पाकिस्तान के साथ संघर्ष बहुत दिनों तक चलेगा-हिन्दी संपादकीय


                           आज एक समाचार पत्र में पढ़ा था कि कल भारतीय सेना ने सीमा पार कर आतंकवादी मारे। अभी एक फेसबुक पर भी पढ़ा कि दो दिन में भारतीय सेना दो बार सीमा पारकर आतंकवादियों को मारकर चली आयी। यह एक नयी रणनीति लगती है। मारो और भाग लो। पाकिस्तानी सेना को यह लगता है कि भारतीय सेना सीमा पार कर जब आगे आयेगी तब सोचेंगे। अगर समाचारों पर भरोसा करें तो यह एक ऐसी रणनीति है जो पाकिस्तान को संकट में डाल सकती है। इस समय पाकिस्तान की सेना बलोचिस्तान और अफगान सीमा पर डटी है। अगर भारतीय सेना के इस अस्थायी प्रवास को रोकना है तो उसे आना होगा। वहां से सेना हटी नहीं कि पाकिस्तान में भारी अंदरूनी संकट शुरू हो जायेगा। पाकिस्तानी रेंजर हमारी बीएसएफ की तरह ही है जो आंतरिक सुरक्षा के लिये तैनात रहते हैं। फेसबुक पर ही एक समाचार पढ़ा कि राजस्थान की सीमा पर टैंक आदि रेल में चढ़ाकर भेजे जा रहे हैें। हैरानी इस बात यह है कि प्रकाशन माध्यमों में यह बातें आयी हैं जबकि टीवी चैनलों से यह समाचार नदारद है। संभव है कि दोनों तरफ की सरकारें अब किसी उत्तेजना से बचने के लिये ऐसे आक्रामक समाचारों से बच रही हों। इधर यह भी समाचार आया कि सीमा पर की जानकारी उच्च स्तर पर ली जा रही है।

                         इसके बावजूद बड़े युद्ध की संभावना अभी नहीं है। भारतीय सेना मारकाट कर लौट आयेगी तो वह बड़े हमले का विषय नहीं होगा। उल्टे पाकिस्तान अब यह शिकायत करता फिरेगा कि भारतीय सेना अब सीमा पार करने लगी है-भारत भी चीन की सकता है कि सीमांकन अभी नहीं हुआ है इसलिये भूल से सैनिक चले जाते हैं। समझौते में भारत शर्त भी रख सकता है कि भारतीय सेना पाक सीमा में घुसकर नहीं मारेगी अगर पाकिस्तान आतंकवाद बंद कर दे-पहले आतंकवाद रोकने के बदले देने को कुछ नहीं था पर अगर इस तरह भारतीय सेना करती रही तो कुछ तो देने के लिये मिल ही जायेगा। अभी इसी तरह हवाई वह मिसाइल हमले भी हो सकते हैं। पाकिस्तान फंस चुका हैं। अफगानिस्तान तथा ईरान उसके दुश्मन हो गये हैं। अमेरिका नाराज है। पाकिस्तान तो भारत का शिकार है और वही उसे करना होगा-पाकिस्तान के दुश्मन भी यही मान चुके हैं। मगर यह अभियान एक दो महीने नहीं बल्कि एक दो वर्ष तक चल सकता है। पाकिस्तान के परमाणु हमले तथा बड़े युद्ध की हानि से बचने के लिये एक कुशल रणनीति की आवश्यकता होती है जिसमें भारतीय रणनीतिकार पाकिस्तानियों से कहीं बेहतर साबित हुए हैं।

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