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भेड़ की तरह आये पर बकरे न बने-हास्य व्यंग्य (bhed aur bakre-hasya vyangya)


बुद्धिजीवियों का सम्मेलन हो रहा था। अनेक प्रकार के बुद्धिजीवियों को उसमें आमंत्रण दिया गया। यह सम्मेलन एक ऐसे बुद्धिजीवी की देखरेख में हो रहा था जिन्होंने तमाम तरह की किताबें लिखी और जिनको अकादमिक संगठनों के पुस्तकालय खरीदकर अपने यहां सजाते रहे। आम लोग उनका नाम समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी के माध्यम से जानते थे कि कोई ऐसे लेखक हैं जो लिखते हैं। इस सम्मेलन के आयोजन के लिये एक प्रकाशन संस्थान ने उनके प्रेरित किया जो अब ऐसे लेखक ढूंढ रहा था जिनको अपने बुद्धिजीवी होने का भ्रम हो और वह किताब छपवायें।
प्रकाशक ने उस बुद्धिजीवी से कहा-‘कोई नये बकरे लाओ तो हम आपका कविता संग्रह बिना पैसे लिये छाप देते हैं।’
उस बुद्धिजीवी ने कहा-‘अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूं। अब ऐसे बकरे नहीं मिलते जो छपास के लिये किताबें छपवायें।’
प्रकाशक ने कहा-‘ठीक है! कोई दूसरा आदमी ढूंढता हूं। हमें प्रकाशन के लिये ऐसे बकरे चाहिये जो आप जैसे बुद्धिजीवियों की महफिलों में भेड़ की तरह हांक कर लाये जाते हैं।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘ठीक है! तुम कहते हो तो कोशिश करता हूं।’
उसने अपने चेले चपाटों को बुलाया। एक चेले ने कहा-‘महाराज, हमारे झांसे में अब ऐसे भेड़नुमा लेखक कहां आयेंगे जिनको बकरा बनाकर उस प्रकाशक के पास ले जायें।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘लानत! सारी शिक्षा बेकार गयी। इतने वर्ष से क्या मेरे यहां झक मार रहे थे। अरे, कोई सम्मेलन करो। इतने सारे लोग छद्म श्री, और अहम भूषण सम्मानों के लिये फिर रहे हैं। उनको अपने वाक्जाल में फंसाकर लाओ।’

चेले अपने अभियान पर निकल पड़े। एक महाबुद्धिजीवी सम्मेलन का आयोजन किया। कुल जमा पहुंचे आठ लोग-जिनमें अधिकतर नये नये बुद्धिजीवी बने थे जिनको अपने बहुत बड़े लेखक होने का गुमान था। सम्मेलन संपन्न हो गया। फोटो वगैरह भी खींच लिये गये। बुद्धिजीवी के साथ उसके पच्चीस चेले पांच पांच के समूह में बारी बारी से ही मंच पर विराजमान होते रहे। एक एक कर बाहर ने आये नये बुद्धिजीवियों को परिचय देने के लिये मंच पर बुलाया गया था। बाद में उनको नीचे धकिया दिया जाता था। एक नये बुद्धिजीवी लेखक ने कहा-‘भई, हमें भी कुछ बोलने दो।’
मंच पर उन महान बुद्धिजीवी ने अपने चेले को देखा तो वह उस पर बरस पड़ा-‘अबे, तेरी किताबें छपी हैं जो इतने बड़े मंच पर बोलने का अवसर चाहता है।’
तब बुद्धिजीवी ने अपने चेले को डांटा-‘अरे, ऐसा बोला जाता है। यह नये लेखक हैं इनको प्रोत्साहन देना है।’
फिर वह उस नये लेखक से बोले-‘भई, अब तो समय निकल गया है। अगली बार सम्मेलन में तुम्हारा लंबा भाषण रखेंगे। तब तक ऐसे दो चार सम्मेलनों में बोलने का अभ्यास कर लो। हां, एक किताब जरूर छपवा लेना।’
तब एक दूसरा बुद्धिजीवी बोला-‘पर महाशय, मैं तो तीस साल से लिख रहा हूं। कोई किताब नहीं छपी, पर अखबारों में कभी कभी जगह मिल जाती है।’
बुद्धिजीवी महाशय ने कहा-‘अरे भई, अच्छा लिखोगे तो छपोगे।’
इससे पहले कि वह मेहमान बुद्धिजीवी प्रतिवाद करता तब मंच पर बैठे उन महान बुद्धिजीवी के चेलों ने तालियां बजा दी जैसे कि कोई रहस्यमय बात उन्होंने कही हो।’

कार्यक्रम समाप्त हो गया। अब सवाल यह था कि उनका प्रचार कैसे हो? बुद्धिजीवी ने समझाया-‘फोटो केवल मंच के ही देना। मेरा भाषण देते हुए जरूर देना। अपने भी फोटो ऐसे देना जैसे कि सभी का आ जाये। इसलिये ही मैंने तुम्हें पांच पांच में बांटकर बारी बारी से बैठने के लिये कहा था ताकि अधिक फोटो छप सकें।’
एक चेले ने पूछा-‘महाराज, पर दर्शकों और श्रोताओं के फोटो भी तो छापने पड़ेंगे।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘खाली कुर्सियों के फोटो छपवाओगे, मूर्ख कहीं के! फिर यह भेड़ की तरह लोग आये थे इनके फोटो अगर अखबार में छप गये तो यह शेर हो जायेंगे। फिर नहीं आने वाले अपने जाल में। यहां आदमी को तब ऊंचा न उठाओ जब तक उससे कोई फायदा न हो।’
चेले ने कहा-‘ठीक है।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘और सुनो। नाश्ते, भोजन, और चाय के भी फोटो छाप देना। अपने पिछले सम्मेलन की वह फोटो जो नहीं भेज पाये, उपयोग में लेना। खाने की प्लेटों में बचे सामान, पन्नी में पड़े पानी के खाली ग्लास, और टेबलों पर बैठे तुम लोगों के जो फोटो बनवाये थे उनका उपयोग इस बार भी जरूर करना। लिखना कि शानदार भोजन हुआ।’
चेले ने पूछा-‘अगर किसी ने जांच करने का प्रयास किया तो?’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘यह लोग तो बाहर के आये थे चले जायेंगे। तुम लोगों से कोई पूछे तो बता देना। हां, तुम लोगों ने चाय के ढाबे पर बैठकर जो फोटो खिंचवायी थी वह भी भेज देना।’
एक चेले ने कहा-‘पिछली बार वह छपवा चुके हैं। दो साल पहले।
बुद्धिजीवी ने कहा-‘अब कौन उसे याद रखता है? हां, एक बात याद रखना। मेरे कुछ बुद्धिजीवियों के बयान भी छाप देना। भले ही वह न आये। इससे यह महासम्मेलन लगेगा। कुछ छद्म नाम के विद्वान लोगों का आगमन भी दर्शा देना। इन आठों में लगे रहो। कम से कम दो जरूर बकरे बन जायेंगें।’
नये बुद्धिजीवी रेल्वे स्टेशन पर अपने ठिकाने लौटने के लिये आये तो उसमें दो गायब थे। एक ने दूसरे से पूछा-‘यह दो क्यों नहीं आये? यहां इसी स्टेशन पर मिलने का सभी ने वादा किया था।
दूसरे ने कहा-‘वह अपनी किताब छपवाने के बाद ही यहां से जायेंगे। बुद्धिजीवी के एक चेले ने उनको पटा लिया है। एक ने मुझे मोबाइल पर यह बात बतायी।’
इधर पता लगा कि उनकी ट्रेन आज नहीं जा रही है। दूसरे ट्रेन का इंतजार करने की बजाय उन्होंने वह शहर घूमने का निर्णय किया और पास में ही एक होटल में रुक गये।
अगले दिन सुबह उन्होंने होटल के बाहर एक चाय के ढाबे पर ही अखबार देखा। उसमें उस महासम्मेलन की खबर छपी थी। अपना नाम और फोटो न देखकर उनको गुस्सा आया। तब वह आपस में बात करने लगे। एक ने कहा-‘यार, हम काहे इतनी दूर आये थे। न खाना खाया न नाश्ता किया। यह खबर देखो। क्या बकवाद लगती है।’
उनकी बातें पास ही बैठा चाय पीता हुआ एक आदमी सुन रहा था। उसने उनसे पूछा-‘तो तुम भी सम्मेलन में आये हो? जरा सोच समझकर जाना। कहीं जेब कट गयी तो कहीं के नहीं रहोगे।’
उन्होंने उस आदमी की तरफ देखा। वह एकदम मैला कुचला पायजामा पहने हुए था। उसकी दाढ़ी और बाल इतने बढ़े हुए थे कि उसकी तरफ देखना भी बुरा लगता था।
एक बुद्धिजीवी ने उससे जवाब दिया-‘हां, एक बुद्धिजीवी सम्मेलन में आये हैं।’
उसने कहा-‘मैं भी ऐसे ही फंस गया। अपने आपको बड़ा बुद्धिजीवी समझता था। रहने वाला तो यहीं का हूं। अलबत्ता किताब छपवाने के चक्कर में इतना पैसा खर्च किया फिर उसका विमोचन कराया। मुझसे कहा गया कि तुम बहुत बड़ बुद्धिजीवी बन जाओगे। छद्म श्री और अहम भूषण पुरस्कार भी मिल सकता है। मगर उसके बाद कहीं का न रहा। फिर मुझसे कहा गया कि दूसरी किताब छपवाओ। उसके लिये बचे खुचे पैसे लेकर निकला तो जेब कट गयी। अरे, ऐसे सम्मेलनों के चक्कर में मत पड़ो। यहां भेड़ बनाकर लाते हैं और बकरे बनाकर भेज देते हैं।’
उसकी इस कहानी का उन नवबुद्धिजीवियो पर ऐसा असर हुआ कि वह चाय आधी छोड़ कर भाग निकले।
स्टेशन पर एक ने दूसरे से कहा-‘यार, गनीमत है कि भेड़ की तरह आये पर बकरे नहीं बने।’

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कवि,लेखक और संपादक, दीपक भारतदीप,ग्वालियर
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रिश्ता और सच का सामना-हास्य कविता (rishta aur sach ka samana-hasya kavita)


लड़के की मां ने
रिश्ते कराने वाले मध्यस्थ से कहा
‘‘लड़की और परिवार के साथ
दहेज का मामला भी समझ में आयेगा।
बस एक बात रह गयी है कहना कि
अब तो चल गया है सच के सामना करने का फैशन
इसलिये लड़की को उस मशीन पर भी बिठायेंगे
चाहें उसके मां बाप तो
अपने लड़के को भी उस पर दिखायेंगे
इस तरह रिश्ता तय हो जायेगा।’

सुनकर लड़का चौंका
और इशारा कर मां को बाहर बुलाया
और बोला-
‘यह क्या कर रही हो माताश्री
उस तरह तो मेरा कभी भी विवाह
संपन्न नहीं हो पायेगा।
तेरा और मेरा रिश्ता तो इसी जन्म का है
जो व्यर्थ जायेगा।
यह टीवी देखकर मत चलो
ऐसा न हो कि फिर इस रिश्ते से हाथ मलो
सच की मशीन है इस तरह कि
जो मेरे बारे में तुम भी नहीं जानती
सभी को पता चल जायेगा।
चुपचाप हामी भर दो
वरना तुम्हारे सास बनने का
और मेरा घर बसने का सपना
सच का सामना करते ही टूट जायेगा।’’

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इन्टरनेट का ताला और पाठ चोर (हास्य व्यंग्य)


कभी कभी यह मन होता है कि किसी ब्लाग लेखक के लिखे पाठ के विषय पर कुछ हम भी लिखें। इसका कारण यह है कि किसी भी विषय के अनेक दृष्टिकोण होते हैं और किसी अन्य लेखक के विषय ने अपने दृष्टिकोण से लिखा होता है तो हमारे मन में यह आता है कि अन्य दृष्टिकोण से उस पर लिखें और इसके लिये अगर उस लेखक की कुछ पंक्तियां अपने पाठ में उद्धृत करें तो अच्छा रहेगा। अंतर्जाल पर लिखते हुए इस मामलें में एक आसानी होती है कि उस लेखक की पंक्तियां कापी कर उसे अपने पाठ पर लिखें ताकि पाठकों को यह पता लगे कि अन्य लेखक ने भी उस पर कुछ लिखा है। इससे दोनों लेखकों का दृष्टिकोण पाठकों के समक्ष आता है।

मगर अब समस्या यह आने लगी है कि दूसरों की देखा देखी हमने भी अपने ब्लाग पर ताला लगा दिया है। इसलिये किसी की शिकायत तो कर ही नहीं सकते क्योंकि अंतर्जाल पर अपने पाठों की चोरी की समस्या से अनेक लेखक परेशान हैं। हमारे लिये कभी अधिक परेशानी नहीं रही क्योंकि हमारा लिखा चुराने लायक हैं यह नहीं लगता पर दूसरों की देखा देखी ताला लगा दिया तो लगा दिया। हम किसी के पाठ की चोरी नहीं करते पर जिसका विषय पसंद आये उस पर लिखते हैं और उस लेखक का उल्लेख करने में हमें कोई झिझक नहीं होती-सोचते हैं हो सकता है कि उसके नाम से हम भी कहीं हिट हो जायें। अब जाकर अपने ब्लाग/पत्रिका पर ताला भी इसलिये नहीं लगाया कि हमें अपने पाठ के चोरी होने का खतरा है बल्कि पाठकों और मित्रों को लगे कि ऐसा लिखता होगा कि उसे चोरी का खतरा अनुभव होता है।

बात करें ब्लाग/पत्रिका पर ताले के चोरी होने की। यह एक ऐसा साफ्टवेयर है जिसको अपने ब्लाग पर लिंक करने पर उसके पाठ की कोई कापी नहीं कर सकता। हालांकि इसका कोई तोड़ नहीं होगा यह कहना कठिन है क्योंकि अंतर्जाल पर अनेक तकनीकी खिलाड़ी ऐसे हैं जो तालों को तोड़ने वाले हथोड़े या तालियां बनाकर उसे तोड़ भी सकते हैं। वैसे भी मनुष्य में रचनात्मक विचार से अधिक विध्वंस की भावना अधिक होती है। इस ताले की वजह से हमें तीन चार बार स्वयं ही परेशानी झेलनी पड़ी। उस दिन एक मित्र ब्लाग लेखक का पाठ हमें बहुत अच्छा लगा। सोचा चलो कि उसके अंश लेकर अपने ब्लाग/पत्रिका पर चाप देते हैं और साथ में अपनी बात भी जोड़ लेंगे। जब उसकी कापी करने लगे तो वहां कर्सर काम नहीं कर रहा था। बहुत माथापच्ची की। फिर उनके ब्लाग का मुआयना किया तो देखा कि वहां एक साफ्टवेयर का लिंक है जो इसके लिये इजाजत नहीं देगा हालांकि उसके साथ ताले का लिंक भी था पर हमें वह दिखाई नहीं दिया। मन मारकर हमें अपना इरादा बदलना पड़ा। तब हमने उसी साफ्टवेयर का लिंक अपने ब्लाग पर लगाया। मगर देखा कि अनेक लोग अपनी टिप्पणियों में हमारे पाठ की कापी कर टिप्पणियां कर रहे हैं। तब हैरानी हुई। हमने सोचा चलने दो। दो तीन दिन पहले एक ब्लाग के ताले पर नजर पड़ी। तब वहां से हमने ताले का साफ्टवेयर लिया और अपने ब्लाग@पत्रिकाओं पर लगा दिया। इस तरह अपना ब्लाग सुरक्षित कर लिया।

किसी ने विरोध नहीं किया पर आज एक ब्लाग से जब पाठ का अंश लेने का विचार आया तो देखा कि वहां ताला लगा हुआ है। सच बात तो यह है कि यह ताला इसलिये लगाया जाता है कि कोई मेहनत से लिखे गये पाठों से कापी नहीं कर सके मगर मुश्किल इसमें यह आने वाली है कि इससे आपस में एक दूसरे से जुड़े ब्लाग लेखक उन ब्लाग के पाठों की कापी नहीं कर पायेंगे जिन पर ताले लगे हुए हैं और वह उन पर लिखना चाहते हैं। हालांकि इसका एक तरीका यह भी है कि अपने मित्र ब्लाग लेखक को ईमेल कर उस पाठ की कापी मांगी जा सकती है और वह दे भी देंगे पर लिखने का एक मूड और समय होता है। ईमेल भेजने और उत्तर आने के बीच मूड और समय के बदलने की पूरी गुंजायश होती है।

वैसे भी ताले केवल सामान्य इंसान का मार्ग अवरुद्ध करता है। चोर उठाईगीरे और डकैतों के लिये निर्जीव ताले कोई अवरोध नहीं खड़े कर पाते। अंतर्जाल पर जिस तरह की घटनायें सुनने को मिलती हैं उससे तो नहीं लगता कि ताला उनके लिये कोई अवरोध खड़ कर पायेगा। जिस तरह समाज की स्थिति है उससे अंतर्जाल अलग तो हो नहीं सकता। जिस तरह समाज में विध्वसंक और विलासी लोगों के बाहुल्य है वैसी ही हालत इंटरनेट पर भी है। रचनात्मक लोगां की कमी यहां भी है अगर ऐसा नहीं होता तो हिंदी में लिखने वालों की संख्या देश की हिंदी आबादी के हिसाब से इतनी कम नहीं होती। इतने सारे इंटरनेट कनेक्शन हैं और सर्च इंजिनों पर हिंदी भाषियों की खोज का दृष्टिकोण देखें तो वह फिल्मी अभिनेत्रियों पर केंद्रित है।
भले ही किसी ब्लाग लेखक का पाठ उपयोग न हो पर ताला तोड़कर अपनी तकनीकी शक्ति का प्रदर्शन करने वाले भी यहां आत्मसंतुष्टि के लिये कर सकते हैं। हो सकता है कि कुछ तकनीकी जानकार पढ़ने लिखने की बजाय ब्लाग पर लगा ताला देखकर ही उसका तोड़ निकालने में ही अपना समय नष्ट करें क्योंकि कुछ लोगों को विध्वंस करने में मजा आता है। हम अपने आसपास कई ऐसे लोग देख सकते हैं जो किसी बेहतर चीज को देखकर उससे प्रसन्न होने की बजाय उसके नष्ट होने के उपायों पर विचार करने लगते हैं।
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कहर और मदद-हिंदी कविता


वह दूसरे के उजड़ने पर ही

अपने घर भर पाते हैं

इसलिये ही मददगार कहलाते हैं

बसे रहें शहर

उनको कभी नहीं भाते हैं

टकीटकी लगाये रहते हैं

वह आकाश की तरफ

यह देखने के लिये

कब धरती पर कहर आते है

जब बरसते हैं वह

उनके चेहरे खिल जाते हैं
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संवेदनाओं की नदी अब सूख गयी है

कहर के शिकार लोगों पर आया था तरस

मन में उपजी पीड़ाओं ने

मदद के लिये उकसाया

पर उनके लुटने की खबर से

अपने दिल में स्पंदन नहीं पाया

लगा जैसे संवेदना की नदी सूख गयी है

कौन कहर का शिकार

कौन लुटेरा

देखते देखते दिल की धड़कनें जैसे रूठ गयी हैं
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आस्ट्रेलिया की तरफ से अंपायर भी खेल रहे हैं?


आस्ट्रेलिया में चल रही पांच दिवसीय क्रिकेट मैच में जिस तरह पहली पारी ढहने से अंपायर स्टीव बकनर ने जिस तरह कंगारुओं की जिस तरह बचाया उसे देखते हुए बहुत पहले पाकिस्तान की अंपायरिंग की याद आते है तब कहा जाता था की पाकिस्तान में तेरह खिलाडी खेलते हैं। जब से तीसरे देश के अंपायर रखने की परंपरा शुरू हुई है तब से उसके बारे में ऐसी चर्चा बंद हो गई पर अब किसी को विलेन तो रहना है वरना क्रिकेट में हीरो की कद्र कौन करेगा? किसी को विलेन बनाकर ही हीरो को लोगों के सम्मुख प्रस्तुत कर उनके जजबातों का फायदा उठाया जा सकता है।

क्रिकेट में आजकल स्टीव बकनर इस तरह का रोल निभाने के लिए तैयार हो रहे हैं। भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ी उनके पक्षपात का शिकार रहे हैं। बस एक अंतर है वह यह की पाकिस्तान के खिलाड़ी मुखर होकर आरोप लगाते है और भारतीय खिलाड़ी अपनी व्यावसायिक मजबूरियों के कारण चुप रह जाते हैं। जबकि जानते हैं कि यह खेल ही भारत की आर्थिक शक्ति के दम पर चल रहा है। स्टीव बकनर ने कल तो हद ही कर दी पता नहीं क्यों इतना खौफ था कि एंड्रू साइमंस को दो बार आऊट नहीं दिया। लगता है कि अब खिलाड़ी जो रोल नहीं निभा पा रहे या उसका जिम्मा अंपायरों पर डाला जाने वाला है, कोई खिलाडी जो आऊट होना चाहता है पर अंपायर दे नहीं रहा और कोई अच्छा खेल रहा है तो उसे गलत आउट दे दो।

कल के किस्से पर एक और किस्सा याद आया। कोलंबो में एक प्रतियोगिता में आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान दोनों ही मैच हारना चाहते थे। अखबारों में उस समय प्रकाशित चर्चा के अनुसार उस मैच में दोनों की रूचि मैच जीतने पर मिलने वाली राशि से अधिक हारने पर दो नंबर में मिलने वाली राशि में अधिक थी-इस आरोप पर अखबारों पर में खूब चर्चा हुई थी। मैंने इसे पढा तो हंसी आयी। कल और आज जो स्टीव बकनर और सायमंड को देखकर उसी की याद आयी।

सायमंड ने तय कर लिया होगा कि-” यार इंडिया के खिलाफ बहुत बार अच्छा खेल लिया और खराब खेल कर सबको चौंका दो। फिर कभी भारत जाना है, कहीं ऐसा न हो कुंबले एंड कंपनी डर के मारे क्रिकेट खेलना छोड़ दें तो आगे कमाई कैसी होगी आखिर क्रिकेट चल तो भारत की वजह से रहा है। इस बार मौका दो ताकि आगे भी खेलते रहें।”

बकनर सोच रहा होगा-”ऐसे कैसे? आज मैं भी अपनी ताकत दिखा दूं। ऐसा तो नहीं यह कहीं अपना आऊट होना फिक्स कर आया हो। अगर कर आया होगा तो भारी कमीशन मिला होगा। कुछ कमीशन दे दो में इसे जाने देता हूँ।

ऐसा भी हो सकता है कि क्रिकेट के लिए कोई विलेन की जुगाड़ करना हो और उसके लिए बकनर तैयार हुए हों क्योंकि अगर उनके इस तरह के फैसले होते रहे तो लोग चिढ जायेंगे, और कहीं इसके बावजूद भारत की टीम जीती तो बस आ गया मजा। क्रिकेट को लोगों के बीच फिर एक लाइफ लाइन मिल जायेगी-जैसे ट्वेन्टी-ट्वेन्टी में भारत के जीतने पर मिली। उसके बाद फिर भारत में क्रिकेट का खेल भारत में जनचर्चा का विषय बना था पर अब फिर लोग निराश हो गए हैं क्योंकि पुराने खिलाड़ी फिर उनके सामने आ गए हैं।

अब यह पता नहीं लग रहा है कि भारत के खिलाड़ी इस पर क्या करेंगे? कभी कहते हैं कि इसकी शिकायत करेंगे तो कभी कहते हैं नहीं करेगे? एक सवाल जो उठता है कि स्टीव बकनर का शिकार भारत के खिलाड़ी ही क्यों हो रहे हैं आस्ट्रेलिया के क्यों नहीं? इससे एक बात साफ जाहिर होती है कि वह समझता है कि विश्व की असली ताकत अभी गोरों के पास है और एशिया के देश कितने भी आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली हो जाएं पर नियंत्रण तो गोरों का ही चलेगा। इसलिए उनकी बजाते रहो ताकि काले लोगन को मौका मिलते रहें। उसके खिलाफ अधिक शिकायत करने वाले देश एशिया के हैं क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता। शायद भारत के खिलाड़ी भी कुछ कहने में डरते होंगे क्योंकि इंग्लेंड में अंपायर का विरोध करने पर अपने पडोसी देश पाकिस्तान के कप्तान इंजमाम उल हक़ का जो हश्र हुआ सबने देखा है। बहरहाल इतना तो कहा जा सकता है कि पहले पाकिस्तान के बारे में कहा जाता अब आस्ट्रेलिया के बारे में भी यही कहा जा सकता है कि वह १३ खिलाडियों के साथ खेल रहा है।