तुलसी के दोहे-गुणी होने पर अहंकारी होना बिडंबनापूर्ण

           सामान्य मनुष्य अपनी प्रकृतियों के वशीभूत होकर काम करता है, जबकि ज्ञानी मनुष्य उनको पहचानते हुए अपने विवेक से किसी काम को करने या न करने का निर्णय लेता है। देखा जाये तो समाज में ज्ञानी मनुष्य अत्यंत कम होते हैं पर दूसरे की अपकीर्ति के माध्यम से स्वयं की कीर्ति अपने मुख से बखान करने वालों की संख्या बहुत होती है। उससे भी अधिक संख्या तो दूसरों की निंदा करने वालों की होती है जो यह मानकर चलते हैं कि दूसरे के दोष गिनाकर हम यह साबित कर सकते हैं कि हमारे पास गुण है।
          आपसी वार्तालाप में लोग एक दूसरे से कहते हैं कि ‘‘अमुक आदमी में वह दोष है’, ‘अमुक आदमी यह बुरा काम करता है’, अमुक आदमी इस तरह का गंदा विचार पालता है’, या फिर ‘अमुक आदमी गंदा भोजन खाता है या पानी पीता है’। इस तरह आदमी यह साबित करना चाहता है कि अमुक बुराई ये वह स्वयं दोषमुक्त है। ज्ञानी आदमी अपना आत्ममंथन करता है। वह दूसरों की बजाय अपनी कमियां ढूंढकर उनको दूर करने का प्रयास करता है।
महाकवि तुलसीदास कहते हैं कि
————–
‘तुलसी’ जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।
         ‘‘दूसरों की निंदा कर स्वयं प्रतिष्ठा पाने का विचार ही मूर्खतापूर्ण है। दूसरे को बदनाम कर अपनी तारीफ गाने वालों के मुंह पर ऐसी कालिख लगेगी जिसे  कितना भी धोई जाये मिट नहीं सकती।’’
तनु गुन धन महिमा धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान।
तुलसी जिअत बिडम्बना, परिनामहु गत जान।।
        ‘‘सौंदर्य, सद्गुण, धन, प्रतिष्ठा और धर्म भाव न होने पर भी जिनको अहंकार है उनका जीवन ही बिडम्बना से भरा है। उनकी गत भी बुरी होती है।
          सच बात तो यह है कि आधुनिक समय में आदमी धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल अर्जित करने के प्रयास में लगा रहता है। न उसके व्यक्तित्व में आकर्षण न व्यवहार में गुण दिखता हैं और न ही व्यसनों की वजह से प्रतिष्ठा और धन भी उसके स्थिर रहता है। इसके बावजूद अधिकतर लोगों के पास अहंकार होता है। जो लोग जुआ, शराब या यौन अपराधों में लिप्त होते हैं उनको अगर नैतिकता का उपदेश दिया जाये तो वह उत्तेजित होते हैं। इतना ही नहीं अनेक लोग तो ऐसे हैं जो अपने में ढेर सारे दोष होने के बावजूद दूसरों की निंदा में लगकर अपनी स्थिति हास्यास्पद बना देते हैं।
ज्ञानी आदमी इन सबसे परे होकर जीवन व्यतीत करता है। उसे मालुम होता है कि गुण और ज्ञान के संचय के लिये समय कम होता है तब परनिंदा में उसे नष्ट करना बेकार है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

नववर्ष में अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे)और उनकी आंदोलन का क्या होगा-हिन्दी लेख

             इस वर्ष अगर राजनीतिक और खबरों का आंकलन किया जाये तो यकीनन अन्ना हजारे और उनका भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन टीवी चैनलों, समाचार पत्रों तथा इंटरनेट पर छाया रहा। चूंकि प्रचार माध्यमों के प्रकाशनों और प्रसारणों में सब तरह का मसाला बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। इसलिये कभी गंभीर चिंत्तन तो कभी तनाव पूर्ण विवाद तो कभी हास्य व्यंग्य का मिश्रण भी शामिल रहा। हालांकि ऐसे में हम लोगों के लिये केवल देश में व्याप्त भ्रष्टाचार ही चिंत्तन का विषय रहा। यह अलग बात है कि जो बहसें देखी उनमें केवल सतही सोच दिखाई दी। आक्षेपों और हास्य टिप्पणियों ने एक तरह से हमारा मन ही खट्टा किया। हम चाहते थे कि देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर गंभीर मंथन हो न कि व्यक्तिगत आक्षेपों या मजाक में समय बरबाद हो। मगर यह हम जैसे फोकटिया लेखकों के सोचने से क्या होता है? व्यवसायिक लोग जहां चाहे सार्वजनिक बहसों को ले जा सकते हैं।
                    वर्ष के आखिर में हमने इस पर दो लेख लिखे पर लगता नहीं है कि हम अपनी बात पूरी कह पाये। लोकपाल और जनलोकपाल के मध्य द्वंद्व भले ही चलता रहा हो पर हमारी नज़र इस बात पर अधिक रही है कि क्या वाकई समाज इस बात के लिये तैयार है कि वह भ्रष्टाचार व्यवस्था चाहता है। हमें लगता नहीं है कि समाज में कोई गंभीर हलचल है। राज्य व्यवस्था का हर कोई उपयोग अपने हित में करना चाहता है और यही भ्रष्टाचार की जड़ है और इससे आम जनमानस अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। जिस तरह पर बहस चल रही है उसमें हम जैसे चिंत्तक फिट भी नहीं बैठ सकते क्योंकि व्यवसायिक बुद्धिजीवियों का वर्ग केवल अपने तयशुदा विचार पर ही निर्णय करना चाहता है। नयी बात उसे मूर्खतापूर्ण या अप्रासंगिक लगती है। बहरहाल हमारे दोनों लेख यहां प्रस्तुत हैं।

                ईसवी संवत 2011 समाप्त  होकर  ही 2012 प्रारंभ हो गया  है। आमतौर से आधुनिक शिक्षा पद्धति से परे रहने वाले आम भारतीय जनमानस के लिये 31 दिसम्बर तथा 1 जनवरी यह पुराना साल समाप्त तथा नया साल प्रारंभ होने का समय नहीं होता। भारतीय संवत अप्रैल या मार्च में प्रारंभ होता है। इतना ही नही भारत के बजट का वर्ष भी 1 अप्रैल से 31 मार्च को होता है। अलबत्ता बाज़ार तथा प्रचार समूहो  ने अपनी कमाई के लिये 1 जनवरी से नववर्ष प्रारंभ होने के तिथि को इस तरह समाज में स्थापित कर लिया है कि पुरानी, मध्यम तथा नयी पीढ़ी की शहरी पीढ़ी इसके जाल में फंसी हुई है। पहले होता था ‘नववर्ष की बधाई’ और अब हो गया ‘हैप्पी न्यू ईयर’।

       बहरहाल पिछले साल की खबरें, फिल्में, गीत, और समाचारों का पुलिंदा लेकर प्रचार माध्यम हाजिर हैं। हमें यह सब नहीं दिखाई देता। हमें दिखाई देता है भ्रष्टाचार का भूत! इस भूत ने हमारे समाज का वर्ष में से नौ महीने तक पीछा किया है। लग रहा है कि अगले वर्ष का प्रारंभ भी नायक अन्ना हजारे और खलनायक भ्रष्टाचार ही करेगा। आखिर हमने यह दावा किस आधार पर किया। दरअसल हमारे बीस ब्लॉग पिछले छह वर्ष से चल रहे हैं पर भ्रष्टाचार शब्द से इस बार सर्च इंजिनों में जितने ढूंढे गये उतना पिछले सालों में नहीं दिखाई दिया। इतना ही नहीं अन्ना हजारे के नाम से लिखे गये शीर्षक वाले पाठों के ब्लॉगों ने भी अधिक से अधिक पाठक जुटाये। अप्रैल 2011 से पहले भ्रष्टाचार पर लिखी गयी कविताओं तथा लेखों ने इसयिल लोकप्रियता पायी। हम अगर अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को एक वाक्य में सफल बताना चाहें तो वह यह कि उन्होंने भारत में फैले भ्रष्टाचार का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने में योगदान दिया।
           अन्ना हजारे 74 वर्ष के हैं। आयु की दृष्टि से उनका सम्मान होना चाहिए पर अपने आंदोलन की वजह से उनको अपमान भी झेलना पड़ा। इसके लिये उनके विरोधियों को नहीं बल्कि उनके समर्थकों को भी कम दोषी नहीं माना जा सकता जिन्होंने उनकी आयु की आड़ में अपने स्वार्थों के तीर चलाने के प्रयास किये।
वर्ष के पूरे नौ महीने तक जो आदमी भारतीय जनमानस पर छाया रहा वह वास्तव में नायक कहने योग्य है। यह अलग बात है कि कह कोई नहीं रहा। वर्ष के सबसे बुरी तरह से फ्लाप फिल्म रावन का नायक रहा। यह बात भी कोई नहीं कह नहीं रहा।
           उस दिन हमारे हम अपने एक मित्र से पहुंचने उसके घर पहुंचे। हमारे मित्र का लड़का रावन पिक्चर देखने मॉल में जा रहा था। हमारे मित्र ने उससे कहा ‘‘तुम्हारे यह अंकल कह रहे हैं कि रावन फिल्म फ्लॉप हो गयी है। हमने भी अपनी जवानी में फिल्में देखी हैं पर वही जो हिट होती थीं। तुम क्यो फ्लॉप रावन फिल्म देखने जाकर अपने घर की परंपरा और इज्जत का फालूदा बना रहे हो?
         पुत्र ने पूछा-‘‘अभी फिल्म आये तीन दिन हुए है तो उसे फ्लाप कैसे कह सकते है?’’
हमारे मित्र ने कहा-’’अंकल इंटरनेट पर सक्रिय रहते हैं और वहां ऐसा ही आंकलन प्रस्तुत किया गया होगा। तभी तो कह रहे हैं!’’
        पुत्र ने उनकी बात नहीं सुनी। तीन दिन बार हमारे मित्र बता रहा था कि उसके पुत्र को हमारी बात न मानने का मलाल था।
        देश की आज़ादी से पहले से यहां ऐसा तंत्र विकसित हो गया था जो यहां के जनमानस को बहलाफुसला कर बाज़ार के अनुकूल चलाने का अभ्यस्त था और उसने प्रचारतंत्र को भी वैसा ही बनाया। इस तरह भारतीय जनमानस भले ही अंग्रेजों के राजतंत्र से मुक्त हो गया पर उनके स्थापित व्यवस्था तंत्र के पंजों में अभी तक है। इतना ही नहीं आधुनिक शिक्षा से प्रशिक्षित अनेक लोग संस्कार और ंसस्कृति के नाम पर समाज को बचाने की बात तो करते हैं पर व्यवस्था की कार्यशैली बदलने की बात वह भी नहीं सोच पाते।         
            देश में भ्रष्टाचार आजादी के बाद से तेजी से पनपा है। अनेक लोग इससे जूड़ते हुए तो अनेक शिकार होते हुए अपना जीवन गंवा चुके हैं। जिनके पास राज्य की हल्दी सी गांठ है वह चूहा भी अपने आपको राजा से कम नहीं समझता। जहां जनता को सुविधा देने की बात आती है वहां राज्य के अधिकारों की बात चली आती है। प्रजा के लिये सुविधा पाना अधिकार नहीं बल्कि वह दे या न दे राज्य के अधिकार की बात हो गयी है। आम आदमी की भ्रष्टाचार से जो पीड़ा है उसका बयान सभी करते हैं पर हल कोई नहीं जानता। भ्रष्टाचार की पीड़ा को अन्ना साहेब के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पूरे विश्व के सामने जाहिर किया पर इससे वह कम नहीं हो गयी। यही कारण है कि इस वर्ष भ्रष्टाचार और अन्ना साहेब ने इंटरनेट पर ढेर सारी खोज पायी। रावन फिल्म फ्लाप हो गयी इसलिये उसे खोज में जगह अधिक नहीं मिली पर दीवाली पर रावन शब्द भी खूब खोजा जाता है। पुराने ईसवी संवत् की विदाई पर बस इतना ही।
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अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) के लिये आत्ममंथन का समय-हिन्दी लेख (anna hazare ke liye atmamanthan sa samay-hindi lekh or article)

           अन्ना हज़ारे ने अपना अनशन तथा जेलभरो आंदोलन फिलहाल स्थगित कर अच्छा ही किया है। जब हम अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात करते हैं तो उसके राजनीतिक पक्ष की चर्चा अधिक होती है और सामाजिक पक्ष पीछे रह जाता है। हमने जब भी इस पर लिखा है सामाजिक पक्ष को अधिक छूने का प्रयास किया है। एक बात के लिये यह आंदोलन हमेशा याद रखा जायेगा कि इसने संपूर्ण देश के समस्त समाजों के सभी लोगों को चिंत्तन और मनन के विवश किया। मूल प्रश्न भ्रष्टाचार से जुड़ा होने के बावजूद ऐसे अनेक विषय हैं-जिनका संबंध कहीं न कहीं उससे है-जिन पर चर्चा हुई। जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो आमतौर से सरकारी क्षेत्र के भ्रष्टाचार की बात होती है पर उद्योग, व्यापार, कला, तथा धर्म के क्षेत्र के कदाचार छिप जाता है। संभव है हम जैसे चिंतकों के इस मत से कम ही लोग सहमत होंगे कि हमारे समाज का यह सामान्य दृष्टिकोण ही ऐसे भ्रष्टाचार के लिये जिम्मेदार हैं जिसमें धन को सर्वाधिक महिमामय माना जाता है। सिद्धांतों की बात करना सभी को अच्छी लगती है पर जहां धन का मामला आये वहां सभी की आंख बंद हो जाती है।

             अपने आंदोलन के अकेले शीर्षक अन्ना साहेब हैं पर उनके विस्तार में अनेक प्रश्न चिन्ह थे। किसी पाठ में फड़कते शीर्षक के साथ बहुत सारे शब्द होते हैं जिनमें विषय से जुड़े सार का सार्थक होना आवश्यक है। इसके अभाव में शीर्षक एक नारा होकर रह जाता है। हम जैसे गीता साधकों के लिये यह आंदोलन अध्ययन और अनुसंधान के लिये बहुत महत्वपूर्ण रहा है। इस दौरान हमने केवल अन्ना के वाक्यों के साथ ही उनकी पर्दे पर दिख रही गतिविधियों को बहुत ध्यान से देखा। अन्ना के बारे में दूसरे लोग और दूसरे लोगों के बारे मे अन्ना क्या कह रहे हैं इसमें हमने दिलचस्पी नहीं रखी बल्कि अन्ना अपने इस आंदोलन से इस समाज के लिये क्या नया ढूंढ रहे हैं यह प्रश्न हमेशा हमारे लिये महत्वपूर्ण रहा है। अन्ना के स्वास्थ्य की चिंता हमेशा रही और हमारा मानना है कि ज्ञानी और ध्यानी अनशन जैसी हल्की गतिविधि से तब तक दूर रहें जब तक यह आवश्यक न हो। आंदोलनों और अभियानों का शांतितिपूर्ण प्रदर्शन करना ठीक है पर अनशन जैसी गतिविधि विचलित कर देती है।
               अन्ना ने जब अपना अनशन स्थगित किया तो प्रचार माध्यम उनका मखौल उड़ा रहे हैं। इन्हीं प्रचार माध्यमों ने उनके इसी आंदोलन पर अपने विज्ञापनों का समय पास कर कमाई की। टीवी चैनलों को इतने सारे दर्शक मिले होंगे कि वह कल्पनातीत होगा। हमारा मानना तो यह है कि यह आंदोलन ही आम जनमानस को भरमाने के लिये आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों का एक योजनाबद्ध प्रयास था। टीवी चैनलों में शामिल हुए जिन बुद्धिजीवियों ने उनके मुंबई में कम भीड़ होने की जो बात कही है वह इसी का ही परिणाम है। लोकपाल या जनलोकपाल से इतर बहस इस पर चल रही है कि क्या अन्ना साहेब का जादू खत्म हो गया है। तो क्या यह जादू चल रहा था?
          अन्ना मूलतः अकेले थे पर उनके पीछे अनेक ज्ञात अज्ञात संगठन आये जिनके अपने अपने लक्ष्य थे। जनलोकपाल उनका नारा था जो संसद में लोकपाल का बिल पास होते ही फ्लाप हो गया। अन्ना के अनेक साथियों को लगा कि उनका नारा अब चलने वाला नहीं है। यकीनन अन्ना ने यह सब देखा होगा। अन्ना ने बहुत कुछ कहा पर हमें लगता है कि उन्होंने बहुत कुछ नहीं भी कहा। उनके सामने अनेक ऐसे सत्य अदृश्य रूप में प्रकट हुए होंगे जिनको देखकर वह आश्चर्यचकित हुए होंगे। वह उनको देखते होंगे पर उनका बयान करना उनके लिये कठिन रहा होगा। वह ऐसे सात्विक पुरुष हैं जो राजस पुरुषो के क्षेत्र में घुसकर उनको त्रास देता है। अभी तक उन्होंने राजस पुरुषों से जो द्वंद्व किया था उसमें भी उनके विरोधी राजस पुरुषों की सहायता लेते रहे होंगे। एक को परास्त किया तो दूसरा विजेता बना होगा। इस बार वह राजस पुरुषों के विशाल समूह से लोह लेने निकले थे और धीरे धीरे उनके इर्दगिर्द अपने राजसी वृत्ति के लोगों का आंकड़ा कम होता जा रहा था। राजस पुरुष पराक्रमी होते हैं जबकि सात्विक पुरुषों को पराक्रम की आवश्यकता नहीं होती। यदि राजस पुरुषों के विशाल समूह से सामना करना हो तो पहले अपने पराक्रम का भी परीक्षण करना चाहिए। अन्ना ने यह बात अब जाकर अनुभव की होगी। हम नहीं मानते कि अन्ना हारकर बैठ जायेंगे। दूसरी बात यह भी लगती है कि वह अपने वर्तमान राजस पुरुषों के साथ लेकर अपना अभियान चलने वाले भी नहीं है।
        हम जब अन्ना हजारे के अभियान से राजनीतिक पक्ष से हटकर उसका सामाजिक पक्ष देखते हैं तो लगता है कि अन्ना हजारे की त्यागी छवि जनमानस में है। इसलिये भविष्य में उनको समर्थन नहीं मिलेगा यह सोचना बेकार है। मुश्किल यह है कि अन्ना हजारे को बौद्धिक वर्ग का समर्थन अधिक नहीं मिला। इसका कारण यह है कि इस देश ने कई आंदोलन और उसके परिणाम देखे हैं जिससे निराशावादी दृष्टिकोण उभरता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े स्वयं सेवी और उनके संगठनों की निष्ठा को लेकर लोगों के मन में अनेक संदेह थे। देश के बौद्धिक समाज से जुड़े अनेक लोगों के लिये वह किसी भी दृष्टि से स्वयंसेवक नहीं थे। समाज सेवा में उनकी भूमिका धनपतियों और आमजनमानस के बीच उनकी भूमिका मध्यस्थ की थी। वैसे हमारा मानना है कि अन्ना को अपना अभियान राजनीति से जुड़े विषय से हटकर समाज में फैले अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और भेदभाव मिटाने के लिये प्रारंभ करना चाहिए। हालांकि यह कहना कठिन है कि इसके लिये उनको प्रायोजक मिलेगा या नहीं। एक बात तय रही कि बिना प्रायोजन के ऐसे आंदोलन चल नहीं सकते।
————
लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

अमेरिकी डॉलर और भारत का रुपया-हिन्दी हास्य और व्यंग्य कविताएँ

वातानुकूलित कक्षों में बैठे लोग
पसीने के भाग्यविधाता हो गये।
जो सोना किसी की भूख नहीं मिटा सकता
उनके लिये बेशकीमती बन गया,
रोटी बनकर जीवन देने वाले
गेहूं के चमकदार दाने
उनकी नज़रों में मिट्टी हैं
कागज के रुपये से पेट भरने वाले
अमेरिकी डॉलर में खो गये।
———
एक अर्थशास्त्री ने दूसरे से कहा
‘‘यार, रुपये का मूल्य गिर रहा है,
यह चिंता की बात है,
हम स्वदेशी है
इसलिये दिन में भी होती बेचैनी
निद्रा से परे हो गयी हमारी रात है।’’

दूसरे ने कहा
‘‘लगता है कि
तुम्हारा किसी अमेरिकी बैंक में खाता नहीं है,
वहां कभी तुम्हारा कोई रिश्तेदार जाता नहीं है,
वरना यह बात नहीं कहते,
रुपये का भाव गिरने का दर्द नहीं सहते,
भईया,
हम तो केवल रहते यहां है,
अपना मन तो वहां है,
डॉलर का रेट बढ़ता है,
इधर हमारा रुपये का भंडार चढ़ता है,
तुम्हारा स्वदेशी तुम्हें मुबारक है,
हम तो वैश्विक दृष्टि वाले
इंडिया तो अपनी मुट्ठी में है
अमेरिका भी अपने साथ है।’’
———

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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राम और रावण के बीच युद्ध अवश्यंभावी था-आज दशहरा पर हिन्दी लेख (ram aur rawan ke beech yuddha avashyambhavi tha-hindi lekh on today dashahara)

         आज पूरे देश में दशहरे का त्यौहार मनाया जा रहा है। जिस दिन भगवान श्रीराम जी ने रावण का वध किया उसी दिन को ‘दशहरा पर्व के रूप में मनाया जाता है। पर्व मनाना और उससे निकले संदेश को समझना अलग अलग विषय हैं। ऐसे अवसर पर अपने इष्ट का स्मरण कर उनके चरित्र का स्मरण करने से पर्व मनाने में मजा आता है। देखा यह गया है की धार्मिक चित्तक समाज के सदस्यों को समाज समय पर एकत्रित होकर आध्यात्मिक चित्तन के लिए पर्वों जैसे अवसरों का निर्माण करते हैं बाज़ार उसे उत्सव जैसा बनाकर उपभोग की वस्तुएं बेचने का मार्ग बना लेता है, इस कारण ही चित्तन की बजाय उल्लास मनाने की प्रवृति पैदा होती है।
क्या राम और रावण के बीच केवल सीता की मुक्ति के लिये हुआ था? इस प्रश्न का उत्तर एक प्रतिप्रश्न है कि क्या अगर रावण सीता का अपहरण नहीं करता तो उनके बीच युद्ध नहीं होता?
         अगर तत्कालीन स्थितियों का अध्ययन करें तो यह युद्ध अवश्यंभावी था और रावण ने सीता का अपहरण इसी कारण किया कि भगवान श्रीराम अगर सामान्य मनुष्य हैं तो पहले तो सीता जी को ढूंढ ही न पायेंगे और उनके विरह में अपने प्राण त्याग देंगे। यदि पता लग भी गया और उनको वापस लाने के युद्ध करने लंका तक आये तो उन्हें मार दिया जायेगा। अगर भगवान हैं तो भी उनकी आजमायश हो जायेगी।
         जब भगवान राम लंका तक पहुंच गये तब रावण को आभास हो गया था कि भगवान श्री राम असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी हैं पर तब वह उनसे समझौता करने की स्थिति में वह नहीं रहा था क्योंकि श्री हनुमान जी ने लंका दहन के समय उसके पुत्र अक्षयकुमार का वध कर दिया था। यह पीड़ा उसे शेष जीवन सहजता ने नहीं बिताने देती। ऐसे में युद्ध तो अवश्यंभावी था।
       अगर रावण श्रीसीता का अपहरण नहीं भी करता तो भी अपनी बनवास अवधि बिताने के लियें दक्षिण दिशा की ओर बढ़ रहे श्रीराम जी से उसका युद्ध होना ही था। आखिर यह युद्ध क्यों होना था? इसे जरा आज के संदर्भ में देखें तो पता चलेगा कि अब फिर वैसे ही हालत निमित हो गये हैं हालांकि अब कोई न रावण जैसा ताकतवर दुष्ट है न ही भगवान श्रीराम जैसा शक्तिशाली और पराक्रमी।
          दरअसल रावण भगवान शिव का भक्त था और उसे अनेक प्रकार वरदान मिले जिससे वह अजेय हो गया। अपने अहंकार में न वह केवल भगवान शिव को भूल गया बल्कि अन्य ऋषियों, मुनियों, और तपस्वियों की दिनचर्या में बाधा डालने लगा था। वह उनके यज्ञ और हवन कुंडों को नष्ट कर देता और परमात्मा के किसी अन्य स्वरूप का स्मरण नहीं करने पर मार डालता। इसके लिये उसने बकायदा अपने सेवक नियुक्त कर रखे थे जिनका वध भगवान श्री राम के हाथ से सीता हरण के पूर्व ही हो गया था।
         भगवान श्रीराम को रावण की पूजा पद्धति से कोई बैर नहीं था। वह तो भगवान शिव जी भी आराधना करते थे। वह दूसरे की पूजा पद्धति को हेय और इष्ट को निकृष्ट कहने की रावण प्रवृत्ति के विरुद्ध थे। भगवान श्रीराम की महानता देखिये उन्होंने रावण के शव को उसकी परंपराओं के अनुसार ही अंतिम संस्कार की अनुमति दी। कहने का तात्पर्य यह है कि अपना धर्म-उस समय धर्म का कोई नाम नहीं था इसलिये पूजा पद्धति भी कह सकते हैं-दूसरे पर लादने के विरुद्ध थे और यही कारण है कि उन्होंने अपने संदेशों में किसी खास पूजा पद्धति की बात नहीं कही है। इसके विरुद्ध अहंकारी रावण दूसरों की पूजा पद्धति में न केवल विघ्न डालता वरन् आश्रम और मंदिर भी तोड़ डालता था। श्री विश्वामित्र अपने यज्ञ और हवन में उसके अनुचरों की उद्दंडता को रोकने के लिये श्रीराम को दशरथ जी से मांग लाये थे और उसी दिन ये ही राम रावण का युद्ध शुरु हो गया था।
       रावण लोभ, लालच और दबाव के जरिये दूसरों पर अपना धर्म-पूजा पद्धति-लादना चाहता था। उसने दूसरी मान्यताएं मानने वाले समाजों की स्त्रियों का अपहरण कर उनको अपने राजमहल में जबरन रखा। उन पर लोभ, लालच, डर और मोह का जाल डालकर उनको अपने वश में किया ताकि दूसरा समाज तिरस्कृत हो। उसने श्रीसीता जी को भी साधारण स्त्री समझ लिया जो उसके आकर्षण में फंस सकती थी और यही गलती उसे ले डूबी पर इसका यह भी एक पक्ष भी है कि अन्य मान्यताओं के लोगों का वह जिस तरह विरोध कर रहा था अंततः उसे एक दिन श्रीराम जी समक्ष युद्ध करने जाना ही था।
         आज हम देखें तो हालत वैसे ही हैं। हमारे दर्शन के अनुसार अध्यात्मिक दर्शन ही धर्म हैं पर उसका कोई नाम नहीं है जबकि अन्य धर्मों में कर्मकांडों को भी उसके साथ जोड़ा जाता है। धर्म का अर्थ कोई विस्तृत नहीं है। निष्काम भाव से कर्म करना, निष्प्रयोजन दया करना, समस्त जीवों के प्रति समान भाव रखते हुए अपने इष्ट का ही स्मरण करना उसका एक रूप है। अन्य धर्मों में उससे मानने की अनेक शर्तें हैं और यह पहनने, ओढ़ने, नाम रखने और अभिवादन के तरीकों पर भी लागू होती हैं।
         इतिहास में हम देखें तो हमारे देश में किसी धर्म का नाम लेकर युद्ध नहीं हुआ बल्कि उसके तत्वों की स्थापना का प्रयास हुआ। धर्म के अनुसार ही राजनीति होना चाहिये पर राजनीतिक शक्ति सहारे धर्म चलाना गलत है। आज हो यह रहा है कि लालच, लोभ, मोह, और दबाव डालकर लोगों को न केवल अपना इष्ट बल्कि नाम तक बदलवा दिया जाता है। पूजा पद्धति बदलवा दी जाती है। यह सब अज्ञान और मोह के कारण होता है। इस तरह कौन खुश रह पाता है?
       चाणक्य और कबीर भी यही कहते हैं कि अपना इष्ट या वर्ग बदलने से आदमी तनाव में जीता है। हमने भी देखा है कि अनेक लोग अपना नाम, इष्ट और वर्ग बदल जाते हैं पर फिर भी उसकी चर्चा करते है जबकि होना चाहिये कि वह फिर अपने नाम, इष्ट और वर्ग की बात तक न करें। कहने को तो वह यह कहते हैं कि यह सब बदलाव की वजह से उनको धन, सफलता और सम्मान मिला पर भौतिक उपलब्धियों से भला कोई खुश रह सकता है?

       दशहरे के इस पावन पर्व पर हमें अपने इष्ट भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए उनके चरित्र पर भी विचार करना चाहिए तभी पर्व मनाने का मजा है। इस अवसर पर हम अपने पाठकों, ब्लाग मित्रों और सहृदय सज्जनों के बधाई देते हैं।यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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बहादुरों की असलियत-हिन्दी शायरियां (bahadri ki asaliyat-hindi shayariyan)

तुम ताक रहे हो उनके घर
अपनी उम्मीद अपने हाथ में फैलाये
जिनका पेट लूट के सामानों से
कभी भरता नहीं है,
पत्थर का ज़मीर पाले हैं वह लोग
जो कभी पैदा न हुआ
इसलिये मरता भी नहीं है।
———-
फुर्सत नहीं है उनके पास
लूट के सामान घर में भरने से,
इश्तहार जरूर देते हैं
अपनी बहादुरी के कारनामों से
मगर पल पल दिल में डरते हैं
अपने मरने से।
———–
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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कागज़ खाने वाले शेर-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ

लापता हो गये हाड़मांस के असली शेर,
कुछ बीते इतिहास में दर्ज थे
कुछ आज भी नए जमाने में 
 कागजों में दिख रहे हैं।
पैसे, पद और प्रतिष्ठा के शिखर पर
बैठे इंसान ही कागज पर
अपने नाम में शेर लिख रहे हैं।
—————
सुना है उनका शेर जैसा है जिगर,
पर नहीं जिंदा रह सकते
वह कागज़ के नोट खाये बिगर।
——————
कंधे पर बंदूक लटकाए
वह घूम रहे हैं
कहते हुए अपने को शेर,
दुश्मन बनाए हैं जमाने में
काँपते हैं हर पल
कब कौन कर देगा कब ढेर।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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भ्रष्टाचार यानि काम का शिष्टाचार-हास्य कविताएँ (bhrashtachar yani kaam ka shishtachar-hasya kavitaen)

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन
देश में चल रहा है,
फिर भी यहाँ हर कोई
अपनों को छल रहा है।
नारों और वादों पर चलने का आदी है समाज
आकाश में देखता है फरिश्ते,
ज़मीन पर भुला रहा है रिश्ते,
खड़ा है वही चौराहे पर
रखकर अपनी दौलत अंधेरी तिजोरी में
हाथ में उसके
ईमानदारी का दीपक जल रहा है।
————
एक ईमानदार ने बेईमान से कहा
“तुम थकते नहीं हो
करते हों हमेशा भ्रष्टाचार,
सारे देश में शोर मचा है
पर तुम्हें खौफ नहीं है
जारी है तुम्हारा काला व्यापार।’
बेईमान ने कहा
“तुम समझते नहीं हों
इसलिए अपने घर में ही जमते नहीं हों,
अगर ऊपरी कमाए न करें तो
कहीं के न रह जाएँ,
बाहर लोग मक्कार समझें
घर में नकारा कहलाएं,
आज हर जगह वही आदमी ऊंचाई पर है
जिसकी तिजोरी भरी है,
करे जो चोरी और सीना जोरी
उसकी कही बात ही खरी है,
तुम तो ठस ठहरे
बस इतना समझो कि
यहाँ पर सब चलता है यार,
चाहे जितना चले आंदोलन
नहीं बदलेगा
हमारे काम का शिष्टाचार ।
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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भारत आज भी सोने की चिड़िया है-हिन्दी व्यंग्य लेख (bharat aaj bhi sone ki chidiya hai-hindi vyangya lekh)

          कौन कहता है कि भारत कभी सोने की चिड़िया थी। अब यह क्यों नहीं कहते कि भारत सोने की चिड़िया है। कम से कम देश में जिस तरह महिलाओं और पुरुषों के गले से चैन लूटने की घटनायें हो रही हैं उसे तो प्रमाण मिल ही जाता है। हमें तो नहीं लगता कि शायद का देश कोई भी शहर हो जिसके समाचार पत्रों में चैन खिंचने या लुटने की घटना किसी दिन न छपती हो। अभी तक जिन शहरों के अखबार देखे हैं उनमें वहीं की दुर्घटना और लूट की वारदात जरूर शामिल होती है इसलिये यह मानते हैं कि दूसरी जगह भी यही होगा।
          खबरें तो चोरी की भी होती हैं पर यह एकदम मामूली अपराध तो है साथ ही परंपरागत भी है। मतलब उनकी उपस्थिति सामान्य मानी जाती है। वैसे तो लूट की घटनायें भी परंपरागत हैं पर एक तो वह आम नहीं होती थीं दूसरे वह किसी सुनसान इलाके में होने की बात ही सामने आती थी। अब सरेआम हो लूट की वारदात हो रही हैं। वह भी बाइक पर सवार होकर अपराधी आते हैं।
         हमारे देश मूर्धन्य व्यंग्यकार शरद जोशी ने एक व्यंग्य में लिखा था कि हम इसलिये जिंदा हैं क्योंकि हमें मारने की फुरसत नहीं है। उनका मानना था कि हमसे अधिक अमीर इतनी संख्या में हैं कि लुटने के लिये पहले उनका नंबर आयेगा और लुटेरे इतनी कम संख्या में है कि उनको समझ में नहीं आता कि किसे पहले लूंटें और किसे बाद में। इसलिये लूटने से पहले पूरी तरह मुखबिरी कर लेते हैं। यह बहुत पहले लिखा गया व्यंग्य था। आज भी कमोबेश यही स्थिति है। हम ख्वामख्वाह में कहते है  कि अपराध और अपराधियों की संख्या बढ़ गयी हैं। आंकड़ें गवाह है कि देश में अमीरों की संख्या बढ़ गयी है। अब यह तय करना मुश्किल है कि इन दोनों के बढ़ने का पैमाना कितना है। अनुपात क्या है? वैसे हमें नहीं लगता कि स्वर्गीय शरद जोशी के हाथ से व्यंग्य लिखने और आजतक के अनुपात में कोई अंतर आया होगा। साथ ही हमारी मान्यता है कि अपराधी और अमीरों की संख्या इसलिये बढ़ी है क्योंकि जनसंख्या बढ़ी है। विकास की बात हम करते जरूर है पर जनसंख्या में गरीबी बढ़ी है। मतलब अपराध, अमीरी और गरीबी तीनों समान अनुपात में ही बढ़ी होगी ऐसा हमारा अनुमान है।
          सीधी बात कहें तो चिंता की कोई बात नहीं है। सब ठीकठाक है। विकास बढ़ा, जनंसख्या बढ़ी, अमीर बढ़े तो अपराध भी बढ़े और गरीबी भी यथावत है। तब रोने की कोई बात नहीं है। फिर हम इस बात को इतिहास की बात क्यों मानते हैं  कि भारत कभी सोने की चिड़िया थी। हम यह क्यों गाते हैं कि कभी कभी डाल पर करती थी सोने की चिड़िया बसेरा, वह भारत देश है मेरा। हम थे की जगह हैं शब्द क्यों नहीं उपयोग करते। अभी हमारे देश के संत ने परमधाम गमन किया तो उनके यहां से 98 किलो सोना और 307 किलो चांदी बरामद हुई। टीवी और अखबारों के समाचारों के अनुसार कई ऐसे लोग पकड़े गये जिनके लाकरों से सोने की ईंटे मिली।
          वैसे तो सोना पूरे विश्व के लोगों की कमजोरी है पर भारत में इसे इतना महत्व दिया जाता है कि दस हजार रुपये गुम होने से अधिक गंभीर और अपशकुन का मामला उतने मूल्य का सोना खोना या छिन जाना माना जाता है। बहु अगर कहीं पर्स खोकर आये तो वह सास को न बताये कि उसमें चार पांच हजार रुपये थे। यह भी सोचे सास को क्या मालुम कि उसमें कितने रुपये थे पर अगर पांच हजार रुपये की चैन छिन जाये तो उसके लिये धर्म संकट उत्पन्न हो जाता है क्योंकि वह सास के सामने हमेशा दिखती है और यह बात छिपाना कठिन है।
           एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के अनुसार भारत के लोगों के पास सबसे अधिक सोना है। इसमें शक भी नहीं है। भारत में सोने का आभूषण विवाह के अवसर पर बनवाये जाते हैं। इतने सारे बरसों से इतनी शादिया हुई होंगी। उस समय सोना इस देश में आया होगा। फिर गया तो होगा नहीं। अब कितना सोना लापता है और कितना प्रचलन में यह शोध का विषय है पर इतना तय है कि भारत के लोगों के पास सबसे अधिक सोना होगा यह तर्क कुछ स्वाभाविक लगता है।
            भारत के लोग दूसरे तरीके से भी सबसे अधिक भाग्यशाली हैं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ कहते हैं कि भूजल स्तर भारत में सबसे अधिक है। यही कारण है कि हमारा देश अन्न के लिये किसी का मुंह नहीं ताकता। हमारे ऋषि मुनि हमेशा ही इस बात को बताते आये हैं पर अज्ञान के अंधेरे में भटकने के आदी लोग इसे नहीं समझ पाते। कहा जाता है कि भारत का अध्यात्मिक ज्ञान सत्य के अधिक निकट है। हमें लगता है कि ऋषि मुनियों के लिये तत्व ज्ञान की खोज करना तथा सत्य तत्व को प्रतिष्ठित करना कोई कठिन काम नहीं रहा होगा क्योंकि मोह माया में फंसा इतना व्यापक समाज उनको यहां मिला जो शायद अन्यत्र कहीं नहीं होगा। अज्ञान के अंधेरे में ज्ञान का दीपक जलाना भला कौनसा कठिन काम रहा होगा?
             वैसे देखा जाये तो सोना तो केवल सुनार के लिये ही है। बनना हो या बेचना वही कमाता है। लोग सोने के गहने इसलिये बनवाते हैं वक्त पर काम आयेगा पर जब बाज़ार में बेचने जाते हैं तो सुनार तमाम तरह की कटौतियां तो काट ही लेता हैं। अगर आप आज जिस भाव कोई दूसरी चीज खरीदने की बजाय सोना खरीदें  और कुछ वर्ष बाद खरीदा सोना बेचें तो पायेंगे कि अन्य चीज भी उसी अनुपात में महंगी हो गयी है। मतलब वह सोना और अन्य चीज आज भी समान मूल्य की होती है। अंतर इतना है कि अन्य चीज पुरानी होने के कारण भाव खो देती है और सोना यथावत रहता है। हालांकि उसमें पहनने के कारण उसका कुछ भाग गल भी जाता है जिससे मूल्य कम होता है पर इतना नहीं जितना अन्य चीज का। संकट में सोने से सहारे की उम्मीद ही आदमी को उसे रखने पर विवश कर देती है।
          जब रोज टीवी पर दिख रहा है और अखबार में छप रहा है तब भी भला कोई सोना न पहनने का विचार कर रहा है? कतई नहीं! अगर महिला सोना नहीं पहनती उसे गरीब और घटिया समझा जाता है। सोना पहने है तो वह भले घर की मानी जाती है। भले घर की दिखने की खातिर महिलायें जान का जोखिम उठाये घूम रही है। धन के असमान वितरण ने कथित भले और गरीब घरों में अंतर बढ़ा दिया है। वैसे कुछ घर अधिक भले भी हो गये हैं क्योंकि उनकी महिलाऐं चैन छिन जाने के बाद फिर दूसरी खरीद कर पहनना शुरु देती हैं। बड़े जोश के साथ बताती हैं कि सोना चला गया तो क्या जान तो बच गयी।’
        भारत में वैभव प्रदर्शन बहुत है इसलिये अपराध भी बहुत है। वैभव प्रदर्शन करने वाले यह नहीं जानते कि उनके अहंकार से लोग नाखुश हैं और उनमें कोई अपराधी भी हो सकता है। पैसे, प्रतिष्ठा और पद के अहंकार में चूर लोग यही समझते हैं कि हम ही इस संसार में है। वैसे ही जैसे बाइक पर सवार लोग यह सोचकर सरपट दौड़ते हुए दुर्घटना का शिकार होते हैं कि हम ही इस सड़क पर चल रहे हैं या सड़क पर नहीं आसमान में उड़ रहे हैं वैसे ही वैभव के प्रदर्शन पर भी अपराध का सामना करने के लिये तैयार होना चाहिए। टीवी पर चैन छीनने की सीसीटीवी में कैद दृश्य देखकर अगर कुछ नहीं सीखा तो फिर कहना चाहिए कि पैसा अक्ल मार देता है।
        कुछ संस्थाओं ने सुझाव दिया है कि देश में अनाज की बरबादी रोकने के लिये शादी के अवसर पर बारातियों की संख्या सीमित रखने का कानून बनाया जाये। इस पर कुछ लोगों ने कहा कि अनाज की बर्बादी शादी से अधिक तो उसके भंडारण में हो रही है। अनेक जगह बरसात में हजारों टन अनाज होने के साथ कहीं ढूलाई में खराब होकर दुर्गति को प्राप्त होता है और उसकी मात्रा भी कम नहीं है। हम इस विवाद में न पड़कर शादियों में बारातियों की संख्या सीमित रखने के सुझाव पर सोच रहे हैं। अगर यह कानून बन गया तो फिर इस समाज का क्या होगा जो केवल विवाहों के अवसर के लिये अपने जीवन दांव पर लगा देता है। उस अवसर का उपयोग वह ऐसा करता है जैसे कि उसे पद्म श्री या पद्मविभूषण  मिलने का कार्यक्रम हो रहा है। बाराती कोई इसलिये बुलाता कि उसे उनसे कोई स्नेह या प्रेम है बल्कि अपने वैभव प्रदर्शन के लिये बुलाता है। यह वैभव प्रदर्शन कुछ लोगों को चिढ़ाता है तो कुछ लोगों को अपने अपराध के लिये उपयुक्त लगता है। ऐसा भी हुआ है कि शादी के लिये रखा गया पूरा सोना चोरी हो गया। सोने से जितना सामान्य आदमी का प्रेम है उतना ही डकैतों, लुटेरों और चोरों को भी है। सौ वैभव प्रदर्शन और चोरी, लूट और डकैती का रिश्ता चलता रहेगा। पहले बैलगाड़ी और घोड़े पर आदमी चलता था तो अपराधी भी उस पर चलते थे। अब वह पेट्रोल से चलने वाले वाहनों का उपयोग कर रहा है तो अपराधी भी वही कर रहे हैं। जो भले आदमी की जरूरत है वही बुरे आदमी का भी सहारा है। सोना तो बस सोना है। हम इन घटनाओं को देखते हुए तो यह कहते है कि भारत आज भी सोने की चिड़िया है।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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महंगी लंगोट-हिन्दी हास्य व्यंग्य कवितायें (mahangi langot-hindi hasya vyangya kavitaen)

बड़ों बड़ों की चाल चलन में
खोट हो गयी है,
फिर भी छिप जाते हैं
उनको बड़प्पन की ओट हो गयी है।
कहें दीपक बापू
धीरे धीरे होते जा रहे हैं
इस हमाम में बड़े बड़े नंगे,
भूखे पेटों से होंगे
उनके साथ भी कभी पंगे,
ज़माना बेजार है,
ईमानदारी से कमाना लगता बेकार है,
नंगों की यह शिकायत
गूंजती रहेगी नक्कारखाने में
कि उनकी लंगोट बहुत महंगी हो गयी है।’’
————-
जिस सीढ़ी पर चढेंगे तख्त पर
उतरना न पड़े
इस डर से उसे गिरा देंगे,
सभी जानते हैं।
फिर भी पता नहीं
अपने कंधों पर कहार की तरह
लोग बड़ों का बोझ क्यों उठाये जाते हैं,
जब तक लात न पड़े
उनको देवता मानते हैं।
———-
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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सत्य और झूठ का खेल-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ

धन, सोना, चांदी और
हीरे जवाहरात आदमी के साथ
मरने पर नहीं जाते हैं,
पर फिर भी आम आदमी ही नहीं
संत भी कहां लालच से बच पाते हैं।
माया को झूठा झूठा कहते हैं ताउम्र
मरने पर उनके कमरों में
संपदा के भंडार भक्तों की
आंखों को छकाते हैं,
सत्य को जानने के दावे
करने वालों के चेहरे और चरित्र
माया के खेल में चमक पाते हैं।
——–

धर्म प्रचार बिना माया के
भला कौन कर पाता है,
पैसा ही भगवान जिनका
ज्ञान भी उनका ही बिक जाता है।
चमत्कार करो
या बताओ स्वर्ग जाने का रास्ता
भ्रम बिकता है उस सच के दाम पर
जो न दिखता है
न मिलता है
न बिकने आता है।
———–

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
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बाबा रामदेव की योग शिक्षा जल्दी प्रारंभ होने की कामना-हिन्दी लेख

         यह अच्छी बात है कि बाबा रामदेव ने अंततः संत समुदाय के कहने पर अनशन का त्याग दिया। वह देश में भारत स्वाभिमान यात्रा करते रहे हैं। उन्होंने इस दौरान अपने योग शिविरों का उपयोग भ्रष्टाचार तथा कालेधन के मुद्दे पर भाषण देने के लिये भी किया। हमारे जैसे योग साधकों के लिये बाबा रामदेव एक योग प्रचारक के कारण हमेशा ही दिलचस्पी का विषय रहे हैं। यह बात तो उनके आलोचक भी मानते हैं कि योग के प्रचार में उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। जब बाबा ने राजनीतिक दल बनाने की घोषणा की तो यकीनन उनको आधुनिक लोकतंत्र व्यवस्था में विरोधियो का सामना करने के लिये तैयार होना चाहिए था। ऐसा लगता है कि वह योग शिविरों में अपनी जयजयकार के ऐसे अभ्यस्त हो गये हैं कि उनको इस बात का अनुमान नहीं था कि अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोधियों का सामने होना न केवल स्वाभाविक वरन् आवश्यक भी है।
       ऐसा लगता है कि स्वामी रामदेव ने भी राजनीति की तरफ कदम बिना किसी शास्त्र का अध्ययन किये ही बढ़ाया है। ऐसा ही दूसरे लोग भी कर रहे हैं अंततः कम से कम एक बात तय रही है कि राजनीतिक विषय पर वह आमजन जैसे ही हैं यह अलग बात है कि योग शिक्षा का अध्यात्म से जुड़े होने के कारण वह प्रसिद्धि हो गये और इसी कारण राजनीति उनके लिये सुविधाजनक हो गयी है। वह भले ही भारतीय अध्यात्म ग्रंथों की बात करते हैं पर लगता है कि कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा चाणक्य नीति का अध्ययन उन्होंने अभी नहीं किया है। इन महापुरुषों की रचनायें न केवल राजनीति बल्कि जीवन में सुचारु रूप से आगे बढ़ने का ऐसा संदेश देती हैं जिनकी सच्चाई उनको पढ़कर देखा जा सकता है। इनको पढ़कर सभी राजनेता बने यह जरूरी नहीं है पर जीवन में भी इनके मंत्रों का उपयोग कर सहज सफलता प्राप्त की जा सकती है। श्रीमद्भागवत गीता, पतंजलि योग साहित्य, कौटिल्य का अर्थशास्त्र और चाणक्य नीति ऐसी पावन रचनायें हैं जिनके अध्ययन से राजनीति ही नहीं वरन् जीवन के गूढ़ रहस्यों का भी पता चलता हैं।
        बाबा रामदेव अभी अपने अध्यात्मिक ग्रंथों के ज्ञान से बहुत परे दिखते हैं। इन नौ दिनों में बाबा रामदेव के व्यक्त्तिव की पूरी गहराई का पता लग गया है। अभी तक योग तक ही सीमित होने के कारण वह देश के अनेक ऐसे योग साधकों और लेखकों के भी वह प्रिय रहे थे जो उनके शिष्य नहीं है। उस समय तक बाबा का व्यक्त्तिव उनके आभामंडल तथा लोगों के विश्वास के कारण ढंका हुआ था। अब इन नौ दिनों में बाबा रामदेव टीवी चैनलों और अखबारों में इतने छाये रहे हैं कि उनके वह समर्थक जो निष्पक्ष योग साधक और बुद्धिजीवी हैं उनके साथ जुड़े घटनाक्रमों के दौरान अन्य लोगों की क्रियाओं से अधिक स्वामी रामदेव पर अपना ध्यान केंद्रित किये हुए थे। बाबा रामदेव का चेहरा के हावभाव, हाथ पांव की क्रियायें और वाणी के स्वरों का अध्ययन वह लोग करते रहे जो उनके साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं जुड़े हैं। इनमें से अनेक निराश भी हुए होंगे तो कुछ लोगों के चिंतन में बदलावा भी आया होगा।
         इंटरनेट पर बाबा रामदेव को हमेशा ही बहुत समर्थन मिला मगर अब शायद इसकी संभावना नहीं लगती। ऐसे में इंटरनेट पर सक्रिय एक दो ऐसे ब्लाग लेखकों के पाठ याद आ रहे हैं जो बाबा की योग शिक्षा पर तमाम तरह की प्रतिकूल टिप्पणियां करते थे। उससे भी अधिक वह उनके बाज़ार और प्रचार के मुखौटे होने का आरोप भी लगाते थे। इतना ही नहीं उनकी योग शिक्षा के प्रमाणिक होने पर भी सवाल उठाते थे। कुछ लोग उनके विरुद्ध कड़ी टिप्पणियां लिखते तो कुछ उनको समझाते। कुछ तो उनको धमकाते भी थे। इसके अलावा कुछ लोग उनकी उपेक्षा भी करते थे कि वह तो उनकी आलोचना करने वाले ही ठहरे। इन नौ दिनों में उन ब्लाग लेखकों की आलोचना में दम दिखने लगा। अब यह अलग बात है कि उस समय बाबा की योग शिक्षा के बाज़ार और प्रचार से प्रायोजित होने की बात यह सोचकर छोड़ दी जाती थी कि आखिर कोई व्यक्ति तो है जो भारतीय योग विधा का प्रचार कर रहा है। अंग्रेजी पद्धति के इलाज की आलोचना करने वाले बाबा रामदेव को अपने हठ की वजह से आखिर उस अस्पताल में जाना पड़ा जहां उसी पद्धति के चिकित्सक थे। इसी पद्धति से उनके अंदर भोजन की कमी को पूरा किया गया। उनकी देह के अनेक नकारात्मक पक्ष सामने आये। ऐसे में जब भारतीय योग पद्धति पर सवाल उठे तो चिंता हुई पर टीवी चैनलों पर कुछ योगाचार्यों ने आकर उसका बचाव किया और तय बात है कि उनको बाबा रामदेव की योग शिक्षा पर सवाल उठाने ही थे। उन योगाचार्यों की बात से इसका आभास तो हो गया कि उन्होंने पतंजलि योग का न केवल अध्ययन किया बल्कि उनका अभ्यास भी अच्छा है। एक महिला योगाचार्य ने बताया कि भारतीय योग के अनुसार प्रयास रहित आसन और प्राणायाम होते हैं। सांस सहजता से ली और छोड़ी जाती है। आसन करते समय अपना ध्यान अंदर चक्रों पर केंद्रित किया जाता है। उछलकूद वाले आसन भारतीय योग का भाग नहीं है। बाबा की योग शिक्षा के दौरान आसन और प्राणायाम के कराते समय ध्यान को अनदेखा किया जाता है।
        बाबा को कई बार अपने आसानों के दौरान हांफते हुए देखा जाता है जो कि नियमित अभ्यासरत योगाभ्यास करने वालों के लिये पीड़ादायक दृश्य होता हेै। हमने यह बात पहले भी लिखी थी कि जब बाबा के साथ जब एक योगाभ्यासी होता और बाबा आसन बोलते जाते थे और वह करता था तब ही तक सब ठीक था। बाद में पता लगा कि वह बाबा का गुरुभाई था जिसे उन्होंने हटा दिया। उस समय ऐसा लगा कि मतभेदों के कारण हटाया गया होगा पर अब लगता हैं कि बाबा अपने को एक सक्रिय सन्यासी साबित करने के लिये स्वयं ही योगासन करते दिखते हैं। वह आसन करने के बाद हांफते हुए बोलते हैं। यह योग साधना के विपरीत आचरण हैं। किसी भी तीव्रतर आसन करने के बाद शवासन या शिथिलासन करने का नियम है जिसका पालन वह नहीं करते। सच बात तो यह है कि वह योगासनों को व्यायाम की तरह बनाने में लगे हैं। टीवी चैनलों पर बाबा रामदेव की शिक्षा पर आलोचना करने वाले लोग योग साधना के अच्छे जानकार लगे इसलिये उनकी आलोचना को अनदेखा नहीं कर सकते।
      वैसे तो बाबा के विरोधियों ने भी यह कामना की है कि वह जल्दी लोगों को योगासन सिखाना शुरु करने योग्य हो जायें पर जिन लोगों की भारतीय योग साधना में दिलचस्पी है वह यकीनन बाबा रामदेव की योग शिक्षा पर सवाल उठायेंगे। इसका कारण यह है कि भारतीय योग विधा को जितना बाबा रामदेव ने प्रसिद्ध किया उतने ही सवाल उन्होंने अपने अनशन के दौरान उस पर उठने भी दिये। बाबा अपने भ्रष्टाचार और कालेधन विरोधी अभियान को जारी रखें या नही यह अब एक शुद्ध रूप से राजनीतिक विषय हो गया है। सामयिक लेखकों के लिये यह विषय बहुत दिलचस्प हो सकता है पर भारतीय योग साधना के लिये प्रतिबद्ध योगाचार्यों और साधकों के लिये अब यह जरूरी होगा कि वह योगासन, प्राणायाम और ध्यान के प्रमाणिक प्रचार के लिये प्रयास करें। दूसरी बात यह भी सिद्ध हो गया है कि देशभर में जितने भी योग शिक्षा के प्रसिद्ध आचार्य हैं वह कहीं न कहीं बाज़ार और प्रचार के शिखर पुरुषों से प्रायोजित हैं। उनकी प्रतिबद्धतायें प्रत्यक्ष रूप से भारतीय अध्यात्मिक प्रचार के लिये भले ही दिखती हों पर वास्तव में अपने उन प्रायोजकों के संकेतों पर ही काम करते हैं जिनका व्यवसाय भारतीय अध्यात्म में वर्णित वस्तुओं के निर्माण से है। त्वरित गति से पैसे, प्रतिष्ठा और पद-यथा महंत, स्वामी, बाबा, बापू,और आचार्य- के शिखर पर बैठने के लिये वह धर्मग्रंथों से कुछ श्लोक उठा लेते हैं और उसी आधार पर वह अपने धार्मिक अभियान पर चल पड़ते हैं जो कालांतर में पता लगता है कि किसी धनस्वामी के उत्पादों के-यथा दवा, चाय, च्यवनप्राश, शहद, पत्रिका, सौदर्य प्रसाधन तथा भोज्य पदार्थ- प्रचार के लिये था।
     हालांकि निराश होने वाली बात नहीं है। भारतीय योग संस्थान जैसे अनेक संगठन हमारे देश में हैं जो न केवल प्रमाणिक रूप से पतंजलि योग सूत्र के आठों अंगों का ज्ञान देने और अभ्यास कराने का काम निष्काम भाव से कर रहे हैं। अनेक योगाचार्य और शिक्षक भी निरंतर इस काम को जारी रखे हुए हैं। हम बाबा रामदेव के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करते हैं। एक सामान्य मौलिक स्वतंत्र लेखक तथा योग साधक होने के नाते हम तो यही चाहते हैं कि बाबा अपना योग शिक्षण अभियान जारी रखें। साथ ही यह भी बता दें कि योग शिक्ष से इतर उनकी गतिविधियों में उनके योगाभ्यास का अगर सकारात्मक परिणाम नहीं दिखता लोग उनकी योगशिक्षा में भी दोष ढूंढने लगेंगे जो अब तक नहीं हुआ था।
लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior
writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

संत कबीरदास के दोहे-भगवान के साथ चतुराई मत करो

सिहों के लेहैंड नहीं, हंसों की नहीं पांत
लालों की नहीं बोरियां, साथ चलै न जमात

संत शिरोमणि कबीर दास जी के कथन के अनुसार सिंहों के झुंड बनाकर नहीं चलते और हंस कभी कतार में नहीं खड़े होते। हीरों को कोई कभी बोरी में नहीं भरता। उसी तरह जो सच्चे भक्त हैं वह कभी को समूह लेकर अपने साथ नहीं चलते।

चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात
एक निस प्रेही निराधार का गाहक गोपीनाथ

कबीरदास जी का कथन है कि चतुराई से परमात्मा को प्राप्त करने की बात तो व्यर्थ है। जो भक्त उनको निस्पृह और निराधार भाव से स्मरण करता है उसी को गोपीनाथ के दर्शन होते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों ने तीर्थ स्थानों को एक तरह से पर्यटन मान लिया है। प्रसिद्ध स्थानों पर लोग छुट्टियां बिताने जाते हैं और कहते हैं कि दर्शन करने जा रहे हैं। परिणाम यह है कि वहां पंक्तियां लग जाती हैंं। कई स्थानों ंपर तो पहले दर्शन कराने के लिये बाकायदा शुल्क तय है। दर्शन के नाम पर लोग समूह बनाकर घर से ऐसे निकलते हैं जैसे कहीं पार्टी में जा रहे हों। धर्म के नाम पर यह पाखंड हास्याप्रद है। जिनके हृदय में वास्तव में भक्ति का भाव है वह कभी इस तरह के दिखावे में नहीं पड़ते।
वह न तो इस समूहों में जाते हैं और न कतारों के खड़े होना उनको पसंद होता है। जहां तहां वह भगवान के दर्शन कर लेते हैं क्योंकि उनके मन में तो उसके प्रति निष्काम भक्ति का भाव होता है।

सच तो यह है कि मन में भक्ति भाव किसी को दिखाने का विषय नहीं हैं। हालत यह है कि प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों पर किसी सच्चे भक्त का मन जाने की इच्छा भी करे तो उसे इन समूहों में जाना या पंक्ति में खड़े होना पसंद नहीं होता। अनेक स्थानों पर पंक्ति के नाम पर पूर्व दर्शन कराने का जो प्रावधान हुआ है वह एक तरह से पाखंड है और जहां माया के सहारे भक्ति होती हो वहां तो जाना ही अपने आपको धोखा देना है। इस तरह के ढोंग ने ही धर्म को बदनाम किया है और लोग उसे स्वयं ही प्रश्रय दे रहे हैं। सच तो यह है कि निरंकार की निष्काम उपासना ही भक्ति का सच्चा स्वरूप है और उसी से ही परमात्मा के अस्तित्व का आभास किया जा सकता है। पैसा खर्च कर चतुराई से दर्शन करने वालों को कोई लाभ नहीं होता।
————————-

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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आंदोलक पुरुष-हिन्दी लघु हास्य व्यंग्य (aandoka purush-hindi laghu hasya vyangya)

    आंदोलक पुरुष बहुत दिन से खाली बैठे थे। कोई उनको घास नहीं डाल रहा था। ऐसे में वह बाज़ार के सौदागरों के सरदार के पास पहुंच गये। उससे बोले-‘महोदय, आप तो अब काले तथा सफेद दोनों धंधों से खूब कमा रहे हैं। बहुत दिन से आपने मेरी सामाजिक संस्था को न तो चंदा दिया है न काम दिया है। अब मैं खाली बैठा हूं! आप मेरे बारे में कुछ सोचिये।’’
      बाज़ार के सरदार ने कहा-‘‘आप अब गये गुजरे ज़माने का चीज हो गये हैं। जितना आपको आंदोलन का धंधा और चंदा देना था दे दिया। अब आप उसी के ब्याज पर खाईये।’
      आंदोलक पुरुष ने कहा कि ‘‘अब तक तो ठीक था। बुढ़ा गया हूं। बीमारी के इलाज का खर्चा कम पड़ता है अगर आप चंदा या धंधा नहीं देंगे तो फिर आपके खिलाफ प्रत्यक्ष आंदोलन छेड़ दूंगा। वैसे ही डाक्टर ने रोटी कम खाने को कहा है इसलिये भूख हड़ताल पर बैठ जाऊंगा।’’
     बाज़ार के सरदार उनका मजाक उड़ाते हुए कहा-‘अगर आप मर गये तो आपकी अर्थी बड़े जोरदार ढंग से सजा देंगे। यह हमारा वादा रहा।’
     आंदोलक पुरुष उठकर खड़ा हो गया और बोला-‘ठीक है, चलता हूं फिर अगर कोई बात हो तो मेरे पीछे समाज सेवा के अपने दलाल समझौते के लिये मत भेजना।’
     सरदार घबड़ा गया उसने उनसे थोड़ी देर बाहर बैठने को कहा और अपने सचिव को बुलाकर उससे बात की। वह बोला-‘साहब, आप इनको भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाने को कहिये।
     सरदार ने कहा-‘‘क्या बात करते हो? इससे तो हमारे मातहत समाज सेवक परेशान हो जायेंगे।’
सचिव ने कहा-‘अगर देश में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन नहंी चलवायेंगे तो आपके विदेशी आका नाराज हो जायेंगे। सारी दुनियां में भ्रष्टाचार और अनाचार पर हलचल मची हुई है पर अपना देश खामोश है। ऐसा लगता है कि मुर्दा कौमें यहां रहती है। आखिर शक्तिशाली और चेतन समाज से ही उसके शिखर पुरुष की इज्जत अन्यत्र बनती है। अगर अपने देश में ऐसा नहीं हुआ तो विदेश में आपकी इज्जत कम हो जायेगी।’
      सरदार ने कहा-‘मगर यह आदमी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलायेगा तो सारी भीड़ उसके पास चली जायेगी और यह हमारे लिये खतरनाक हो सकता है।’
     सचिव ने कहा-‘आप चिंता मत करिये। इसके पीछे और साथ रहने वाले करीबी लोग अपने ही प्रायोजित और पेशेवर आंदोलनकारी होंगे। उनको चाहे जो आंदोलन हो हम उसमें ठांस देते हैं। वह अच्छा प्रबंध कर लेंगे। आंदोलन चलेगा, रैलियां होंगी पर चलेगा सब कुछ वैसा ही जैसा हम चाहते हैं। वैसे भी आजकल अपने प्रचारक भौंपूओं के पास सैक्स, फिल्म, योग, रोग, ज्योतिष तथा कामेडी के बासी कार्यक्रम रह गये हैं। यह भ्रष्टाचार विरोधी आदोलन नया है सो वह इसमें अपने विज्ञापन चलाकर खूब कमायेंगे। उसमें भी अपने ही बाज़ार की कंपनियों के नये उत्पाद और सेवायें प्रसिद्ध होंगी।’
     बाज़ार के सौदागर ने कहा-‘ठीक है, तुम उसे समझाओ वरना वह भूख हड़ताल पर बैठ जायेगा।’
सचिव ने कहा-‘वह तो उसे दो दिन तक बैठने के लिये कहना ही है। तभी तो बासी कड़ी में उबाल आयेगा। उसने बहुत दिन से कोई आंदोलन नहीं किया इसलिये उसका नाम बासी हो गया है। भूख हड़ताल से उसके आंदोलन को अच्छा प्रचार मिलेगा।’
     सौदागर ने आंदोलक पुरुष को बुलाया और कहा-‘हमारे सचिव से आप बात कर लेना। आप तो आंदोलन चलाईये। बाकी सब हम देख लेंगे। हमारे लोग ही आपके साथ होंगे। आप भाषण करेंगे तो आपकी तरफ से बहस वही लोग बहस करेंगे। यह सचिव उनसे आपको मिला देगा।’
     आंदोलक पुरुष ने कहा-‘इसकी जरूरत नहीं है। मुझे किसी को नहीं जानना। बस मेरा धंधा चलने के साथ ही चंदा आने का सिलसिला जारी रहना चाहिए।’
    सरदार ने कहा-‘आप उनसे मिल तो लीजिये। जब आंदोलन चलायेंगे तो उस पर कुछ लोग नाराज होंगे। हमारे लोगों पर भी कुछ छोटे मोटे आरोप हैं जिनकी चर्चा आपके विरोधी करेंगे। तब उनका जवाब तो आपको ही देना पड़ेगा।’
    इस पर आंदोलक पुरुष ने कहा-‘कह दूंगा कि मै तो उनको जानता ही नहीं वह तो मेरे आंदोलन में आये हैं और पिछले इतिहास में कुछ भी किया होगा पर अब उनका हृदय परिवर्तन हो गया है।’
बाजार का सरदार खुश हो गया और अब आंदोलन चालु आहे।’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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आंसु और मुस्कान-हिन्दी कविता (ansu aur muskan-hindi kavita)न

आंसुओ को आँखों से बाहर
आने से रोके रहे,
चाहे रोने के आते कितने भी मौके
हंसकर देते उनको धोखे रहे,
गैरों के हमलों की क्या शिकायत करते
अपनों के हाथ ही
हमारी खुशियों का गला घौंटे रहे।
————-
ज़मीन के सौदे हो जाते हैं
इंसानों के बीच
कागज पर नाम बदल जाते हैं।
खड़ी रहती है वह अपनी जगह
फसलों की जगह
पत्थर उसे बनाते अपनी पहचान की वजह,
इंसान मरकर
इतिहास के कागजों में चले जाते
अपनी स्वामिनी ज़मीन स्वयं है
नाम के मालिक तो
नाम के लिये आते और जाते हैं।
————–
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
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ब्रिटेन के मुफ्तखोर राजघराने के आशिक भारतीय प्रचार माध्यम-हिन्दी लेख (muftakhor rajgharane ka prachar-hindi lekh

             ब्रिटेन के राजघराने की उनके देश में ही इतनी इज्जत नहीं है जितना हमारे देश के प्रचार माध्यम देते हैं। आधुनिक लोकतंत्र का जनक ब्रिटेन बहुत पहले ही राजशाही से मुक्ति पा चुका है पर उसने अपने पुराने प्रतीक राजघराने को पालने पोसने का काम अभी तक किया है। यह प्रतीक अत्यंत बूढ़ा है और शायद ही कोई ब्रिटेन वासी दुबारा राजशाही को देखना चाहेगा। इधर हमारे समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में सक्रिय बौद्धिक वर्ग इस राजघराने का पागलनपन की हद तक दीवाना है। ब्रिटेन के राजघराने के लोग मुफ्त के खाने पर पलने वाले लोग है। कोई धंधा वह करते नहीं और राजकाज की कोई प्रत्यक्ष उन पर कोई जिम्मेदारी नहीं है तो यही कहना चाहिए कि वह एक मुफ्त खोर घराना है। इसी राजघराने ने दुनियां को लूटकर अपने देश केा समृद्ध बनाया और शायद इसी कारण ही उसे ब्रिटेनवासी ढो रहे हैं। इसी राजघराने ने हमारे देश को भी लूटा है यह नहीं भूलना चाहिए।
               कायदा तो यह है कि देश को आज़ादी और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाले हमारे प्रचारकगण इस राजघराने के प्रति नफरत का प्रसारण करें पर यहां तो उनके बेकार और नकारा राजकुमारों के प्रेम प्रसंग और शादियों की चर्चा इस तरह की जाती है कि हम अभी भी उनके गुलाम हैं। खासतौर से हिन्दी समाचार चैनल और समाचार पत्र अब उबाऊ हो गये हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हिन्दी समाचार चैनल अपने विज्ञापनदाताओं के गुलाम हैं। इनके विज्ञापनदाता अपने देश से अधिक विदेशियों पर भरोसा करते हैं। यही कारण है कि कुछ लोगों के बारे में तो यह कहा जाता है कि वह यहां से पैसा बैगों में भरकर विदेश जमा करने के लिये ले जाते हैं। हैरानी होती है यह सब देखकर। अपने देश के सरकारी बैंक आज भी जनता के भरोसा रखते हैं पर हमारे देश के सेठ साहुकार विदेशों में पैसा रखने के लिये धक्के खा रहे हैं।
बहरहाल भारतीय सेठों का पांव भारत में पर आंख और हृदय ब्रिटेन और अमेरिका की तरफ लगा रहता है। कई लोगों को देखकर तो संशय होता है कि वह भारत के ही हैं या पिछले दरवाजे से भारतीय होने का दर्जा पा गये। अमेरिका की फिल्म अभिनेत्री को जुकाम होता है तो उसकी खबर भी यहां सनसनी बन जाती है। प्रचार माध्यमों के प्रबंधक यह दावा करते हैं कि जैसा लोग चाहते हैं वैसा ही वह दिखा रहे हैं पर वह इस बात को नही जानते कि उनको दिखाने पर ही लोग देख रहे हैं। उसका उन पर प्रभाव होता है। वह समाज में फिल्म वालों की तरह सपने बेच रहे हैं। विशिष्ट लोग की आम बातों को विशिष्ट बताने वाले उनके प्रसारण का लोगों के दिमाग पर गहरा असर होता है। ऐसा लगता है कि समाज में से पैसा निकालने की विधा में महारत हासिल कर चुके हमारे बौद्धिक व्यवसायी किसी नये सृजन की बजाय केवल परंपरागत रूप से विशिष्ट लोगों की राह पर चलने के लिये विवश कर रहे हैं।
                 यह भी लगता है कि सेठ लोगों की देह हिन्दुस्तानी है पर दिल अमेरिका या ब्रिटेन का है। उनको लगता है कि अमेरिका, ब्रिटेन या फ्रांस उनके अपने देश हैं और उनकी तर्फ से वहां केवल धन वसूली करने के लिये पैदा हुए हैं। अगर यह सच नहीं है तो फिर विदेशी बैंकों में भारी मात्रा में भारत से पैसा कैसे जमा हो रहा है? सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों को विदेश बहुत भाता है और राष्ट्रीय स्तर की बात छोड़िये स्थानीय स्तर के शिखर पुरुष बहाने निकालकर विदेशों का दौरा करते हैं।
प्रचार प्रबंधकों को लगता है कि जिस तरह पश्चिमी देशों में भारत की गरीबी, अंधविश्वास तथा जातिवादपर आधारित कहानियां पसंद की जाती हैं उसी तरह भारत के लोगों को पश्चिम के आकर्षण पर आधारित विषय बहुत लुभाते हैं। यही कारण है कि ब्रिटेन के बुढ़ा चुके राजघराने की परंपरा के वारिसों की कहानियां यहां सुनाई जाती हैं।
                 बहरहाल ऐसा लगता है कि हिन्दी समाचार चैनल बहुत कम खर्च पर अधिक और महंगे विज्ञापन प्रसारित कर रहे हैं। इन समाचार चैनलों के पास मौलिक तथा स्वरचित कार्यक्रम तो नाम को भी नहीं। स्थिति यह है कि सारे समाचार चैनल आत्मप्रचार करते हुए अधिक से अधिक समाचार देने की गारंटी प्रसारित करते हैं। मतलब उनको मालुम है कि लोग यह समझ गये हैं कि समाचार चैनलों का प्रबंधन कहीं न कहीं विज्ञापनदाताओं के प्रचार के लिये हैं न कि समाचारों के लिये। आखिर समाचार चैनलों को समाचार की गारंटी वाली बात कहनी क्यों पड़ी रही है? मतलब साफ है कि वह जानते हैं कि उनके प्रसारणों में बहुत समय से समाचार कम प्रचार अधिक रहा है इसलिये लोग उनसे छिटक रहे हैं या फिर वह समाचार प्रसारित ही कब करते हैं इसलिये लोगांें को यह बताना जरूरी है कि कभी कभी यह काम भी करते हैं। विशिष्ट लोगों की शादियों, जन्मदिन, पुण्यतिथियों तथा अर्थियों के प्रसारण को समाचार नहीं कहते। इनका प्रसारण शुद्ध रूप से चमचागिरी है जिसे अपने विज्ञापनदाताओं को प्रसन्न करने के लिये किया जाता है न कि लोगों के रुझान को ध्यान में रखा जाता है।
                  शाही शादी जैसे शब्द हमारे देश के अंग्रेजी के देशी गुलामों के मुख से ही निकल सकते हैं भले ही वह अपने को बौद्धिक रूप से आज़ाद होने का दावा करते हों।
                 बहरहाल जिस तरह के प्रसारण अब हो रहे हैं उसकी वजह से हम जैसे लोग अब समाचार चैनलों से विरक्त हो रहे हैं। अगर किसी दिन घर में किसी समाचार चैनल को नहीं देखा और ऐसी आदत हो गयी तो यकीनन हम भूल जायेंगे कि हिन्दी में समाचार चैनल भी हैं। जैसे आज हम अखबार खोलते हैं तो उसका मुख पृष्ठ देखने की बजाय सीधे संपादकीय या स्थानीय समाचारों के पृष्ठ पर चले जाते हैं क्योंकि हमें पता है कि प्रथम प्रष्ठ पर क्रिकेट, फिल्म या किसी विशिष्ट व्यक्ति का प्रचार होगा। वह भी पहली रात टीवी पर देखे गये समाचारों जैसा ही होगा। समाचार पत्र अब पुरानी नीति पर चल रहे हैं। उनको पता नहीं कि उनके मुख पृष्ठ के समाचार छपने से पहले ही बासी हो जाते हैं। हिन्दी समाचार चैनलों को भी शायद पता नहीं उनके प्रसारण भी बासी हो जाते हैं क्योंकि वही समाचार अनेक चैनलों पर प्रसारित होता है जो वह कर रहे होते हैं। एक ही प्रसारण सारा दिन होता है। शादियों और जन्मदिनों का सीधा प्रसारण पहले और बाद तक होता है।
कितने मेहमान आने वाले हैं, कितने आ रहे हैं, कितनी जगहों से आ रहे हैं। फिर कब जा रहे हैं, कहां जा रहे हैं जैसे जुमले सुने जा सकते हैं। संवाददाता इस तरह बोल रहे होते हैं जैसे आकाश से बिजली गिरने का सीधा प्रसारण कर रहे हों। वैसे ही टीवी अब लोकप्रियता खो रहा है। लोग मोबाइल और कंप्यूटर की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। खालीपीली की टीआरपी चलती रहे तो कौन देखने वाला है।

————–

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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