लाता,
सम्मान के लिये सजाता,
फिर तुम जैसे तुच्छ प्राणी की
शरण क्यों कर लेता,
किसी बड़े आदमी पर चढ़ाता दाम
जो बड़ा ही सम्मान देता।
तुम सम्मान के छोटे सौदागर हो
अपने सम्मान को बड़ा न बताओ।
गली मोहल्ले के कवियों पर
अपना दाव लगाने से अच्छा है
अपना प्रस्ताव कविता के बाजार में
कवियों जैसे दिखने वालों को समझाओ।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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तीन श्वान शिशु-आलेख (three child of dog-hindi article)


उसे कई बार समझा चुका था कि ‘ घर से बाहर आते जाते समय मेरे स्कूटर से दूर रहे, वरना कुचला जायेगा।’

आज सुबह भी उससे कहा-‘मान जा प्यारे,  मुझे डर लगता है कि कहीं आगे पीछे करते हुए मेरे स्कूटर के पहिये के नीचे न आ जाये। भाग यहां से।’

कई बार श्रीमती जी उसे हटातीं तो कई बार मैं उसके हटने के इंतजार में खड़ा रहता, मगर यह सावधानी इस मायने ही काम आयी कि उस श्वान शिशु की मृत्यु हमारे स्कूटर से नहीं हुई। आज शाम को घर पहुंचा तो अकेला भूरे रंग का जीवित शिशु घर के अंदर दरवाजे पर पड़ा था। उसे अनेक बार हट हट किया पर वह लापरहवा दिखा। इससे पहले उससे कुछ कहता श्रीमती जी ने बताया कि ‘इसके साथ वाला पिल्ला घर के सामने से ही गुजर रही एक स्कूल बस के नीचे आ गया।

सुबह का मंजर याद आया जब वह मासूम हमारी झिड़की सुनकर स्कूटर से दूर हट कर रास्ता दे रहा था।

उस अकेले भूरे जीवित शिशु को देखा। उसकी माता भी बाहर सो रही थी।  पता नहीं दरवाजे पर पहुंचते ही उन दोनों के अनमने पन का अहसास कैसे हो गया।’ घर के दरवाजे के अंदर बैठा भूरा शिशु बड़ी मुश्किल से दूर हटा जबकि पहले तेजी से हटता था।

जीवन की अपनी धारा है।  लोग सोचते हैं कि जीवन केवल मनुष्य के लिये ही है जबकि पशु, पक्षी तथा अन्य जीव जंतु भी इसे जीते हैं।

हमारे पोर्च में लगा लोहे का दरवाजा किसी भी पशु के लिये दुर्लंघ्य हैं।  उसमें लगी लोहे की एक छड़ का निचला हिस्से का जोड़ टूट गया है। कई दिनों से  की सोची पर इतने छोटे काम के लिये मशीन लाने वाला नहीं मिल पाया है।  यह काम करने पर जोर इसलिये भी नहीं दिया क्योंकि उससे कुछ खास समस्या नहीं रही।

जब सर्दियों का जोर तेजी से प्रारंभ हुआ तब एक रात दरवाजा बजने की आवाज सुनकर हम पति पत्नी बाहर निकले।  दरवाजे पर सो रही मादा श्वान के अलावा कोई  दिखाई नहीं दिया।  तब पोर्च में ही रखे तख्त और दरवाजे के बीच  में खाली पड़े  कोने पर नजर पड़ी तो वहां से तीन श्वान शिशु एक दूसरे पर पड़े हुए  कातर भाव से हमारी तरफ देख रहे थे।

सर्दी बहुत तेज थी।  उनका जन्म संभवत दस से बीस दिन के बीच का रहा होगा-शायद पच्चीस दिन भी।  ठंड से कांपते हुए उन श्वान शिशुओं ने जीवन की तलाश दरवाजे की सींखचों के बीच किया होगा जो टूटी हुई छड़ ने उनको प्रदान किया।

हमारा एक प्रिय श्वान चार वर्ष पहले सिधार गया था।  उसके बाद हमने किसी श्वान को न पालने का फैसला किया। मगर यह जीवन है इसमें फैसले बदलते रहते हैं।  हमने तय किया कि इनमें से किसी को पालेंगे नहीं पर पूरी सर्दी भर इनको यहां आने से रोकेंगे भी नहीं।  हमने एक पुरानी चादर ली और उस कोने में डाल दी ताकि शिशु उस परसो सकें-एक बात याद रखें श्वान को ऊपर से सर्दी नहीं लगती बल्कि पेट पर ही लगती है क्योंकि वह बाल नहीं होते।  

श्वान शिशुओं ने सुबह पोर्च को गंदा कर दिया, गुस्सा आया पर फिर भी सर्दियों में उनको आसरा देने का फैसला बदला नहीं।  तीनों शिशुओं में एक भूरा था दो अन्य के शरीर पर भूरे पर की कहीं धारियां थी पर थे काले रंग के। बच्चे इतनी आयु के थे कि वह मां के दूध पीने के साथ ही ठोस पदार्थ भी ले रहे थे। उनको हम ही नहीं हमारे पड़ौसी भी कुछ न कुछ खाने को देते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि मोहल्ले की साझा जिम्मेदारी बन गयी थी तीनों की सेवा। दिन में वह बाहर मां के साथ घूमते और रात के उसी रास्ते से अंदर आते और जाते।  शाम को  हमारे वापस आने पर अंदर स्कूटर दाखिल होने  पर परेशानी आती फिर भी उनको बाहर नहीं निकालते। तीसरे दिन एक काला श्वान शिशु घिसटता हुआ आया। उसकी कमर पर किसी ने प्रहार किया था।  तब  पास रहने वाले एक ही डाक्टर से गोलियां लेकर उसे दूध में पिलायी तब वह ठीक हुआ।  हालांकि भूरा शिशु उसे पीने नहीं दे रहा था। इसलिये उसे भगाने के लिये भी प्रयास करना पड़ा।

चौथे दिन छत पर योग साधना करने के पश्चात् हमने पास ही खाली पड़े प्लाट पर झांका तो मादा श्वान अपने उसी शिशु के साथ सो रही थी। श्रीमतीजी ने गौर से देखा और कहा -‘ऐसा लग रहा है कि यह काला वाला मर गया।’

हमने कहा-‘नहीं, हो सकता है कि सो रहा हो।’

शाम को पता लगा कि मादा श्वान शिशु उसी काले शिशु का शव खा रही थी। मोहल्ले के लोगों ने उससे छुड़ाकर किसी मजदूर से कहकर उसे दूर फिंकवा दिया।  हमने श्रीमती जी से कहा-‘यकीनन वह बच्चा खा नहीं रही होगी बल्कि उसे जगाने का प्रयास कर रही होगी। श्वान को काम करने के लिये बस मुंह ही तो है। हो सकता है कि मादा श्वान को लगता हो कि इस तरह नौंचने यह जाग जायेगा। वह बिचारी क्या जाने कि यह मर गया है?’

पंद्रह दिन हो गये।  इधर सर्दी भी कम हो गयी। चादर हमने दरवाजे के बाहर  ही डाल दी। फिर भी जीवित दोनों शिशु अंदर आते जाते रहे।  काला शिशु हमेशा ही भूरे से कमजोर रहा।  अब तो ऐसा लगता था कि जैसे कि दोनों की उम्र में भी अंतर हो।  अनेक बार  पपड़ी या अन्य चीज काले शिशु के मुंह से भूरे रंग वाला छीन लेता था।  काले वाले को कुछ देकर उसके खिलाने के लिये भूरे वाले को भगाने का प्रयास भी करना पड़ता था।

पोर्च के बाद वाले दरवाजे कभी खुले होते तो कमरे में सबसे अधिक काला शिशु ही आता था।  एक बार तो वह कंप्यूटर कक्ष तक आ गया था। आज स्कूटर निकालने के लिये दरवाजा खोला और थोड़ी देर अंदर आया तो वह घुस आया। उसे चिल्लाकर भगाया।  उसका भागना याद आता है

शाम को वह भूरा शिशु ही शेष रह गया।  दरअसल काले शिशु जीवन जीना तो चाहते थे पर किसी से छीनकर नहीं जबकि यह भूरा शिशु आक्रामक है।

जब काले शिशु की मौत हुई तो आसपास की महिलाओं को भारी तकलीफ हुई क्योंकि यही जीव का स्वभाव है कि जो उसके पास रहता है उसके प्रति मन में मोह आ ही जाता है।  पास पड़ौस के लोगों ने उसे भी कहीं दूर फिंकवाने का इंतजाम किया। साथ के कपड़ा और नमक भी उसे दफनाने के लिये दिया गया।  हमेशा ही आक्रामक रहने वाला भूरा शिशु कुछ उदास दिख रहा है। वह शायद लंबा जीवन जियेगा। संभवतः तीन  शिशु कुदरत ने इसलिये ही  साथ भेजे क्योंकि सर्दी में एक दूसरे के सहारे वह जी सकें।  भूरा शिशु हमेशा ही दोनों अन्य शिशुओं के ऊपर सोता था। दोनों काले शिशुओं में भूरे की अपेक्षा  आक्रामकता का नितांत अभाव दिखता था।  ऐसा लगता था कि वह काले शिशु केवल भूरे के जीवन का मार्ग प्रशस्त करने के लिये ही आये हैं। अब भूरे शिशु को शायद गर्मी के आवश्यकता नहीं रही और कुदरत ने उसे भेजा गया सामान वापस ले लिया। 

हमने उसे पालने का फैसला नहीं किया पर कौन जानता है कि आगे क्या होगा। उस भूरे शिशु की आंखों में उदासी का भाव देखकर सोचता हूं कि अब उसे किस पर डाटूंगा क्योकि वह खाने के लिये अकेला बचा है और अपनी मां को दी गयी चीज उससे छीनता नहीं है।  दोनों दरवाजा खोलने पर हमारी तरफ देखते हैं तब लगता है कि उनकी आंखों में  उसी काले शिशू के बाहर होने की आशा झांक रही है। उनको लगता है कि वह अंदर कहीं घुस गया है और निकलेगा जैसे कि पहले डांटने पर हमेशा ही भाग कर निकलता था।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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प्रसिद्ध लोगों का कथन कितना सार्थक-हिन्दी लेख (famous parson of hindi and hindi blog-hindi article)


इस देश में कई ऐसे महान लेखक हैं कि अगर हम स्वयं लेखक न हों तो उनका नाम नहीं जानते होते। इतना ही नहीं समाचार पत्र पत्रिकाओं में कई लेख भी न पढ़ें अगर हमारे अंदर पढ़कर लिखने का जज़्बा न हो। कहने का अभिप्राय यह है कि आम भारतीय अखबार केवल समाचारों की वजह से पढ़ता है उसमें भी स्थानीय समाचारों के छपने की अपेक्षा के साथ-अंदर के लेख तो बहुत कम लोग पढ़ते हैं। इस देश में अनेक समाचार पत्रों ने अनेक ऐसे लेखकों को महान बनाया है जो समसामयिक विषयों पर हल्का फुल्का ही लिख पाते है। इनमें से अनेक महान लोग अनेक ऐसी संस्थाओं के प्रमुख भी बन जाते हैं जो इस देश की फिल्मों, टीवी चैनलों तथा साहित्य का मार्ग दर्शन करती है और उनके कथन बड़े महत्व के साथ समाचार पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनलों तथा रेडियो पर उद्धृत किये जाते हैं।
ऐसे ही अनेक लेखक तथा अन्य विचारक हिन्दी ब्लाग जगत के नकारात्मक पक्षों को उभार कर यह साबित कर रहे हैं कि वहां के लेखक सामान्य स्तर के हैं-या कहें कि संपादक के पत्र लिखने तक की औकात रखते हैं। वह ब्लाग जगत के आपसी विवादों को बाहर भयानक कहकर प्रचारित कर रहे हैं क्योंकि वह स्वयं ही सीमित ब्लाग देखते हैं-वैसे ऐसे बड़े लोग स्वयं नहीं देखते होंगे जब तक चेला चपाटा कंप्यूटर खोलकर न दिखाये। हिन्दी ब्लाग जगत के बहुत कम लेखक इन लोगों की मानसिकता को जानते हैं वह भी पूरी तरह उसे उजागर करने का समय नहीं निकालते।
यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि अंतर्जाल के माध्यम से हिन्दी आधुनिक काल-इसे अब उत्तरोतर काल भी कह सकते हैं-से निकलकर वैश्विक काल में प्रवेश कर चुकी है और इसमें वह लेखक अपना अस्तित्व ढूंढ रहे हैं जो अपने लिखे से कम अपनी चालाकियों और संबंधों की वजह से प्रसिद्ध हुए हैं। कंप्यूटर पर स्वयं टंकित करना या किसी से दूसरे को मोहताज होने में वह अपनी हेठी समझते हैं-इस पर तकनीकी फंडा भी है कि उनको पहले कंप्यूटर गुरु ढूंढना होगा और उसकी जीहुजूरी करनी होगी। ऐसे शब्दों के खिलाड़ी हिन्दी ब्लाग जगत के बारे में जानना तो चाहते हैं पर इसके लिये उनको सहयोगी चाहिये और इससे उनके अंदर यह आशंका बलवती होती होगी कि वह किसी दूसरे लेखक को महत्व देते हुए दिख रहे हैं। सच बात तो यह है कि हिन्दी ब्लाग जगत एक व्यापक रूप धारण करता जा रहा है। अभी तक हिन्दी के उत्तरोतर काल के लेखक संगठित प्रचार माध्यमों-समाचार/साहित्य पत्र पत्रिकाऐं, टीवी चैनल और रेडियो के साथ व्यवसायिक प्रकाशन उद्योग-के सहारे प्रसिद्धि के शिखर पर हैं। एक तरह से वह बाजार की ताकत के सहारे हैं। वह उनको हर जगह मंच उपलब्ध कराता है और इनकी शक्ति इतनी अधिक है कि वह अपने ही चेलों को भी एक सीमा तक आगे ले आते हैं-अन्य किसी व्यक्ति का सामने आना उनको मंजूर नहीं है। हिन्दी ब्लाग जगत में भी बाजार सक्रिय होगा पर पर फिर भी असंगठित क्षेत्र के ब्लाग लेखक उनके बस में नहीं होंगे-सीधा आशय यह है कि हिन्दी ब्लाग जगत हमेशा ही संागठनिक ढांचों की पकड़ से बाहर रहेगा। ऐसे में बेहतर लिखने वाले किसी की परवाह नहीं करेंगे तब हमारे यह उत्तरोत्तर कालीन महान लेखक अपनी गुरुता किसे दिखायेंगे? यह खौफ अनेक विद्वानों में हैं और चाहे जब हिन्दी ब्लाग जगत पर कुछ भी प्रतिकूल टिप्पणी करने लगते हैं।
इनकी दूसरी मुश्किल यह भी है कि देश को कोई भी ब्लाग लेखक बिना सांगठनिक ढांचों की सहायता के अपनी बात अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा रहा है। ब्लाग पर लिखा अनुवाद कर दूसरी भाषाओं के लोग भी पढ़ते हैं। हिन्दी के लेखक अंग्रेजी तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में पढ़े जा रहे हैं। उनको कितने पाठक पढ़ रहे हैं यह अभी विवादों के घेरे में लगता है। कभी कभी तो लगता है कि लोग अधिक पढ़ रहे हैं पर काउंटर कम व्यूज दिखा रहा है और अधिक दिखते हैं तो यह भी शक होता है कि कहीं से फर्जी व्यूजा नहीं है। एक जगह से भेजा गया व्यूज दूसरी जगह नहंी दिखता। कहीं दिख रहा है तो वह मूल स्थान पर नहीं दिखता। महत्वपूर्ण यह है कि हिन्दी ब्लाग जगत के बेहतर पाठ निरंतर पाठक जुटा रहे हैं तो सामयिक पाठ भी।
अक्सर लोग कहते हैं कि अखबार लाखों लोग पढ़ते हैं। सच है पर कितने लोग पूरा पढ़ते हैं और कितने याद रखते हैं यह भी एक विचार का विषय है। यह ब्लाग तो चलते फिरते अखबार और किताबें हैं और इससे कम लोग पढ़ते हैं यह सच है पर आगे भी पढ़ जाते रहेंगे न कि किसी अल्मारी में बंद होंगे। हिन्दी ब्लाग जगत में जो नये लेखक हैं उनको यह गलतफहमी नहीं रखना चाहिये कि अधिक स्तर पर छपना ही बड़े लेखक होने का प्रमाण है। वह इन बड़े लेखकों के नाम सुनते होंगे पर इनकी कोई रचना उनकी स्मृति में नहीं होगी। एक भाषाविद् की तरह अपने शब्दों में अधिक से अधिक कठिन शब्द लिखना या लंबे वाक्य घुमा फिराकर कहने से कोई बड़ा लेखक नहीं हो जाता। एक ही घटना पर साल भर लिखना से विद्वता प्रमाणित नहीं होती। यहां तक कि उपन्यास लिखने से भी कोई महान नहीं हो जाता। अगर आपकी कोई एक रचना भी बेहतर निकल आये तो वह आपकी याद सदियों तक रख सकती है-‘उसने कहा था’ कहानी की तरह जो गुलेरी साहब ने लिखी थी। आधुनिक हिन्दी के महान साहित्यकार प्रेमचंद,जयशंकर प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्र कुमारी चैहान और सूर्यकांत त्रिपाठी जैसे महान लेखक अब यहां नहीं होते क्योंकि लोग थोड़ा लिखकर सुविधाओं की पीछे भागते हैं-इसी प्रयास में ही वह लिखना भी शुरु करते हैं और उनके शब्द बहुत गहराई तक छूते नहीं लगते।
हमने यह तो सुना है कि अच्छा पढ़े बिना अच्छा नहीं लिख सकते। साथ ही यह भी चालीस लाईनें पढ़ेंगे तब एक लाईन लिख पायेंगे। अंतर्जाल पर आकर इस बात की सच्चाई भी देख ली। अनेक बड़े लेखकों ने ब्लाग बनाये हैं पर उनका लिखा देखकर यही लगता है कि वह पढ़ते बिल्कुल नहीं हैं। छात्र जीवन के बाद उन्होंने शायद ही पढ़ने को अधिक महत्व दिया है। उनका लेखन सतही लगता है।
एक जगह पर हम दो दिन रुके थे वहां अंतर्जाल की सुविधा एक बालिका उपयेाग करती थी। वह अंतर्जाल पर सौंदर्य सामग्री से संबंधित विषय अंग्रेजी में पढ़ रही थी। उसने अंतर्जाल पर हिन्दी के न होने की बात कही तो हमने अपना लेखकीय परिचय न देते हुए उसे ब्लागवाणी तथा चिट्ठाजगत का पता दिया इस जानकारी के साथ कि वहां हिन्दी के ढेर सारे ब्लाग पढ़ने को मिलते हैं। हमने उसे अपने ब्लाग का परिचय इसलिये नहीं दिया क्योंकि उनके कुछ हास्य कवितायें थी जिन पर उपहास बन सकता था।
अगले दिन फिर उसके घर जाना हुआ। वह चिट्ठाजगत खोले बैठी थी और उसने मस्ती कालम के द्वारा हमारा ब्लाग पकड़ लिया था। इसी लेखक का ब्लाग दिखाते हुए कहा-‘इस कविता से मेरी चिढ़ छूट रही है।’
हमने वह कविता देखी तो कह दिया कि ‘यह तो बेकार लेखक लग रहा है।’
वह लड़की प्रतिवाद करते हुए दूसरी कविता दिखाते बोली-‘नहीं, इसकी यह कविता बहुत अच्छी है।’
उसने तीन कविताओं को ठीक और दो को बहुत अच्छा और एक को चिढ़ाने वाली बताया। सबसे बड़ी बात तो यह कि उसने एक अन्य ब्लाग लेखक के लेख तारीफ की‘इसका यह दो लेख बहुत अच्छे हैे। तीसरा यह ठीक लगता है।’
हमने दोनों लेखकों की तुलना पूछी तो उसका जवाब था कि ‘दोनों अलग अलग तरह के हैं पर ठीक लिखते हैं। दूसरे लोग भी ठीक लगे पर इन दोनों को ज्यादा पढ़ा। दूसरे लोग के भी ब्लाग देखे पर उनमें कुछ ही ठीक हैं और बाकी का तो समझ में नहीं आया।’
उसने जिस दूसरे ब्लागर की खुलकर तारीफ की उसका नाम लिखेंगे तो लोग कहेंगे कि चमचागिरी कर रहा है पर उस ब्लागर का मत भी वही है कि अधिक पढ़ो तभी लिख पाओगे। वह ब्लाग जगत में बहुत लोकप्रिय है और यकीनन उसका स्तर अनेक मशहूर लेखकों से अच्छा है। वह ब्लागर भी सांगठनिक ढांचे के प्रकाशनों से त्रस्त रहा है और यह ठीक है कि उसे बहुत लोग नहीं पढ़ते होंगे पर वह इस हिन्दी ब्लाग जगत को ऐसी रचनायें देगा जो अविस्मरणीय होंगी। उस बालिका के मुख से उस ब्लागर की प्रशंसा ने हमारे इस मत को पुष्ट किया कि बड़े लेखक भले ही मशहुर हैं पर पढ़ते नहीं है और इसलिये उनके चिंतन सतही हो जाते हैं जबकि स्वतंत्र और मौलिक ब्लागर जो सब तरफ पढ़कर और फिर अपने चिंतन के साथ यहां पाठ-कहानियां, व्यंग्य, आलेख और कवितायें रखेगा उसके सामने बड़े बड़े लेखक पानी भरते नज़र आयेंगे। अंतर्जाल पर वैश्विक काल की हिन्दी अनेक बेजोड़ लेखक ला सकती है जो गागर में सागर भरेंगे।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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चंद्रयान-1 की चंद्रमा पर पानी की खोज-इसे कहते हैं सच्ची कामयाबी (chandrayan-1-Discovery of water on the moon – this is called a true success)


भारतीय चंद्रयान-1 ने चंद्रमा की सतह पर पानी की खोज की है-इसकी पुष्टि नासा ने कर दी है। चंद्रयान-एक में ‘मून मिलरोलाॅजी मैपर’ (मैप-3) लगाया गया था जिसे नासा ने लगाया था। इसके साथ ही अब चंद्रयान-2 में ऐसे यंत्र लगाये जा रहे हैं जो वह पानी उठाकर यहां लायेंगे। भारतीय विश्लेशणों ने विश्व में पहले से प्रचलित इन वैज्ञानिक धारणाओं को खंडित कर दिया है कि चंद्रमा सूखा है।
भारतीय वैज्ञानिकों ने यह करिश्मा करके विश्व में यह साबित कर दिया है कि ‘हम भी किसी से कम नहीं’। साथ ही यह भी अब जाहिर होता जा रहा है कि भारतीय वैज्ञानिक संस्था इसरो और अमेरिका की नासा मिलकर काम कर रही हैं और यह संबंध दोनों की मित्रता को मजबूत कर रहा है। हालांकि भारत और अमेरिका के आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों की चर्चा अक्सर होती है पर अंतरिक्ष और विज्ञान के क्षेत्र में जो यह मैत्री है वह दोनों के बीच एक प्रगाढ़ता को ठोस आधार प्रदान कर रही है-भारत के विरोधी भले ही अन्य बातों का बहाना करते हों पर उनके चिढ़ने की यह भी एक खास वजह है। इतना ही नहीं भारत में भी अमेरिका के विरोधी उससे अधिक मैत्रीपूर्ण संबंध रखने का विरोध करते हुए अन्य विषयों की चर्चा करते हैं पर उनके दिमाग में यही अतंरिक्ष विज्ञान संबंध होता है जिसको डर के मारे वह कहते नहीं हैं।
अतंरिक्ष विज्ञान में भारत का भविष्य उज्जवल है और यकीनन अनेक देश अपने देश के उपग्रह भेजने के लिये भारत से सहयोग प्राप्त करने के लिये तैयारी कर रहे होंगे। मुख्य समस्या पाकिस्तान और चीन के सामने हैं। पाकिस्तान के लिये तो यह संभव ही नहीं है कि वह भारत के सामने किसी भी स्तर पर सहयोग की याचना करे तो चीन के रणनीतिकारों के दिमाग में यह बात भरी हुई है कि हम अपनी श्रेष्ठता के साथ भारतीय प्रतिभाओं का दोहन करें। साफ्टवेयर क्षेत्र चूंकि निजी है इसलिये चीन वहां से मदद ले रहा है पर अंतरिक्ष विज्ञान में सहायता लेने का मतलब होगा कि वह राजनीतिक रूप से भारत के सामने झुके क्योंकि अंतरिक्ष क्षेत्र सरकारी है। भारत निजी क्षेत्रों से चीन को मिलने वाली सहायता तो नहीं रोक सकता पर जब तक चीन अपनी हेठी नहीं छोड़ेगा तब तक उसे अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग की अपेक्षा करनी ही नहीं चाहिए। चीन के विज्ञान क्षेत्र में प्रगति की चर्चा खूब होती है पर उसकी विश्व को कोई नई देन या अविष्कार नहीं मिला है। इधर पाकिस्तान तो एक उपनिवेश बन कर रह गया है-एक नहीं तीन देश उसे अपने अपनिवेश की तरह उपयोग करते हैं। हालांकि उसकेा मिसाइल, परमाणु तथा अन्य सामरिक सहायता धार्मिक आधार पर मिल जाती है। अंतरिक्ष में उधार और सहायता पर उसका काम चल रहा है। बस उसकी फिक्र है एक ही है कि किसी तरह भारत का रास्ता रोके। पहले अमेरिका और अब चीन उसको इसी उद्देश्य से सहायता करते हैं। मतलब यह है कि पाकिस्तान को भारत से दुश्मनी रखने मेें ही अनेक फायदे हैं इसलिये वह मित्रता रखने से रहा मगर चीन के सामने यह समस्या दूसरी है। मूलतः चीन एक छोटा देश है पर पूरा का पूरा तिब्बत देश और भारत की जमीन हड़पने के कारण उसका नक्शा बड़ा है-ऊन का व्यापार करने वाले तिब्बत शरणार्थियों द्वारा लगाये गये नक्शे पर तो यही विचार बनता है-और उसके रणनीतिकारों में अमेरिका जैसा सम्राज्यवादी बनने का सपना है और ऐसे में भारत की तरक्की उनको आतंकित किये देती है। इधर अपने ही देश में चीन की तरक्की और ताकत का भ्रम फैलाने वाले बहुत कथित बुद्धिमान लोग हैं जबकि उसके बाजार में बिकने वाले सामान आकर्षक दिखने के बावजूद घटिया होते हैं जिनकी कोई गारंटी होती है। भले ही उसक मुकाबले भारतीय उत्पाद कर्म आकर्षक और महंगे हैं पर उनके उपयोग की गारंटी तो होती है। भारत का चंद्रयान -एक भेजने के बाद उसने भी एक चंद्रयान भेजने की घोषणा कर अपने लोगों का दिल बहलाया था-क्योंकि उसे अपनी जनता का दिल बहाने के लिये भारत को लघु साबित करना पड़ता है-पर अभी उसने भेजा नहीं है।
चीन की घुसपैठ के समाचारों से व्यथित लोगों को यह समझ लेना चाहिये कि अंतरिक्ष तकनीक में भारत चीन से आगे है और अब यह संभव नहीं है कि वह भारत की तरफ अपने सैन्य कदम बढ़ा कर आतंकित कर सके। दूसरी बात जो महत्वपूर्ण है कि चीन और पाकिस्तान के पास भारत को लेकर अधिक विकल्प नहीं है। वह भारत के साथ अपने संबंध न सामान्य बनायें बल्कि अधिक मैत्रीपूर्ण भी रहें यही अब उनके लिये बेहतर है वरना भविष्य में होना यह है कि भारत अंतरिक्ष, विज्ञान, स्वास्थ्य, इंटरनेट तथा सूचना के क्षेत्र में दूसरों की सहायता करता नजर आयेगा और उससे यकीनन विश्व में हमारा प्रभाव बढ़ेगा जबकि चीन और पाकिस्तान अपनी अकड़ के चलते हुए अंदर से ही टूटने के दौर में पहुंच सकते हैं।
कल भारतीय वैज्ञानिकों ने सात उपग्रह बीस मिनट में अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किये। आज उनके द्वारा ‘चांद पर पानी की खोज’ के समाचार की पुष्टि हुई है और यह एक कदम है जो भारत ने महाशक्ति बनने की तरफ बढ़ाया है।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे कहा जाता है उपलब्धि जो अपने ही देश में अपने ही लोगों के बीच प्राप्त की जाये। यह क्या कि किसी हिंदी फिल्म को विदेशी श्रेणी का आस्कर पुरस्कार मिल गया तो उस पर नाच रहे हैं या कोई भारतीय अमेरिका में धनपति बना या किसी उच्च पद पर पहुंचा तो उसे अपनी उपलब्धि मानकर गा रहे हैं। फिल्मों के नकली हीरो का गुणगाान कर रहे हैं। इससे अज्ञान बढ़ता है। हमारा दर्शन ज्ञान के साथ विज्ञान में भी उपलब्धि प्राप्त करने का भी संदेश देता हैं ऐसे में हमारे यह वैज्ञानिक ही देश के सच्चे नायक हैं। उनको सलाम करना चाहिये उनका गुणगान करना चाहिये क्योंकि उसी सत्य का रहस्योद्घाटन करते हैं जो बाद में ज्ञान बन जाता है और लोग उसकी राह चलत हैं। इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई।
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इसरो द्वारा चंद्रमा पर पानी की खोज तथा ओशियनसैट-2 सहित सात उपग्रहों का प्रक्षेपण-आलेख (ocianset-2 setelite-hindi article)


भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ‘इसरो- ने एक ही दिन में वह भी केवल बीस मिनट में सात उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किये जिसमें प्रमुख रूप से ओशियनसैट-2 भी शामिल है। ओशियनसैट-2 मौसम की जानकारी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। चंद्रयान-1 की सफलता के बाद इसरो की यह दूसरी बड़ी सफलता है जिससे भारत का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित होगा। इधर भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा चन्द्रमा पर पानी के खोज का भी समाचार मिला है जिसकी पुष्टि अमेरिका की वैज्ञानिक संस्था नासा ने की है। यकीनन भारत ने विज्ञान के क्षेत्र में जो प्रगति की है वह सराहनीय है। 
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत अंतरिक्ष के रूप में एक महत्वपूर्ण शक्ति बन गया है और इससे उसकी सैन्य शक्ति का अंदाज भी लगाया जा सकता है। अनेक लोग सोचते होंगे कि अंतरिक्ष शक्ति का सैन्य शक्ति से क्या संबंध है तो उन्हें यह समझना चाहिये कि अंतरिक्ष की ताकत ही आजकल किसी भी देश की शक्ति की पहचान है। पहले युद्धों में पैदल सेना और फिर वायुसेना के द्वारा सफलतायें प्राप्त की जाती थीं पर आजकल बिना अंतरिक्ष क्षमता के यह संभव नहीं है। इधर इसरो दूसरा चंद्रयान-2 की तैयारी कर रहा है। इतना ही इसरो दूसरे देशों को भी अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने में मदद कर रहा है। भारत के पास चीन से इस विषय में बढ़त प्राप्त है क्योंकि चीन अभी भी अपना चंद्रयान नहीं भेज पाया है। वैसे भारत का चंद्रयान अवधि से पूरी किये बिना ही अपना अस्तित्व गंवा बैठा पर ऐसे अभियानों में ऐसे विफलता कोई बड़ी चिंता की बात नहीं होती। वैसे भी उसने 95 प्रतिशत काम पूरा कर लिया था। इसी अभियान से विश्व को यह पता लगा कि चंद्रमा पर पानी है।
कहते हैं न कि घर की मुर्गी दाल बराबर-कुछ यही स्थिति हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की अपने देशवासियों के लिये है। आमतौर से हम लोग चीन और पाकिस्तान की सैन्य शक्ति को लेकर चिंतित रहते हैं पर उस समय केवल जल, थल और नभ की शक्ति पर विचार करते हैं। जल, थल और वायु की शक्ति महत्वपूर्ण है पर अंतरिक्ष शक्ति के आगे फीकी लगती हैं। हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की वजह से ही आज हमें महाशक्ति माना जाता है न कि पंरपरागत सैन्य उपलब्धियों से कोई यह सम्मान मिल रहा है।
अभी पिछले दिनों चीनी सेना की घुसपैठ की खबरें आयी थी जिसमें एक चैनल ने बताया कि चीनी सैनिक अपने देश का नाम भारतीय सीमा में दो किलोमीटर तक घुसकर कुछ पत्थरों पर लिखकर चले गये इस कथित समाचार पर एक भारी चिंता व्यक्त की गयी। हालांकि यह खबर प्रमाणित नहीं हुई पर इससे एक बात तो लगती है कि इस देश का बौद्धिक वर्ग के कुछ लोग कितने संकीर्ण ढंग से सोचते हैं।
सच तो यह है कि अब वह समय गया जब कोई सेना कहीं पहुंच गयी तो वहां से बिना लड़े हटती नहीं थी। अब विश्व समाज में एक अघोषित आचार संहिता तो बन गयी है कि किसी भी देश का स्वरूप इतनी आसानी से नहीं बदला जा सकता।
अगर प्रसंग चीन का आया तो पता नहीं आशियान देशों में भारत और चीन के संबंध क्यों भुला दिये जाते हैं? बहुत पहले अखबारों में एक खबर पड़ी थी कि आशियान देशों के घोषणा पत्र में भारत और चीन ने भी हस्ताक्षर किये गये जिसमें सदस्य देशों की वर्तमान सीमाओं में बदलाव को स्वीकार न करने की बात कही गयी थी। पता नहीं बाद में इस पर कोई जानकारी नहीं आई जबकि उसके बाद पाकिस्तान भारत पर आरोप लगाता रहा है कि भारत उसे आशियान का सदस्य नहीं बनने दे रहा है। आशियान ग्रुप में भारत और चीन के साथ सोवियत संघ भी है और पश्चिमी देश उसकी गतिविधियों को बहुत सतर्कता से देखते हैं। वहां चीन भारत के साथ अपने संबंध बेहतर रखता है जिसकी वजह उसकी आर्थिक और राजनीतिक बाध्यताऐं भी हो सकती हैं। यह संबंध ऐसे हैं कि भारत की इच्छा के विरुद्ध पाकिस्तान को उसमें शामिल करने की चीन ने कभी पहल नहीं की।
अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी से दुश्मनी लेकर आज कोई भी देश चैन से नहीं बैठ सकता चाहे वह चीन ही क्यों न हो? कुछ अखबारों में 1962 के भारत-चीन युद्ध का इतिहास भी हमने पढ़ा है जिसमें बताया गया कि चीन अंदर तक घुस आया था पर अमेरिकी दबाव में वह बहुत पीछे हट गया था हालांकि तब भी वह एक बहुत बड़े इलाके पर काबिज रहा। इसका आशय यह है कि कहीं न कहीं चीन भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव के आगे घुटने टेक सकता है। आज की परिस्थिति में वह एक भी इंच जमीन पर अपना कब्जा नहीं जमा सकता। इसका कारण यह है कि जल, थल, और नभ क्षेत्र में भारतीय सेना चीन से कमतर मानी जाती है पर इतनी नहीं कि चीन उसे रसगुल्ले की तरह खा जाये। वियतनाम में पिट चुका चीन अब इतना साहस नहीं कर सकता कि भारत पर हमला करे। उस युद्ध में चीन की विश्व बिरादरी में बहुत किरकिरी हुई थी। फिर अपने अंतरिक्ष विज्ञान के कारण भारत उसके लिये कोई आसान लक्ष्य नहीं रह गया जिसकी बदौलत भारत विश्व में अपने मित्र बना रहा है।
इस अंतरिक्ष क्षमता की वजह से अमेरिका हमेशा विजेता बनता रहा है यह अलग बात है कि अपनी रणनीतिक गलतियों से जमीनी लड़ाई में फंस जाता है। चीन को पता है कि ऐसी गलतियां किसी भी देश की ताकत कम देती हैं। चीन न केवल अंतरिक्ष विज्ञान में भारत से पीछे हैं बल्कि कंप्यूटर साफ्टवेयर में भी उसकी भारत पर निर्भरता है। हमारे देश के प्रतिभाशाली युवाओं का माद्दा सभी मानते हैं। अपनी जनता में अपनी छबि बनाये रखने के लिये चीन के प्रचार माध्यम भले ही भारत की बुराई करते हैं पर भारत की ताकत को कमतर आंकन की गलती वहां के रणनीतिकार कभी नहीं करेंगे।

इसका सारा श्रेय भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को तो जाता ही है साथ ही निजी क्षेत्र के साफ्टवेयर इंजीनियों को भी इसके लिये प्रशंसा करना चाहिये जिन्होंने पूरे विश्व में अपना लोहा मनवा लिया है। इस अवसर पर इसरो के वैज्ञानिकों को हार्दिक बधाई और चंद्रयान-2 के भविष्य में सफल प्रक्षेपण के लिये शुभकामनायें।
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मंदिरों पर गौरव की अनुभूति-आलेख (hindu temple in the middle east-hindi lekh)


वह एक ब्राह्म्ण लेखक का पाठ था-ऐसा उन्होंने अपने पाठ में स्वयं ही बताया था। उसने बताया कि राजस्थान के सीमावर्ती गांवों में विभाजन के समय आये सिंधी किस तरह अपनी संस्कृति को संजोये हुए हैं। एक सिंधी ने उससे कहा कि ‘आपमें और हममें बस इतना अंतर है कि हम अभी कुछ समय पहले वहां से आये हैं और आप तीन चार सौ साल पहले बाहर से आये हैं।’
उस लेखक ने इसी आधार पर अपना विचार व्यक्त करते हुए लिखा कि बाहर से कितने ही आक्रांता इस देश के लूटने आये पर यहां के लोगों ने उनके विचारों में नयापन होने के कारण स्वीकार किया। यहां नित नित नये समाज बने। उस लेखक ने यह भी लिखा है कि इस समाज की यह खूबी है कि वह नये विचारों को ग्रहण करने को लालायित रहता है।
उस लेखक और इस पाठ के लेखकों में विचारों की साम्यता लगी और ऐसा अनुभव हुआ कि इस देश के इतिहास में कई ऐसी सामग्री हैं जिनका विश्लेषण नये ढंग से किया जाना चाहिये। हुआ यह है कि मैकाले की शिक्षा पद्धति से शिक्षित इस देश बौद्धिक समाज दूसरे द्वारा थोपे गये विषयों पर विचार भी उनके ढंग से करता है। पिछले तीस चालीस वर्ष के समाचार पत्र पत्रिकायें उठाकर देख लीजिये इतिहास की गिनी चुनी घटनाओं के इर्दगिर्द ही नये ढंग से विचार ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे नया हो।
अधिकतर तो हम पिछले बासठ वर्ष के इतिहास पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं तो कभी कभी हजारों वर्ष पीछे चले जाते हैं। इन सबमें हम अपना गौरव ढूंढने से अधिक कुछ नहीं करते। इससे कभी निराशा का भाव आता है। दरअसल हमारी समस्या यह है कि हम यथास्थिति से आत्ममुग्ध हैं और उसमें अपना गौरव ढूंढना ही अधिक सुविधाजनक लगता है।
इसमें एक गौरव पूर्ण बात कही जाती है कि हिन्दू धर्म कभी इतना विस्तृत था कि उसका विस्तार मध्य एशिया तक था। मध्य एशिया में बने हिन्दू मंदिरों को अपना गौरव बताने की यह प्रवृत्ति हमारे देश में बहुत है। इसके पीछे वास्तविकता क्या है और नये संदर्भों में हम उसे कैसे देखें? यह विचार करने का साहस कोई विद्वान नहीं करता। आईये हम कुछ इस पर प्रकाश डालें।

एक पश्चिमी विद्वान ने खोजकर बताया था कि मनुष्य की उत्पति दक्षिण अफ्रीका में हुई। वह वहां बिल्कुल बंदरों की तरह था। उसके बाद वह भारत आया और वहां उसने ज्ञान प्राप्त किया फिर वह मध्य एशिया में गया जहां उसने सभ्यता का नया स्वरूप प्राप्त किया। फिर वह भारत की तरफ लौटा और बौद्धिक रूप से परिष्कृत होकरउसके बाद अन्य स्थानों पर गया। हम इसे अगर सही माने तो आज भी कुछ नहीं बदला। भारत आकर इंसान ने यहां की आबोहवा मेें राहत अनुभव की और अपने प्रयोग से उसने सत्य का ज्ञान प्राप्त किया। उसके प्रचार के लिये वह मध्य एशिया में गया जहां उसे सांसरिक और भौतिकता का ज्ञान भी मिला। दोनों ही ज्ञानों में संपन्न होने के बाद वह पूरे विश्व में फैला। इसमें एक बात निश्चित रही कि जिस तत्व ज्ञान की वजह से भारत विश्व में अध्यात्मिक गुरु है उसका आभास इसी धरती पर होता है। मुश्किल यह है कि तत्व ज्ञान अत्यंत सूक्ष्म और संक्षिप्त है और बाह्य रूप से उसका आकर्षण दिखता नहीं है। जब इंसान अपने अंदर की आंखों खोले तभी उसका महत्व उसे अनुभव हो सकता है।

भारत में हमेशा ही प्रकृति की कृपा रहने के साथ जनसंख्या का भी घनत्व हमेशा अधिक रहा है इसलिये यहां हमेशा आदमी खातापीता रहा हैं इसके विपरीत अन्य देशों में इतना प्राकृतिक कृपा नहीं है इसलिये यहां का भौतिक आकर्षण विदेशियों को हमेशा ही यहां खींच लाता है। इनमें कुछ पर्यटक के रूप में आते हैं तो कोई आक्रांता के रूप में।
विदेशों से यहां आवागमन हमेशा रहा है और तय बात है कि विदेशों से जो लोग आये उनकी सभ्यता भी यहां मिलती गयी। यही कारण है कि हम अनेक समाजों के कर्मकांडों में विविधता देखते हैं। इतिहासकारों के अनुसार भारत में मूर्तिपूजा का प्रवृत्ति मध्य एशिया से आयी है। उनकी बात में दम इसलिये भी नजर आती है कि भारतीय धर्म ग्रंथों मेें यज्ञ हवन आदि की चर्चा तो होती है पर मूर्ति पूजा यहां के मूल धर्म का भाग हो ऐसा नहीं लगता। रामायण काल में भी रावण द्वारा यज्ञों में विध्वंस पैदा करने की घटनाओं की चर्चा होती है पर मंदिर आदि पर हमला कहीं हुआ हो इसकी जानकारी नहीं मिलती।
श्रीगीता में भी द्रव्य यज्ञ और ज्ञान यज्ञ की चर्चा होती है। द्रव्य यज्ञ से आशय वही यज्ञ हैं जिनमें धन का व्यय होता है और निश्चित रूप से उनका आशय उन यज्ञों से है जिनमें भौतिक सामग्री का प्रयोग होता है।
इतिहास में इस बात की चर्चा होती है कि मध्य एशिया में किसी समय अनेक देवी देवताओं की पूजा होती थी और इस कारण वहां सामाजिक वैमनस्य भी बहुत था। लोग अपने देवी देवताओं को श्रेष्ठ बताने के लिये आपस में युद्ध करते थे। इन देवी देवताओं की संख्या भारत में वर्तमान में प्रचलित देवी देवताओं से कई गुना अधिक थी।
इतिहासकारों के अनुसार वहां एक राजा हुआ जो सूर्य का उपासक था। उसने सूर्य को छोड़कर अन्य देवी देवताओं की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया। दरअसल उसका मानना था कि सूर्य ही सृष्टि का आधार है और वही पूज्यनीय है। उसने अन्य देवी देवताओं के मंदिर और मूर्तियां तुड़वा दीं। इससे लोग नाराज हुए और उसे इतिहास का क्रूर राजा माना गया। बाद में उस राजा की हत्या हो गयी। इतिहासकार मानते हैं कि भले ही उसकी जनता उससे नाराज थी पर उसने यह सत्य स्थापित तो कर ही दिया कि इस सृष्टि का स्वामी एक परमात्मा है।
कुछ इतिहासकार कहते हैं कि उस राजा के मरने के बाद फिर पुनः विभिन्न देवी देवताओं की पूजा होने लगी। नतीजा फिर आपसी संघर्ष बढ़ने लगे और यह तब तक चला जब तक वहां एक ईश्वर का सिद्धांत ताकत के बल पर स्थापित नहीं हो गया।
दरअसल हम इतिहास पर विचार करें तो मूर्ति पूजकों और उनके विरोधियों का संघर्ष वहीं से होता भारत तक आ पहुंचा। भारत में इसे अधिक महत्व नहीं मिला क्योंकि यहां तत्व ज्ञान हमेशा ही अपना काम करता रहता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में पूरी तरह वर्णित है। इसके अलावा एक अन्य बात यह भी है कि भारतीय समाज मानता है कि समय समय पर महापुरुष पैदा होकर समाज सुधार के लिये कुछ न कुछ करते रहते हैं और उनका यह विश्वास गलत नहीं है। आधुनिक काल में कबीर, तुलसी, रहीम, मीरा, रैदास तथा अन्य संत कवियों ने अपनी रचनाओं ने केवल तत्व ज्ञान का प्रचार किया बल्कि भक्ति के ऐसे रस का निर्माण किया जिसके सेवन से यह समाज हमेशा ही तरोताजा रहता है। इसके विपरीत जहां नवीन विचारों के आगमन पर रोक है वह समाज जड़ता को प्राप्त हो गये हैं।
पूर्व में ऋषियों मुनियों और तपस्वियों द्वारा खोजे गये तत्व ज्ञान तथा आधुनिक काल के संत कवियों के भक्ति तत्व का प्रचार हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं। अगर हम यह कहते हैं कि मध्य एशिया में फैले मंदिर हमारे गौरव हैं तो यह भी याद रखिये वह मंदिर हमारे तत्वज्ञान और भक्ति भाव का प्रतीक नहीं है। इसके अलावा सूर्य मंदिरों का मध्य एशिया में होना तो कोई अजूबा नहीं है क्योंकि वहां कभी उनकी पूजा होती है। हम उनके साथ अपनी संस्कृति और सभ्यता को नहीं जोड़ सकते क्योंकि उनके साथ आपसी खूनी संघर्षों का इतिहास भी जुड़ा है। कहने को तो भारत में भी विभिन्न धार्मिक मतों को लेकर विवाद होते रहे हैं पर कभी ऐसा नहीं हुआ कि इसको लेकर किसी ने किसी पर हमला किया हो।
हमारी वर्तमान सभ्यता, संस्कृति और धर्म अनेक तरह के प्रयोगों के दौर से होते हुए वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुआ है। इसके आधार स्तंभ तत्व ज्ञान और भक्ति ही हमारी वास्तविक पहचान है। एक बात याद रखिये इतिहासकार कहते हैं कि दक्षिण अफ्रीका से चलकर इंसान भारत में ज्ञानी हुआ और फिर प्रचार के लिये मध्य एशिया में गया जहां उसे अन्य ज्ञान मिला। वह उसे प्राप्त कर यहां लौटा फिर पूरी तरह से परिष्कृत होकर अन्य जगह पर गया। इसका आशय यह है कि अतीत का गौरव जो हमारे देश में यहीं को लोगों की तपस्य और परिश्रम से निर्मित हुआ है वही श्रेष्ठ है और उससे आगे की सीमा का गौरव तो धूल धुसरित हो गया है। यह वहां रहे लोगों को तलाशना है उस पर हमें गर्व करना बेकार है। इसलिये कहीं मध्य एशिया के पुराने मंदिर ही नहीं बल्कि पश्चिम देशों में बनने वाले मंदिरों में अपने धर्म का गौरव ढूंढना का प्रयास किसी को अच्छा लग सकता है पर अघ्यात्मिक ज्ञानी जानते हैं कि यह केवल एक क्षणिक मानसिक सुख है और इसका उस ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है जिसकी वजह से यह देश विश्व का अध्यात्मिक गुरु माना जाता है।
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साहित्य आखिर होता क्या है-आलेख (article on hindi sahitya)


हिंदी की विकास यात्रा नहीं रुकेगी। लिखने वालों का लिखा बना रहेगा भले ही वह मिट जायें। पिछले दिनों कुछ दिलचस्प चर्चायें सामने आयीं। हिंदी के एक लेखक महोदय प्रकाशकों से बहुत नाखुश थे पर फिर भी उन्हें ब्लाग में हिंदी का भविष्य नहीं दिखाई दिया। अंतर्जाल लेखकों को अभी भी शायद इस देश के सामान्य लेखकों और प्रकाशकों की मानसिकता का अहसास नहीं है यही कारण है कि वह अपनी स्वयं का लेखकीय स्वाभिमान भूलकर उन लेखकों के वक्तव्यों का विरोध करते हुए भी उनके जाल में फंस जाते हैं।
एक प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या ब्लाग पर लिखा गया साहित्य है? जवाब तो कोई नहीं देता बल्कि उलझ कर सभी ऐसे मानसिक अंतद्वंद्व में फंस जाते हैं जहां केवल कुंठा पैदा होती है। हमारे सामने इस प्रश्न का उत्तर एक प्रति प्रश्न ही है कि ‘ब्लाग पर लिखा गया आखिर साहित्य क्यों नहीं है?’

जिनको लगता है कि ब्लाग पर लिखा गया साहित्य नहीं है उनको इस प्रश्न का उत्तर ही ढूंढना चाहिए। पहले गैरअंतर्जाल लेखकों की चर्चा कर लें। वह आज भी प्रकाशकों का मूंह जोहते हैं। उसी को लेकर शिकायत करते हैं। उनकी शिकायतें अनंतकाल तक चलने वाली है और अगर आज के समय में आप अपने लेखकीय कर्म की स्वतंत्र और मौलिक अभिव्यक्ति चाहते हैं तो अंतर्जाल पर लिखने के अलावा कोई चारा नहीं है। वरना लिफाफे लिख लिखकर भेजते रहिये। एकाध कभी छप गयी तो फिर उसे दिखा दिखाकर अपना प्रचार करिये वरना तो झेलते रहिये दर्द अपने लेखक होने का।
उस लेखक ने कहा-‘ब्लाग से कोई आशा नहीं है। वहां पढ़ते ही कितने लोग हैं?
वह स्वयं एक व्यवसायिक संस्थान में काम करते हैं। उन्होंने इतनी कवितायें लिखी हैं कि उनको साक्षात्कार के समय सुनाने के लिये एक भी याद नहीं आयी-इस पाठ का लेखक भी इसी तरह का ही है। अगर वह लेखक सामने होते तो उनसे पूछते कि ‘आप पढ़े तो गये पर याद आपको कितने लोग करते हैं?’
अगर ब्लाग की बात करें तो पहले इस बात को समझ लें कि हम कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं उसका नामकरण केल्कूलेटर, रजिस्टर, टेबल, पेन अल्मारी और मशीन के शब्दों को जोड़कर किया गया है। मतलब यह है कि इसमें वह सब चीजें शामिल हैं जिनका हम लिखते समय उपयोग करते हैं। अंतर इतना हो सकता है कि अधिकतर लेखक हाथ से स्वयं लिखते हैं पर टंकित अन्य व्यक्ति करता है और वह उनके लिये एक टंकक भर होता है। कुछ लेखक ऐसे भी हैं जो स्वयं टाईप करते हैं और उनके लिये यह अंतर्जाल एक बहुत बड़ा अवसर लाया है। स्थापित लेखकों में संभवतः अनेक टाईप करना जानते हैं पर उनके लिये स्वयं यह काम करना छोटेपन का प्रतीक है। यही कारण है अंतर्जाल लेखक उनके लिये एक तुच्छ जीव हैं।
इस पाठ का लेखक कोई प्रसिद्ध लेखक नहीं है पर इसका उसे अफसोस नहीं है। दरअसल इसके अनेक कारण है। अधिकतर बड़े पत्र पत्रिकाओं के कार्यालय बड़े शहरों में है और उनके लिये छोटे शहरों में पाठक होते हैं लेखक नहीं। फिर डाक से भेजी गयी सामग्री का पता ही नहीं लगता कि पहुंची कि नहीं। दूसरी बात यह है अंतर्जाल पर काम करना अभी स्थापित लोगों के लिये तुच्छ काम है और बड़े अखबारों को सामगं्री ईमेल से भी भेजी जाये तो उनको संपादकगण स्वयं देखते हों इसकी संभावना कम ही लगती है। ऐसे में उनको वह सामग्री मिलती भी है कि नहीं या फिर वह समझते हैं कि अंतर्जाल पर भेजकर लेखक अपना बड़प्पन दिखा रहा इसलिये उसको भाव मत दो। एक मजेदार चीज है कि अधिकतर बड़े अखबारों के ईमेल के पते भी नहीं छापते जहां उनको सामग्री भेजी जा सके। यह शिकायत नहीं है। हरेक की अपनी सीमाऐं होती हैं पर छोटे लेखकों के लिये प्रकाशन की सीमायें तो अधिक संकुचित हैं और ऐसे में उसके लिये अंतर्जाल पर ही एक संभावना बनती है।
इससे भी हटकर एक बात दूसरी है कि अंतर्जाल पर वैसी रचनायें नहीं चल सकती जैसे कि प्रकाशन में होती हैं। यहां संक्षिप्तीकरण होना चाहिये। मुख्य बात यह है कि हम अपनी लिखें। जहां तक हिट या फ्लाप होने का सवाल है तो यहां एक छोटी कहानी और कविता भी आपको अमरत्व दिला सकती है। हर कविता या कहानी तो किसी भी लेखक की भी हिट नहीं होती। बड़े बड़े लेखक भी हमेशा ऐसा नहीं कर पाते।
एक लेखिका ने एक लेखक से कहा-‘आपको कोई संपादक जानता हो तो कृपया उससे मेरी रचनायें प्रकाशित करने का आग्रह करें।’
उस लेखक ने कहा-‘पहले एक संपादक को जानता था पर पता नहीं वह कहां चला गया है। आप तो रचनायें भेज दीजिये।’
उस लेखिका ने कहा कि -‘ऐसे तो बहुत सारी रचनायें भेजती हूं। एक छपी पर उसके बाद कोई स्थान हीं नहीं मिला।‘
उस लेखक ने कहा-‘तो अंतर्जाल पर लिखिये।’
लेखिका ने कहा-‘वहां कौन पढ़ता है? वहां मजा नहीं आयेगा।
लेखक ने पूछा-‘आपको टाईप करना आता है।’
लेखिका ने नकारात्मक जवाब दिया तो लेखक ने कहा-‘जब आपको टाईप ही नहीं करना आता तो फिर अंतर्जाल पर लिखने की बात आप सोच भी कैसे सकती हैं?’
लेखिका ने कहा-‘वह तो किसी से टाईप करवा लूंगी पर वहां मजा नहीं आयेगा। वहां कितने लोग मुझे जान पायेंगे।’
लेखन के सहारे अपनी पहचान शीघ्र नहीं ढूंढी जा सकती। आप अगर शहर के अखबार में निरंतर छप भी रहे हैं तो इस बात का दावा नहीं कर सकते कि सभी लोग आपको जानते हैं। ऐसे में अंतर्जाल पर जैसा स्वतंत्र और मौलिक लेखन बेहतर ढंग से किया जा सकता है और उसका सही मतलब वही लेखक जानते हैं जो सामान्य प्रकाशन में भी लिखते रहे हैं।
सच बात तो यह है कि ब्लाग लिखने के लिये तकनीकी ज्ञान का होना आवश्यक है और स्थापित लेखक इससे बचने के लिये ऐसे ही बयान देते हैं। वैसे जिस तरह अंतर्जाल पर लेखक आ रहे हैं उससे पुराने लेखकों की नींद हराम भी है। वजह यह है कि अभी तक प्रकाशन की बाध्यताओं के आगे घुटने टेक चुके लेखकों के लिये अब यह संभव नहीं है कि वह लीक से हटकर लिखें।
इधर अंतर्जाल पर कुछ लेखकों ने इस बात का आभास तो दे ही दिया है कि वह आगे गजब का लिखने वाले हैं। सम सामयिक विषयों पर अनेक लेखकों ने ऐसे विचार व्यक्त किये जो सामान्य प्रकाशनों में स्थान पा ही नहीं सकते। भले ही अनेक प्रतिष्ठत ब्लाग लेखक यहां हो रही बहसें निरर्थक समझते हों पर यह लेखक नहीं मानता। मुख्य बात यह है कि ब्लाग लेखक आपस में बहस कर सकते हैं और आम लेखक इससे बिदकता है। जिसे लोग झगड़ा कह रहे हैं वह संवाद की आक्रामक अभिव्यक्ति है जिससे हिंदी लेखक अभी तक नहीं समझ पाये। हां, जब व्यक्तिगत रूप से आक्षेप करते हुए नाम लेकर पाठ लिखे जाते हैं तब निराशा हो जाती है। यही एक कमी है जिससे अंतर्जाल लेखकों को बचना चाहिये। वह इस बात पर यकीन करें कि उनका लिखा साहित्य ही है। क्लिष्ट शब्दों का उपयोग, सामान्य बात को लच्छेदार वाक्य बनाकर कहना या बड़े लोगों पर ही व्यंग्य लिखना साहित्य नहीं होता। सहजता पूर्वक बिना लाग लपेटे के अपनी बात कहना भी उतना ही साहित्य होता है। शेष फिर कभी।
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